Friday, August 3, 2018

जुंबिशें - - - नज़्म 17 बनाम शरीफ़ दोस्त



17

बनाम शरीफ़ दोस्त

तू जग चुका है और, इबादत गुज़ार1 है,
सोए हुए खुदाओं की, तुझ पे मार है.

दैरो हरम के सम्त, बढ़ाता है क्यूं क़दम?
डरता है तू समाज से? शैतां सवार है.

इस इल्मे वाहियात4 को तुर्बत5 में गाड़ दे,
अरबों की दास्तान, समाअत6 पे बार है.

हम से जो मज़हबों ने लिया, सब ही नक़्द था,
बदले में जो दिया है, सभी कुछ उधार है.

खाकर उठा है, दोनों तरफ़ की तू ठोकरें,
पत्थर से आदमी की, ज़रा ज़ोरदार है.

तहज़ीब चाहती है, बग़ावत के अज़्म को,
तलवारे-वक़् देख ज़रा, कितनी धार है.

जिनको है रोशनी से, नहाना ही कशमकश,
उनके लिए यह रोशनी, भी दूर पार है.

'मुंकिर' के साथ आ, तो संवर जाए यह जहाँ,
ग़लती से यह समाज, ख़ता का शिकार है.

१-उपासक २-मन्दिर और काबा ३-तरफ़ ४-ब्यर्थ -ज्ञान ५-समाधी 6श्रवण- शक्ति ८-उत्साह

بنام شریف دوست

تُو جگ چکا ہے اور عبادت گُزار ہے،٠
سوۓ ہُوۓ خُدا کی ، یہ تُجھ پہ مار ہے ٠

،دیر و حرم کے سمت بڑھاتا ہے کیوں قدم 
ڈرتا ہے تو سماج سے، شیطاں سوار ہے ؟ 

،مذہب کے علم خاک کو، تُربت میں گاڑ دے 
اربوں کی داستان ، سماعت پہ بار ہے ٠

،ہم سے جو مذہبوں نے لیا ، سب ہی نقد تھا 
بدلے میں جو دیا ہے ، سبھی کُچھ ادھار ہے ٠

،جنکو ہے روشنی میں نہانا ہی کشمکش
اُنکے لئے یہ روشنی بھی دور پار ہے٠  

،منکر کے ساتھ آ تو سنور جاۓ یہ جہاں 
غلطی سے یہ سماج خطا کا شکار ہے ٠ 

No comments:

Post a Comment