Sunday, December 25, 2016

Junbishen 782


Rubaiyan

चल दिए दबे क़दम किधर , शहिद तुम,
साथ में लिए हुए ये मुल्हिद तुम , 
पी ली उसकी या पिला दिया अपनी मय ,
था तुम्हारा नक्काद ये और नाक़िद तुम .

چل دے دبے قدم کدھر زاہد تم 
ساتھ میں لئے ہوئے یہ ملحد تم 
پی لی اسکی یا پلا دیا اپنی مے 
تھا تمہارا یہ نققاد، اور ناقد تم ٠   


जब गुज़रे हवादिस तो तलाशे है दिमाग, 
तब मय की परी हमको दिखाती चराग़, 
रुक जाती है वजूद में बपा जंग, 
फूल बन कर खिल जाते हैं दिल के सब दाग 

جب گزرے حوادث کو تلاشے یہ دماغ 
تب  مے کی پری ہم کو دکھاۓ ہے چراغ 
رک جاتی ہے وجود میں بپا جنگ 
پھول بن کر کھل جاتے ہیں دل کے سب داغ ٠ 


औलादें बड़ी हो गईं, अब उंगली छुडाएं , 
हमने जो पढाया है इन्हें, वो हमको पढ़ें, 
हो जाएँ अलग इनकी नई दुनया से, 
माँ बाप बचा कर रख्खें, अपना खाएँ. 

اولادیں بڑی ہو گئیں ، اب انگلی چھڑا یں 
ہم نے جو پڑھھایا انہیں، وہ ہم کو پڑھا یں 
ہو جایں الگ انکی نئی دنیا سے 
ماں باپ بچا ہر رکھیں ، اپنا کھا یں٠  

****************

Friday, December 16, 2016

Junbishen 781


रुबाईयाँ 
कहते हैं कि मुनकिर कोई रिश्ता ढूंढो, 
बेटी के लिए कोई फ़रिश्ता ढूंढो, 
माँ   बाप के मेयर पे आएं पैगाम, 
अब कौन कहे , अपना गुज़िश्ता ढूंढो. 


کہتے ہیں کہ منکر کوئی رشتہ ڈھونڈھو 
بیٹی کے لئے کوئی فرشتہ ڈھونڈھو 
ماں باپ کے اعمال پہ آہیں پیغام 
اب کون کہے، اپنا گزشتہ ڈھونڈھو ٠ 



लगता है कि जैसे हो पराया ईमान, 
या आबा ओ अजदाद से पाया ईमान , 
या उसने डराया धमकाया इतना , 
वह खौफ के मारे ले आया ईमान. 

لگتا ہے کہ جیسے ہو پریا ایمان 
یا باپ سے دادا سے، ہو پایا ایمان 
یا اسنے ڈرایا دھمکایا اتنا 
وہ خوف کے مارے لے آیا ایمان ٠ 



चाहे जिसे इज्ज़त दे, चाहे ज़िल्लत, 
चाहे जिसे ईमान दे, चाहे लानत, 
समझाने बुझाने की मशक्क़त क्यों है? 
जब खुद तेरे ताबे में है सारी हिकमत . 

چاہے جسے عزت دے چاہے ذلّت 
چاہے جسے ایمان دے چاہے لعنت 
سمجھنے بجھانے کی مشققت کیوں ہو 
جب خود ترے تعبے میں ہے ساری حکمت ٠ 

********************

Wednesday, December 14, 2016

Junbishen 780

Rubaaiyan

आज़माइशें हुईं, क़रीना आया,
चैलेंज हुए क़ुबूल, जीना आया.
शम्स ओ क़मर की हुई पैमाइश, 
लफ्फ़ाज़ के दांतों पसीना आया

آزمائشیں ہوئیں ، قرینہ آیا 
چیلنج ہوئے قبول ، جینا آیا 
شمس اور قمر کی، ہوئی پیمائش 
لفاظی کے دانتوں کو، پسینہ آیا ٠ 


मुमकिन है कि माज़ी में ख़िरद गोठिल हो, 
समझाने ,समझने में बड़ी मुश्किल हो, 
कैसा है ज़ेहन अब जो समझ लेता है, 
मज़मून में मफ़हूम अगर मुह्मिल हो. 

ممکن ہے کہ ماضی میں، خرد گوٹھل ہو 
سمجهانے سمجھنے میں بڑی مشکل  ہو 
کیسا ہے ذھن، اب جو سمجھ لیتا ہے 
مضمون میں مفہوم اگر مہمل ہو ٠ 


ये ईश की बानी, ये निदा की बातें, 
आकाश से उतरी हुई ये सलवातें , 
इन्सां में जो नफ़रत की दराडें डालें, 
पाबन्दी लगे ज़प्त हों इनकी घातें. 

یہ ایش کی بانی ، یہ ندا کی گھاتیں  
آکاش سے اتری ہوئی یہ صلواتیں 
انسان میں نفرت کی دراڑیں ڈالیں 
پابندی لگے ، ضبط ہوں انکی باتیں٠ 

******************

Monday, December 12, 2016

Junbishen 774


रुबाईयाँ 
आज़माइशें हुईं, क़रीना आया,
चैलेंज हुए क़ुबूल, जीना आया.
शम्स ओ क़मर की हुई पैमाइश, 
लफ्फ़ाज़ के दांतों पसीना आया

آزمائشیں ہوئیں ، قرینہ آیا 
چیلنج ہوئے قبول ، جینا آیا 
شمس اور قمر کی، ہوئی پیمائش 
لفاظی کے دانتوں کو، پسینہ آیا ٠ 



मुमकिन है कि माज़ी में ख़िरद गोठिल हो, 
समझाने ,समझने में बड़ी मुश्किल हो, 
कैसा है ज़ेहन अब जो समझ लेता है, 
मज़मून में मफ़हूम अगर मुह्मिल हो. 

ممکن ہے کہ ماضی میں، خرد گوٹھل ہو 
سمجهانے سمجھنے میں بڑی مشکل  ہو 
کیسا ہے ذھن، اب جو سمجھ لیتا ہے 
مضمون میں مفہوم اگر مہمل ہو ٠ 



ये ईश की बानी, ये निदा की बातें, 
आकाश से उतरी हुई ये सलवातें , 
इन्सां में जो नफ़रत की दराडें डालें, 
पाबन्दी लगे ज़प्त हों इनकी घातें. 


یہ ایش کی بانی ، یہ ندا کی گھاتیں  
آکاش سے اتری ہوئی یہ صلواتیں 
انسان میں نفرت کی دراڑیں ڈالیں 
پابندی لگے ، ضبط ہوں انکی باتیں٠ 

******************

Friday, December 9, 2016

unbishen 774



रुबाईयाँ 

औरत को गलत समझे कि आराज़ी* है,
यह आप के ज़ेहनों में बुरा माज़ी है,
यह माँ भी, बहन बेटी भी, शोला भी है,
पूछो कि भला वह भी कहीं राज़ी है.
 *खेतियाँ 

عورت کو غلط سمجھے کہ آراضی ہے 
یہ آپ کے ذہنوں میں برا ماضی ہے
یہ ماں بھی ، بہن بھی،  شولہ بھی ہے 
پوچھو کہ کہیں وہ بھی بھلا راضی ہے 



क्यों तूने बनाया इन्हें बोदा यारब!
ज़ेहनों को छुए इनका अकीदा1 यारब,
पूजे जो कोई मूरत, काफ़िर ये कहें,
खुद क़बरी सनम2 पर करें सजदा यारब.
1- आस्था 2-मजारें 



کیوں تونے بنایا، انہیں بودا یا رب 
ذہنوں کو چھوے، ان کا عقیدہ یا رب 
پوجے جو کوئی مورت ، کافر یہ کہیں
خود قبری صنم کو، کریں سجدہ یا رب ٠




नन्हीं सी मेरी जान से जलते क्यों हो,
यारो मेरी पहचान से जलते क्यों हो,
तुम खुद ही किसी भेड़ की गुम शुदगी हो, 
मुंकिर को मिली शान से जलते क्यों हो. 

ننہیں سی مری جان سے، جلتے کیوں ہو 
یارو مری پہچان سے، جلتے کیوں ہو
تم خود ہی کسی بھیڑ کی، گم شدگی ہو 
 'منکر' کو ملی شان سے، جلتے کیوں ہو ٠

****************

Wednesday, December 7, 2016

Junbishen 776


Rubaiyan

है बात कोई गाड़ी यूँ चलती जाए ,
विज्ञान के युग में भी फिसलती जाए , 
ढ़ोती रहे सर पे , अवैज्ञानिक मिथ्या ,
पीढ़ी को लिए वहमों में ढलती जाए .

ہے بات کوئی گاڑی یوں چلتی جاۓ 
وگیان کے یگ میں بھی پھسلتی جاۓ 
ڈھوتی رہے سر پہ اویگیانک متھیا 
پیڑھی کو لئے وہموں میں ڈھلتی جے ٠ 



इक उम्र पे रुक जाए, जूँ बढ़ना क़द का,
कुछ लोगों में हश्र है, इसी तरह खिरद1 का,
मुजमिद2 खिरद को ढोते हैं सारी उम्र,
रहता है सदा पास मुसल्लत3 हद का.
1- बौधिक छमता 2-जमी हुई 3-थोपी हुई 

اک عمر میں روک جاۓ، جوں بڑھنا قد کا 
کچھ لوگوں میں حشر ہے ، اسی طرح خرد کا
منجمد خرد کو، ڈھوتے ہیں ساری عمر 
رہتا ہے صدا پاس، مسلّط حد کا 


कुछ रुक तो ज़माने को जगा दूं तो चलूँ,
मैं नींद के मारों को हिला दूं तो चलूँ,
ऐ मौत किसी मूज़ी को जप कर आजा,
सोई हुई उम्मत* को उठा दूं तो चलूँ.
*मुसलमानों  

کچھ رک تو، زمانے کو جگا دوں تو چلوں 
میں نیند کے ماروں کو، ہلا دوں تو چلوں 
ایے موت کسی موذی کو، جپ کر آ جا 
سوئی ہوئی امّت کو، جگا دوں تو چلوں ٠
********************

Monday, December 5, 2016

Junbishen 775



Rubaaiyan

तहरीक सदाक़त1 हो दिलों में पैदा ,
तबलीग़ जिसारत2 हो दिलों में पैदा ,
बतला दो ज़माने को खुद भी बुत है ,
फितरत3 की अक़ीदत4 हो दिलों में पैदा
१ सच्चै २ साहस ३ लौकिक ४ आस्था 
تحریک صداقت ہو دلوں میں پیدا 

تبلیغ جسارت ہو دلوں میں پیدا
بتلا دو زمانے کو ، خدا بھی بت ہے 
فطرت کی عقیدت ہو دلوں میں پیدا ٠ 



सौ बार करो गौर ग़लत तुम तो नहीं ,
हो जाए अगर अपने ख़यालों पे यकीं ,
कंजोर बनो और न मुआफ़ी मांगो ,
बकती रहे दुन्या , बुलाता फिरे दीं .

سو بار کرو غور ، غلط تم تو نہیں 
ہو جاۓ اگر اپنے خیالوں پہ یقیں
کمزور بنو اور نہ معافی مانگو 
بکتی پھرے دنیا ، بلاتا رہے دیں ٠



आज़ादी है सभी को कोई कुछ माने ,
अजदाद* के जोगी को पयम्बर जाने ,
या अपने कोई एक खुदा को गढ़ ले ,
गुस्ताखी है औरों को लगे समझाने .
*पूर्वज 

آزادی ہے سبھی کو کوئی کچھ مانے
اجداد کے جوگی کو پیمبر جانے 
آزاد ہے وہ اپنے خدا کو گڑھ لے 
گستاخ ہے آوروں کو لگے سمجھانے ٠ 

*********

Friday, December 2, 2016

Junbishen 774

रुबाईयाँ 

दिल वह्यी ओ इल्हाम से मुड जाता है, 
हक शानासियों से जुड़ जाता है,
देख कर ये पामालिए सरे-इंसान,
'मुंकिर' का दिमाग़ भक्क से उड़ जाता है. 

دل ندا و الہام سے مڑ جاتا ہے 
حق سناشیوں سے وہ جڑ جاتا ہے 
دیکھ کر یہ پامالی ے سر انسان 
منکر کا دماغ بہک سے اڑ جاتا ہے ٠ 


मुझको क्या कुछ समझा, परखा तुम ने ,
या अपने जैसा ही जाना तुमने,
मेरे ईमान में फ़र्क़ लाने का ख़याल ,
चन्दन पे गोया सांप पाला तुमने . 

مجھ کو کیا کچھ ، سمجھا بوجھ تم نے 
یا اپنے جیسا ہی ، جانا تم نے 
میرے ایماں میں ، فرق لانے کا خیال 
چندن پہ ہے گویہ ، سانپ پالا تم نے ٠ 


हो सकता है ठीक दमा, मिर्गी ओ खाज,
बख्श सकता है जिस्म को रोगों का राज,
तार्बियतों* की घुट्टी पिए है माहौल, 
मुश्किल है बहुत मुंकिर ज़ेहनों का इलाज.
*संस्कार 
ہو سکتا ہے ٹھیک ، دما مرگی و کھاج 
بخش سکتا ہے جسم کو روگوں کا راج
ترییتوں کی گھٹی پیے ہے ماحول 
مشکل ہے بہت منکر ذہنوں کا علاج 

******************

Monday, November 28, 2016

Junbishen773



रुबाईयाँ 

इन्सान के मानिंद हुवा उसका मिज़ाज , 
टेक्सों के एवज़ में ही चले राजो-काज,
है दाद-ओ-सितद में वह बहुत ही माहिर,
देता है अगर मुक्ति तो लेता है खिराज.
انسان کے مانند ہوا اسکا مزاج 
ٹیکسوں کے عوض میں ہی چلے راج کاج 
ہے داد و ستد میں وہ بڑا ہی ماہر ،
دیتا ہے گر نجات ، لیتا ہے خراج 


अल्फाज़ के मीनारों में क्या रख्खा है, 
सासों भरे गुब्बारों में क्या रख्खा है,
इस हाल को देखो कि कहाँ है मिल्लत,
माज़ी के इन आसारों में क्या रख्खा है. 
الفاظ کے میناروں میں ، کیا رکھا ہے 
ساسوں بھرے غباروں میں ، کیا رکھا ہے
اس حال میں دیکھو ، کہ کہاں ہے امّت 
ماضی کے ان آساروں میں ، کیا رکّھا ہے 



हिस्सा है खिज़िर* का इसे झटके क्यों हो, 
आगे भी बढ़ो राह में अटके क्यों हो,
टपको कि बहुत तुमने बहारें देखीं,
पक कर भी अभी शाख में लटके क्यों हो.
 लम्बी आयु वाले एक कथित पैग़म्बर *
حصّہ ہے خضر کا، اسے جھٹکے کیوں ہو 
آگے بھی بڑھو ، راہ میں اٹکے کتوں ہو 
تپکو کہ بہت تھمنے بہاریں دیکھیں 
پک کر بھی ابھی ڈال میں اٹکے کیوں ہو 

*****************

Friday, November 25, 2016

Junbishen 772

रुबाईयाँ 

हैवान हुवा क्यूँ न भला, तख्ता ए मश्क़
इंसान का होना है, रज़ाए अहमक
शैतान कराता फिरे, इन्सां से गुनाह
अल्लाह करता रहे, उट्ठक बैठक
حیوان ہوا کیوں نہ بھلا تختہ ے مشق 
انسان کا ہونا ہے رضا ے احمق 
شیطان کرتا پھرے ، انساں سے گناہ 
الله کرا تا رہے ، اٹھک بیٹھک 




साइंस की सदाक़त पे यकीं रखता हूँ,
अफकार ओ सरोकार का दीं रखता हूँ, 
सच की देवी का मैं पुजारी ठहरा, 
बस दिल में यही माहे-जबीं रखता हूँ.
سائنس کی صداقت پہ یقیں رکھتا ہوں 
افکار و سروکار کا دیں رکھتا ہوں 
سچ کی دیوی کا میں پجاری ٹھہرا 
بس دل میں یہی ماہ جبیں رکھتا ہوں 



ना ख्वान्दा ओ जाहिल में बचेंगे मुल्ला,
नाकारा ओ काहिल में बचेगे मुल्ला,
बेदार के क़ब्जे में समंदर होगा, 
सीपी भरे साहिल पे बचेगे मुल्ला.
نا خواندہ و جاہل میں بچینگے مللہ 
نا کارہ و کاحل میں بچینگے مللہ 
بیداروں کے قبضے میں سمندر ہوگا 
سیپی بھرے ساحل بچینگے مللہ

Monday, November 21, 2016

Junbishen 771


रुबाईयाँ 


हैवान हुवा क्यूँ न भला, तख्ता ए मश्क़
इंसान का होना है, रज़ाए अहमक
शैतान कराता फिरे, इन्सां से गुनाह
अल्लाह करता रहे, उट्ठक बैठक

حیوان ہوا کیوں نہ بھلا تختہ ے مشق 
انسان کا ہونا ہے رضا ے احمق 
شیطان کرتا پھرے ، انساں سے گناہ 
الله کرا تا رہے ، اٹھک بیٹھک 

साइंस की सदाक़त पे यकीं रखता हूँ,
अफकार ओ सरोकार का दीं रखता हूँ, 
सच की देवी का मैं पुजारी ठहरा, 
बस दिल में यही माहे-जबीं रखता हूँ.
سائنس کی صداقت پہ یقیں رکھتا ہوں ، 
افکار و سروکار کا دیں رکھتا ہوں ،
سچ کی دیوی کا میں پجاری ٹھہرا ،
بس دل میں یہی ماہ جبیں رکھتا ہوں . 

ना ख्वान्दा ओ जाहिल में बचेंगे मुल्ला,
नाकारा ओ काहिल में बचेगे मुल्ला,
बेदार के क़ब्जे में समंदर होगा, 
सीपी भरे साहिल पे बचेगे मुल्ला.
نا خواندہ و جاہل میں بچینگے مللہ 
نا کارہ و کاحل میں بچینگے مللہ 
بیداروں کے قبضے میں سمندر ہوگا
سیپی بھرے ساحل بچینگے مللہ 

*************

Friday, November 18, 2016

Junbishen 770

रुबाईयाँ


मज़हब है रहे गुम पे, दिशा हीन धरम हैं,
आपस में दया भाव नहीं है, न करम हैं,
तलवार, धनुष बाण उठाए दोनों,
मानव के लिए पीड़ा हैं, इंसान के ग़म हैं।

مذہب ہے رہ گم پہ ، دشا ہین دھرم 
آپس میں دیا بھاؤ نہیں ہے ، نہ کرم 
تلوار ، دھنش بان ، اٹھاۓ دونو 
مانؤ کے لئے پیڑا ہیں ، انسان کے غم ٠ 
****
सच्चे को बसद शान ही, बन्ने न दिया
बस साहिबे ईमान ही, बन्ने न दिया
पैदा होते ही कानों में, फूँक दिया झूट
इंसान को इंसान ही, बन्ने न दिया
بچے کو بصد شان ہی بننے نہ دیا 
بس صاحب ایمان ہی بننے نہ دیا 
پیدا ہوتے ہی کان میں پھونک جھوٹ 
انسان کو انسان ہی بننے نہ دیا
***
ये लाडले, प्यारे, ये दुलारे मज़हब
धरती पे घनी रात हैं, सारे मज़हब
मंसूर हों, तबरेज़ हों, या फिर सरमद
इन्सान को हर हाल में, मारे मज़हब
یہ لاڈلے پیارے ، یہ دلارے مذہب 
دھرتی پہ گھنی رات ہیں سارے مذہب 
منصور ہوں ، تبریز ہوں یا پھر سرمد 
انسان کو ہر حال میں مارے مذہب 
***

Thursday, November 17, 2016

Junbishen 769

मुस्कान 

भतीजे के नाम 

मत आना इनके जाल में ऐ मेरे भतीजे ,
अक़्साम इए खुद हैं ये क़यासों के नतीजे। 

जो बात तुझे लगती हो फ़ितरत के मुख़ालिफ़ ,
उस बात पे हरगिज़ न मेरे लाल पसीजे। 

जालों को बिछाए हैं ये रिश्तों के शिकारी ,
बहने हों कि भाई हों कि साले हों कि जीजे। 

मिटटी को निजी चाक के तू कर दे हवाले ,
माँ बाप की मुठ्ठी तो रहेंगी तुझे मींजे। 

दिखला दे ज़माने को तेरा रंग ही जुदा है ,
टक्कर में तेरे कोई भी दूजे हैं न तीजे।

بھتیجے کے نام 

مت آنا انکے جال میں ایے میرے بھتیجے 
اقسام ے خدا ہیں یہ  قیاسوں کے نتیجے 

جو بات تجھے لگتی ہو فطرت کے مخالف 
اس بات پہ  ہرگز نہ میرے لعل پسیجے 

جالوں کو بچھاۓ ہیں یہ رشتوں کے شکاری 
بہنیں ہوں کہ بھائی ہوں کہ سالے ہوں کہ جیجے 

مٹتی کو نجی چاک کے تو کر دے حوالے 
ماں باپ کی مٹھی تو رہیگی تجھے مینجے 

دکھلا دے زمانے کو تیرا رنگ ہی جدا ہے 
ٹکّر میں تیرے کوئی بھی دوجے ہیں نہ تیجے 


Monday, November 14, 2016

Junbishen 768



चेहरे 

सीमीं ज़ुल्फ़ें हैँ , नुकरई चेहरा ,
तोले माशे क कीमती चेहरा। 

दिल को बहलाऊँ याकि दहलाऊं ?
देख कर उसका रुस्तमी चेहरा।

पीकदानों के पास रहता है ,
कथ्थई मुंह है , गुटकई चेहरा।

रुख पे रौनक़ उधार की सी है 
है बखीली , किफायती चेहरा।

चल  नहीं पाता , अन्न क दुश्मन ,
तन घिड़ौची है , मटकई चेहरा।

हम भी दुम्बों से गोश्त छीनेंगे ,
है ये ग़ुरबत का आरजी चेहरा।

तुम पे यह इल्म है मुसल्लत सा ,
उतार फेंको , क़ाग़ज़ी चेहरा।

चेहरा मुंकिर का , दिल के जैसा है ,
ख़ूब सूरत , सलोनवी चेहरा।


چہرے 


سیمیں زلفیں ہیں، نقرئی چہرہ 
تولے ماشے کا، قیمتی چہرہ ٠ 
دل کو بہلاؤں، یا دہلاؤں 
دیکھ کر اسکا، رستمی چہرہ ٠ 
پیک دانوں کے پاس رہتا ہے 
کتھتھئی منہ ہے، گٹکئی چہرہ ٠ 
رخ پہ رونق ، ادھار کی سی ہے ،
ہے بخیلی ، کفایتی چہرہ ٠ 
چل نہیں پاتا انن کا دشمن 
تن گھڑوچی ہے مٹکئی چہرہ ٠ 
ہم بھی دمبوں سے، گوشت چھینیگے 
ہے یہ غربت کا، عارضی چہرہ ٠ 
تم پہ یہ علم، ہے مسلّط سا 
اب اتارو، یہ کاغذی چہرہ ٠ 
چہرہ 'منکر' کا دل ہی جیسا ہے 
خوب صورت سلونوی چہرہ ٠ 

**********

Friday, November 11, 2016

Junbishen 767

मुस्कुराहटें 

शेखू ----

हर सच पे ही लाहौल1 पढ़ा करता है शेखू ,
हर झूट दलीलों से गढा करता है शेखू।

चाट करता है बेवाओं , यतीमों की अमानत,
कुफ़्फ़ारह2 दुआओं से, अदा करता है शेखू ।

देता है सबक सब को, क़िनाअत 3की सब्र की ।
ख़ुद मुर्गे-मुसल्लम पे, चढा करता है शेखू ।

दो बीवी निंभाता है, शरीअत4 के तहत वह,
दोनों को फ़क़त निस्फ़,5 अता करता है शेखू ।

हर शाम मुरीदों को चराता है इल्मे-ताक,
हर सुब्ह इल्मे-खाक पढ़ा करता है शेखू ।

बख्शेगी इसे दुन्या, न बख्शेगा खुदा ही ,
'मुंकिर' ये खताओं पे खता करता है शेखू ।

१-धिक्कार २- प्रायश्चित ३-संतोष ४-धर्म-विधान ५-आधा
*
شیخوووو 

ہر سچ پہ ہی لاحول، پڑھا کرتا ہے شیخو 
ہر جھوٹ دلیلوں سے، گڑھا کرتا ہے  شیخو٠ 
چٹ کرتا ہے بیواؤں ، یتیموں کی امانت 
کفّارہ دعاؤں سے، ادا کرتا ہے  شیخو٠ 
دیتا ہے سبق سب کو، قناعت کی رضا کی 
خود مرغ مسلّم پہ، چڑھا کرتا ہے  شیخو ٠ 
دو بیوی نبھاتا ہے ، شریعت کے تحت وہ
دونوں کو فقط نصف، دیا کرتا ہے  شیخو٠ 
ہر شام مریدوں کو،  چراتا ہے حدیثیں 
خود جنکو شب و روز، گڑھا کرتا ہے شیخو ٠ 
بخشیگی اسے دنیا ، نہ بخشےگا خدا ہی 
'منکر'جی ! خطاؤں پہ خطا کرتا ہے  شیخو ٠ 

*********

Thursday, November 10, 2016

Junbishen 766



मुस्कुराहटें 
फकीर का ज़मीर

कम बख्त इक फ़कीर जो दफ्तर में आ घुसा,
बोला कि बेटा जीता रहे, लिख दे ख़त मेरा।
कागज़, कलम था हाथ में, बढ़ कर थमा दिया,
मैं ने भी कारे-खैर यह फ़ैसला किया।
कहने लगा कि जोरू को लिख दे मेरा सलाम,
लिख दे कि आज कल ज़रा ढीला है अपना काम।
माहे-रवाँ में लिख दे कि गर्दिश मेहरबां,
इस वजह सिर्फ़ साठ सौ रपया है कुल रवां।
अगले महीने काफी बचत की उम्मीद है,
हिंदू की है दीवाली, मुसलमां की ईद है।
मैं ने कहा ये लो, बुरे हल लिख दिया,
कहने लगा कि, "बेटा अब हो जाए कुछ भला"
यह सुन के सर फिरा तो तवाज़ुन1 बिगड़ गया,
मुंह से निकल गया कि तेरी --------------

१-संतुलन

*
فقیر کا ضمیر 

کمبخت ، اک فقیر کل دفتر میں آ گھسا 
بولا کہ بیٹا جیتا رہے ، لکھ دے خط مرا 
کاغزقلم مجھے، بسماجت تھما دیا 
میں نے نیے ثواب کا ، یہ قصد جو کیا 
کہنے لگا کہ جورو کو، لکھ دے مرا سلام 
لکھ دے کہ آج کل ذرا، ڈھیلا ہے اپنا کام 
ماہ رواں میں لکھ دے، کہ گردش ہے مہرباں 
اس وجہ صرف ساٹھ سو روپیہ ہیں کل رواں ٠ 
اگلے مہینے کافی بچت کی امید ہے 
ہندو کی دیوالی ہے ، مسلماں کی عید ہے ٠ 
میں نے کہا ، یہ لو کہ برے حال لکھ دیا 
کہنے لگا کہ بھیّہ جی! ہو جاۓ کچھ بھلا ٠ 
یہ سن کے سر پھرا ، تو توازن بگڑ گیا 
منہ سے نکل گیا کہ تیری - - - - - - ٠

Monday, November 7, 2016

Junbishen 765



छीछा लेदर

ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी,
भए न्याय के सब अधिकारी।
इन सब को अपराधी जान्यो,
सभै की मौन समाधि जान्यो।
निर्बल जीव को पापी संजयो,
ताड़क को परतापी समझयो।
इनके मूडे सींग उग आई,
इनके मार से कौन बचाई?
गंवरा भए शहर के बासी,
न्याय धीश हैं चमरा पासी।
पशुअन तक सनरक्षन पाइन,
सवरण जान्यो जनम गंवाइन।
नारी माँ बेटी बन बनयाई,
तुलसी बाबा राम दुहाई।
*
چھچھ لیدر 

دھول گنوار شودر پشو ناری 
بھئے نیاۓ کے سب ادھیکاری 
ان سب کو اپرادھی جانیو 
سبھے کے ایک سمادھی جانیو 
نربل جیو کو پپی سمجھیو 
ترک کو پرتآپی سمجھیو 
انکے موڑے سینگ اگ آئ 
انکے مار سے کؤن بچائی 
گنورا بھئے شہر کے باسی 
نیاے دہش ہیں چمڑا پاسی 
پشوون تک سنرکچھن پائن 
سورن جانیو جنم گوائن 
ناری ماں بیٹی بنیائی 
تلسی بابا رام دہائی ٠  

Friday, November 4, 2016

Junbishen 764





डुबोया मुझको होने ने 

जनम है इक जंजाल अजन्मो , जनम से जान बचाना तुम , 
मेरी बात नहीं माने तो, जीवन भर पछताना तुम .
जनम अगर हिन्दू में पाया , छूत छात में जाना तुम .
जनम अगर मुस्लिम में पाया , जड़ अपनी कटवाना तुम .
जनम अगर सिख्खों में पाया, बाल के जाल रखाना तुम. 
जनम अगर बुद्धों में पाया, तो भिक्षु बन जाना तुम .
धरम का चूहेदान जो बदला , ईसोई बन जाना तुम. 
या तो बाबा की कुटिया पर धूनी कहीं रमाना तुम .

नहीं अगर माने तो आकर, घुट घुट कर मर जाना तुम ,
प्रदूषण है जात पात की , आकर आन गंवाना तुम ,
जनम की खातिर नहीं उचित है, भारत का माहौल अभी ,
कुछ सदियों तक रुके रहो, जनम पे हो लाहौल अभी .,

******

ڈبویا مجھکو ہونے نے 

جنم ہے اک جنجال اجنمو ! جنم سے جان بچانا تم 
 میری بات نہیں مانے تو، جیون بھر پچھتانا تم 
جنم اگر ہندو میں پایا، چھوت چھات میں جانا تم
جنم اگر مسلم میں پایا ، جڑ اپنی کٹوانا تم 
جنم اگر سکھوں میں پایا، بال کے جال رکنا تم 
جنم اگر بدھوں میں پایا ، بھکچھ پاتر اٹھانا تم 
دھرم کا چوہادان جو بدلہ ،چنگے منگے ہو جانا تم 
یا تو بابا کی کٹیا پر دھونی کہیں رمانا تم 
نہیں اگر مانے تو آکر گھٹ گھٹ کر مر جانا تم 
عمل دخل ہے جات پات کا، آکر آ ن گوانا تم 
جنم کی خاطر نہیں مناسب، بھارت کا ماحول ابھی 
 کچھ صدیوں تک رکے رہو ، جنم پہ ہو لاحول ابھی  

*************

Wednesday, November 2, 2016

Junbishen 763



मुस्कान 

साझेदारी 

फ़न का माहिर हूँ ज़ात रखता हूँ ,
मैं उरूज़ी बिसात रखता हूँ ,
बस कि आवाज़ ही नहीं पाई ,
तुम में मूसूक़ी है मेरे भाई .
आओ ग़जलों का कारोबार करें ,
अपनी ग़ुरबत को शर्म सार,
दाल रोटी का कुछ सहारा हो ,
ग़ज़लें मेरी गला तुम्हारा हो ,
आधे आधे की हिस्से दारी हो ,
मैं हूँ शायर कि तुम मदारी हो . 
*

ساجھیداری 

فن کا ماہر ہوں ، ذات رکھتا ہوں 
میں عروضی بساط رکھتا ہوں 
بس کہ آواز ہی نہیں پائی 
تم میں موسوقیت ہے ائے بھائی 

آ و غزلوں کا کاروبار کریں 
اپنی غربت کو شرم سار کریں 
دال روٹی کا کچھ سہارا ہو 
غزلیں میری ، گلا تمہارا ہو 
تم اپنے نام سے میرا کلام پڑھتے رہو 
میری روحوں پہ راگ مڑھتے رہو 
آدھے آدھے کی حصّے داری ہو
 ہم ہیں شائر کہ تم مداری ہو ٠ 

****

Friday, October 28, 2016

Junbishen 762


क़तआत
ज़ीने बज़ीने


जो छोड़ के बरेली को पहुँचे हैं देवबंद ,
क़िस्तों में कर रहे हैं वह तब्दीलियाँ पसंद ,
बस थोड़े फासले पे है इंसानियत की राह ,
करते रहें सफ़र कि रहे हौसला बुलंद .

زینہ بزینہ 

وہ چھوڑ کے بریلی کو پہنچے ہیں دیو بند 
قسطوں میں کر رہے ہیں تبدیلیاں پسند 
بس تھوڑے فاصلے پہ ہے انسانیت کی راہ 
کرتے رہیں سفر ، کہ رہے حوصلہ بلند ٠



वादा तलब

नाज़ ओ अदा पे मेरे न कुछ दाद दीजिए ,
मत हीरे मोतियों से मुझे लाद दीजिए ,
हाँ इक महा पुरुष की है, धरती को आरज़ू ,
मेरे हमल को ऐसी इक औलाद दीजिए .


وعدہ طلب

ناز و ادا پہ میرے نہ کچھ داد دیجئے 
مت ہیرے موتیوں سے مجھے لاد دیجئے 
ہاں ! اک "مہا پروش " کی ہے دھرتی کو آرزو 
میرے شکم سے ایسی ، اک اولاد دیجئے ٠


काश 

तोहफ़ा पाने का हसीं एहसास होती ज़िंदगी ,
ज़िंदा रहने के लिए यूँ रास होती ज़िंदगी ,
नब्ज़ मंडलाती न हरदम यूँ बक़ा के वास्ते ,
धड़कने होतीँ न , पैहम सास होती ज़िंदगी .


کاش 

تحفہ پانے کا حسین ، احساس ہوتی زدگی 
زندہ رہنے کے لئے ، یوں راس ہوتی زندگی 
نفس منڈلاتی نہ ہردم یوں ، بقا کے واسطے 
دھڑکنیں ہوتیں ، نہ پیہم سانس ہوتی زندگی ٠ 
*

Thursday, October 27, 2016

xx


Junbishen 762


क़तआत 

मिठ्ठू मियाँ 


पढ़ते हो झुकाए हुए सर क़िस्सा कहानी,
अंजान जुबां में है लिखी देव की बानी ,
यूँ लूट के ले जाते हो अंबार ए सवाब ,
दर पे हैं अज़ाबों के ये हालात जहानी .

مٹھو میاں

پڑھتے ہو جھکاۓ ہوئے سر ، قصّہ کہانی ،
انجان زباں میں ہے لکھی ، دیو کی بانی ،
یوں لوٹ کے پا جاتے ہو ، انبار ثواب ،
در پہ ہیں عذابوں کے ، یہ حالت جہانی ٠ 


मुज़ब्ज़ब 

इकबाल बग़ावत लिए लगते हैं ग़ज़ल में,
डरते हैं, सदाक़त को छिपाए हैं, हमल में,
बातिन में हैं कुछ और, निभाए हैं खुद को,
जैसे थे मुसलमाँ नए, बुत दाबे बग़ल में .

مذبذب

اقبال بغاوت لئے ، لگتے ہیں غزل میں ،
ڈرتے ہیں ، صداقت کو چھاپے ہیں حمل میں ،
باطن میں ہیں کچھ اور ، نبھاۓ ہیں خدا کو ،
جیسے تھے مسلماں نیے ، بت دا بے بغل میں ٠ 



वहमों के क़ैदी 

कुछ लोग खुद में पाले हैं इक ऐसा जानवर ,
हर वक़्त खुद इन्हें ही जो घायल किया करे ,
दिखला के सींग इनको सवाब ओ अज़ाब की ,
कर जुंबिश ए हयात पे क़ायल किया करे .


وہموں کے قیدی 

کچھ لوگ خود میں پالے ہیں اک ایسا جانور 
ہر وقت خود انہیں ہی جو گھائل کیا کرے 
دکھلا کے سینگ انکو ثواب و عذاب کی 
ہر جنبش حیات پہ قائل کیا کرے

Wednesday, October 19, 2016

Junbishen 758

qataat

कुछ न समझे खुदा करे कोई 

हिन्दू के लिए मैं इक, मुस्लिम ही हूँ आखिर ,
मुस्लिम ये समझते हैं, गुमराह है काफ़िर ,
इंसान भी होते हैं, कुछ लोग जहाँ में ,
गफ़लत में हैं ये दोनों, समझाएगा 'मुनकिर';

قطعات 

ہندو کے لئے میں اک مسلم ہی ہوں آخر 
مسلم یہ سمجھتے، ہیں گمراہ ہے کافر 
انسان بھی ہوتے ہیں، کچھ لوگ جہاں میں 
غفلت میں ہیں یہ دونوں ، سمجھایگا منکر


ज़िन्दगी कटी

बन्ने का और संवारने का मौक़ा न मिल सका,
खुशियों से बात करने का मौक़ा न मिला सका,
बन्दर से खेत ताकने में ही ज़िन्दगी कटी,
कुछ और कर गुजरने का मौक़ा न मिल सका।

زندگی کٹی

بننے اور سنوارنے کا موقعہ نہ مل سکا 
خوشیوں سے بات کرنے کا ، موقعہ نہ مل سکا 
بندروں سے فصل ، بچانے میں کٹ گئی 
کچھ اور کر گزرنے کا، موقعہ نہ مل سکا ٠



बुख्ल(कृपण)

बन के बीमार लेट लेता हूँ,
मुंह पे चादर लपेट लेता हूँ,
ऐ शनाशाई१ तेरी आहट से,
अपनी किरनें समेट लेता हूँ।
१-परिचय

بخل

بن کے بیمار لیٹ لیتا ہوں 
منہ پہ چادر لپیٹ لیتا ہوں 
ایے شناسائی تیری آہٹ سے 
اپنی کرنیں سمیٹ  لیتا ہوں ٠

**************

Monday, October 17, 2016

Junbishen 757

قطعات 

कुछ न समझे खुदा करे कोई 

हिन्दू के लिए मैं इक, मुस्लिम ही हूँ आखिर ,
मुस्लिम ये समझते हैं, गुमराह है काफ़िर ,
इंसान भी होते हैं, कुछ लोग जहाँ में ,
गफ़लत में हैं ये दोनों, समझाएगा 'मुनकिर';

ہندو کے لئے میں اک مسلم ہی ہوں آخر 
مسلم یہ سمجھتے، ہیں گمراہ ہے کافر 
انسان بھی ہوتے ہیں، کچھ لوگ جہاں میں 
غفلت میں ہیں یہ دونوں ، سمجھایگا منکر

ज़िन्दगी कटी

बन्ने का और संवारने का मौक़ा न मिल सका,
खुशियों से बात करने का मौक़ा न मिला सका,
बन्दर से खेत ताकने में ही ज़िन्दगी कटी,
कुछ और कर गुजरने का मौक़ा न मिल सका।

زندگی کٹی

بننے اور سنوارنے کا موقعہ نہ مل سکا ،
خوشیوں سے بات کرنے کا ، موقعہ نہ مل سکا ،
بندروں سے فصل ، بچانے میں کٹ گئی ،
کچھ اور کر گزرنے کا، موقعہ نہ مل سکا ٠


बुख्ल(कृपण)

बन के बीमार लेट लेता हूँ,
मुंह पे चादर लपेट लेता हूँ,
ऐ शनाशाई१ तेरी आहट से,
अपनी किरनें समेट लेता हूँ।
१-परिचय

بخل

بن کے بیمار لیٹ لیتا ہوں ،
منہ پہ چادر لپیٹ لیتا ہوں ،
ایے شناسائی تیری آہٹ سے ،
اپنی کرنیں سمیٹ  لیتا ہوں ٠
**************