Monday, July 16, 2018

जुंबिशें - - - नज़्म 3



3

ख़्वाहिशे पैग़म्बरी

जी में आता है कि मैं भी, इक ख़ुदा पैदा करुँ,
पहले जैसों ही, सदाक़त1 में रिया2 पैदा करुँ.

कुछ ख़ता पैदा करुँ, फ़िर कुछ सज़ा पैदा करुँ,
मौत से पहले ही इक, यौमे जज़ा3 पैदा करुँ.

आऊँ और जाऊं पहाडों पर, निदा4 के वास्ते,
वह्यि5 सी, या देव वाणी सी, सदा पैदा करुँ.

गढ़ के इक हुलिया निकालूँ , ख़ुद को इस मैदान में,
सब से हट कर इक अनोखी ही अदा पैदा करुँ.

मुह्मिलों6 में फ़लसफ़े राग माले डाल कर,
आश्रम में रख के, अपना बुत ग़िज़ा पैदा करुँ.

उफ़! कि दिल के क़ैद ख़ाने में है 'मुंकिर' का ज़मीर,
कैसे मासूमों के ख़ातिर, मैं दग़ा पैदा करुँ.

१-सत्य २-मिथ्य ३-प्रलय के बाद इनाम पाने का दिन
 ४-आकाशवाणी ५-ईश्वानी ६- अर्थ हीन और अनरगल 

خواہشِ پیغمبری

،جی میں آتا ہے کہ ، میں بھی اک خُدا پیدا کروں
پہلے جیسوں ہی ، صداقت میں رِیا پیدا کروں٠

،کچھ خطا پیدا کروں ، پھر کچھ سزا پیدا کروں
موت سے پہلے ہی، اِک یومِ جزا پیدا کروں٠

،آؤں  اور جاؤں پہاڑوں پر ، ندا کے واسطے
وحیی سی یا دیو وانی ، سی صدا پیدا کروں٠ 

،گڑھ کے اک حلیہ نکالوں ، خود کو اس میدان میں
سب سے بڑھ کر، اِک انوکھی ہی ادا پیدا کروں٠

،مُحملوں میں فلسفے کے ، راگ مالے ڈال کر
آشرم میں رکھ کے ، اپنا بُت غذا پیدا کروں٠

،اُف ! کہ دل کے قید خانے میں ، ہے 'منکر' کا ضمیر
کیسے معصوموں کی خاطر ، میں دغا پیدا کروں٠ 

Sunday, July 15, 2018

जुंबिशें - - - नज़्म 2 ह्म्द



2

ह्म्द1

तेरी संगत तो मुश्किल, कि ऐ मौला निभा पाऊँ,
अज़ाबों  में तेरे ख़ुद को, हमेशा मुब्तिला पाऊँ.

अक़ीदा है मगर कितना ख़तरनाकी की हद में है,
कि तुझ पर सर झुका कर ही, सरे अक़दस उठा पाऊँ.

तमसख़ुर को बुरा माने, तू संजीदा हुवा वाक़अ,
तुझे गर भूल ही जाऊं थोड़ा मुस्कुरा पाऊँ.

बड़ा ही मुन्तक़िम है तू , चला करता है चालें भी,
कहीं मफ़रूर होकर ही अदू १० से सर बचा पाऊँ.

अना११ तेरी रक़ीबाना१२, है क़ायम वाहिदे मुतलक़१३,
बड़ा मुश्किल मुक़ामे किब्रियाई१४ है, अमाँ पाऊँ.

नमाज़ो, हज, ज़कातो, रोज़ा दारी१५, क़र्ज़ हैं तेरे,
हयाते ख़ुश नुमा१६ को, गर सज़ा दूँ तो चुका पाऊँ.

मुझे मंज़ूर हैं दोज़ख़  की सारी कुल्फ़तें१७ 'मुंकिर',
तलाशे हक़१८ में मर जाऊं, तो कोई भी सज़ा पाऊँ.

१-वन्दना २-विपत्ति ३-आस्था ४-पवित्र शीश ५-हस-परिहास ६-गंभीर ७-स्थापित होना
८-प्रति शोध ९-पलायन वादी १०-शत्रु ११आत्म सम्मान १२-दुश्मनी १३- एकेश्वर ४-ईश्वरीय श्रेष्टता
१५-ये चार इस्लाम के मूल-भूत कर्म-कांड हैं १६-सुखी जीवन १७-यातनाएं १८-सत्य की खोज .

حمد

،تری سنگت تو مشکل ہے، کہ اے مولا نبھا پاؤں
عذابوں میں ترے خود کو، ہمیشہ مبتلا پاؤں٠ 

،عقیدہ ہے مگر کتنی خطرناکی کی حد میں ہے
کہ تجھ پرسرجھکا کر ہی، سرِاقدس اٹھا پاؤں٠

،تمسخر کو برا مانے، تو سنجیدہ ہوا واقع 
تجھے گر بھول ہی جاؤں، تو تھوڑا مسکرا پاؤں٠ 

،بڑا ہی متقیم ہے تو، چلا کرتا ہے چالیں بھی
کہیں مفرور ہوکر ہی، عدو سے سر بچا پاؤں٠ 

، انا تیری رقیبانہ، ہے قائم واحد متلعق
بڑا مشکل مقام کبریائی ہے، اماں پاؤں٠ 

،نمازوحج، زکات و روزہ داری، قرض ہیں تیرے
حیات خوش نما کو گر، سزا دوں تو چکا پاؤں٠
  
،مجھے منظور ہیں دوزخ کی ، ساری کلفتیں منکر
تلاشِ حق میں مر جاؤں، تو کوئی بھی سزا پاؤں٠ 



Saturday, July 14, 2018

जुंबिशें - - - नज़्म 1 बइस्म ए सिद्क़




1

बइस्म ए सिद्क़ 1

(सच्चाई के नाम से शुरू करता हूँ )

यह जुम्बिशें हैं दिल की, बेदारी2 सू ए ज़न2 की,
हैं रूह की ख़राशें, टीसें हैं मेरे मन की.

रस्मो की बारगाहें3, बाज़ार हैं चलन की,
बोसीदा4 हो चुकी हैं, दूकानें यह सुख़न5 की. 

फ़रमान ए साबक़ा6 के, ऐ बाज़ गश्तो ठहरो,
अब होगी आज़माइश, थोड़े से बाँकपन की.

आतिश फ़िशाँ8 की नोबत, आए तो क्यों न आए,
बेचैन हो चुकी हैं, पाबंदियाँ दहन* की.

जिस झूट में सदाक़त10, साबित हुई हो शर से,
उस सिद्क़11 को ज़रूरत, है गोर12 और कफ़न की.

तअलीम नव13 के तालिब14, अब अर्श१५ छू रहे हैं,
डोरी न इनको खींचे, इन शेख़ व बरहमन की.

गर दिल पे बोझ आये, ईमान छटपटाए,
ऐसे क़फ़स१६ से निकलो, छोडो फ़िज़ा चुभन की.

हम सब ही आलमीं17 हैं, भूगोल सब की माँ है,
आओ बढ़ाएँ अज़मत18, हम मादर ए वतन की.

धर्मो से पाई मुक्ति, मज़हब से पाई छुट्टी,
इंसानियत की बूटी, पीडा हरे है मन की.

तअमीर19 में है बाक़ी, जो ईंट, वह है 'मुंकिर',
मेमार20 इसको चुन दे, तकमील21 हो चमन की.

१-प्रचलित बिस्मिल्लाह या श्री गणेश २-जागरण 2+ MITURITY३-दरबार ४-जीर्ण ५-वाणी ६-पुरानेआदेश 
७-प्रति -ध्वनी ८-ज्वाला-मुखी ९-मुख (दहन =मुँह)१० सत्यता 11-सत्य 12 -कब्र १३-नवीं शिक्छा १४-इच्छुक 
१५-आकाश १६-पिंजडा १७-अन्तर राष्ट्रीय 18 मर्यादा 19-रचना 20-रचना कार २१-सम्पूर्णता.

بئسمِ صدق 

،یہ جُنبشیں ہیں دل کی، بیداری سوئےِزن کی
ہیں روح کی خراشیں، ٹیسیں ہیں میرے من کی٠

،رسموں کی بارگاہیں، بازار ہیں چلن کی
بوسیدہ ہو چکی ہیں، دوکانیں یہ سُخن کی٠

،فرمانِ گزشتہ کی، ائے بازِگشتو ٹھہرو
تم میں ہے آزمائش، تھوڑے سے بانک پن کی٠

،آتش فشاں کی نوبت، آتی تو کیوں نہ آتی
بے چین ہو چُکی تھیں، پابندیاں دَہن کی٠

،جس جھوٹ کی صداقت، ثابِت ہی ہو شر سے
اُس صِدق کو ضرورت، ہے گور اور کفن کی٠ 

،تعلیمِ نَو کے طالب ، ہیں عالمِ  فلک پہ 
 ڈوری نہ ان کو کھینچے، اب شیخ و برہمن کی٠

،گر دل  پہ  بوجھ  آئے، ایمان چھٹپٹائےِ
ایسے قفس سے نکلو، چھوڑو فضا گُھٹن کی٠

،ہم سب ہی عالمی ہیں، بھوگول سب کی ماں ہے
آؤ بڑھأئیں عظمت ، ہم مادرِ وطن کی٠ 

،دھرموں سے پائی مُکتی، مذہب سے پائی چُھٹّی
انسانیت کی بوٹی، پیڑا ہرے ہے من کی٠

،تعمیر میں ہے باقی، جو اینٹ وہ ہے منکر
معمار اسکو چُن دے ، تکمیل ہو وطن کی٠ 

Friday, July 13, 2018

जुंबिशें - - - नज़्म 0 कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई



नज़्में  

0

हिन्दू के लिए मैं इक, मुस्लिम ही हूँ आख़िर ,
मुस्लिम ये समझते हैं, गुमराह है काफ़िर ,
इंसान भी होते हैं, कुछ लोग जहाँ में ,
ग़फ़लत में हैं यह दोनों, समझाएगा 'मुंकिर' .

***

،ہندو کے لئے میں اک مسلم ہی ہوں آخر
،مسلم یہ سمجھتے ہیں گمراہ ہے کافر
،انسان بھی ہوتے ہیں کچھ لوگ جہاں میں
غفلت میں ہیں یہ دونوں ، سمجھایگا 'مکر

Wednesday, July 11, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 112 कहा इस्म आज़म की तशरीह कर,


112

कहा इस्म आज़म की तशरीह कर,
कहा लाइलः की इबारत है यह. 

कहा हर मुसलमाँ , मुसलमाँ का हो,
कहा कि तअस्सुब कुदूरत है यह. 

कहा यह इबादत भी इक कुफ़्र है,
कहा कि क़बीलों की आदत है यह. 

कहा इश्क़ ए मअरूफ़ में डूब जा,
कहा कोई जिंस ए लताफ़त है यह? 

कहा लज़्ज़तों की हक़ीक़त है क्या,
कहा फ़ाक़ा मस्तों को मोहलत है यह. 

कहा तू नफ़ी में ख़ुशी करके चल,
कहा ऐन इद्दत में शिद्दत है यह. 

कहा पाक ए अर्ज़ी की तहरीक कर,
कहा बिद्अतों की तिजारत है यह. 

कहा फिर नए रब की पहचान कर,
कहा कि सदा ए सदाक़त है यह.

इस रचना के हिंदी भावार्थ करना मुहाल है.  

،کہا اِسم اعظم  کی تشریح کر 
کہا لا الہ کی عبارت ہے یہ۰ 

،کہا ہر مُسلماں مُسلماں کا ہو 
کہا کہ تعصّب قدورت ہے یہ۰ 

،کہایہ عبادت بھی ایک کُفر ہے 
کہا کہ قبیلوں کی عادت ہے یہ۰ 

،کہا عشقِ معروف میں ڈوب جا 
کہا کوئی جنس لطافت ہے یہ ؟

،کہا تو نفی میں خوشی کر کے چل 
کہا عین عدّت میں شدّت ہے یہ۰  

کہا لذّتوں کی حقیقت ہے کیا ؟
کہا فاقہ مستوں کو مہلت ہے یہ۰ 

،کہا پاک ارضی کی تحریک ہو 
کہا بدعتوں کی تجارت ہے یہ۰ 

،کہا پھر نئے حق کا اعلان 
کہا کہ صدا ے صداقت ہے یہ۰ 


११२ ग़ज़लों का सिलसिला ख़त्म हुवा.
अब आगे मेरी नज़्में मुलाहिज़ा हों.


Tuesday, July 10, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 111 जहाँ रुक गया हूँ वह मंज़िल नहीं है,


111

जहाँ रुक गया हूँ वह मंज़िल नहीं है,
ये तन आगे बढ़ने के क़ाबिल नहीं है.

 नफ़ी1 लेके मुल्क ए अदम2 जा रहा हूँ,
अजब मुस्बतें3 हैं कि हासिल नहीं हैं.

ज़ईफ़ी, नहीफ़ी4, ग़रीबी, असीरी5,
सदा दे अना6 कोई क़ातिल नहीं है.

जो रूपोश वहशत7, नफ़स8 चुन रही है,
वह ग़ालिब हैं मद्दे मुक़ाबिल नहीं हैं.

तेरे हुस्न की बे रुखी कह रही है,
तेरे पास सब कुछ है, बस दिल नहीं है.

ये मुंकिर नई  रहगुज़र चाहता है,
तुम्हारी क़तारों में शामिल नहीं है.

1 ऋणात्मक 2 अंतिम यात्रा 3 धनात्मक 4 कमजोरी 5 क़ैद 6 आत्म सम्मान 7 डर 8 साँसें  

،جہاں رک گیا ہوں، وہ منزل نہیں ہے
یہ تن آگے بڑھنے کے قابل نہیں ہے٠  

،نفی لیکے ملکِ عدم جا رہا ہوں
عجب مثبتیں ہیں کہ حاصل نہیں ہیں٠  

،ضعیفی، نحیفی، غریبی، اسیری
صدا دے آنا، کوئی قاتل نہیں ہے ؟

،جو روپوش وحشت، نفس چُن رہی ہے
وہ غالب ہے، مد مقابل نہیں ہے٠  

،ترے حسن کی، بے رُخی کہہ رہی ہے 
ترے پاس سب کچھ ہے، بس دل نہیں ہے٠  

،یہ منکر نئی رہگزر چاہتا ہے
تمہاری قطاروں میں شامل نہیں ہے٠  

Monday, July 9, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 110 तलवार है समाज की फ़ितरत के हैं गले ,


110

तलवार है समाज की, फ़ितरत के हैं गले ,
जाए कहाँ पे इश्क़, कहाँ फूले और फले .

दातों तले ज़बान हो, या हाथ तू मले ,
मुंह से तेरे निसल ही गई, बात हल्बले.

क्या खूब हो कि एक हवा, मौत की चले,
शाखों को छोड़ जाएँ सभी, फल सड़े गले. 

ख़बरें फ़ना की और किसी नव जवां को हों,
जुज़्दान में ही रख अभी, क़ब्री मुआमले.

खुद साज़ियाँ मना हैं, तो खुद  सोज़ियाँ हराम,
इस मसलिकी निज़ाम में, मुश्किल हैं मरहले .

किन मौसमों में क्या क्या, बोया कहाँ कहाँ ,
मुंकिर पकी हैं फ़स्ल सभी, जा के काट ले.

साज़ियाँ=संवारना , साज़ियाँ=जलाना 

،تلوار ہے سماج کی، فطرت کے ہیں گلے
جاۓ کہاں پہ عشق، کہاں پھولے اور پھلے٠  

،داتوں تلے زبان ہو، یا ہاتھ تو ملے
منہ سے تیرے نکل ہی گئی، بات ہلبلے٠  

،کیا خوب ہو کہ ایک ہوا، موت کی چلے 
شاخوں کو چھوڑ جایں، سبھی پھل سڑے گلے٠  

،خبریں فنا کی اور، کسی نو جواں کو ہوں
جزدان ہی میں ہی رکھ ابھی، قبری معاملے٠  

،خود سازیاں منع ہیں، تو خود سوزیاں حرام 
اس مسلکی نظام میں، مشکل ہیں مرحلے٠  

،کن موسموں میں کیا کیا، بویا کہاں کہاں 
منکر پکی ہیں فصل سبھی، جا کے کاٹ لے٠