Saturday, June 16, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 89 जब तक रवा रखोगे, मेरे साथ तुम बुख़ालत


89

जब तक रवा रखोगे, मेरे साथ तुम बुख़ालत1,
तब तक न कर सकूँगा, मेरे यार मैं क़िनाअत2.

 बेदारियां ये कैसी? कि जिद्दत हैं सब हराम ,
बेहोशी ही भली थी, तेरा सोना ही ग़नीमत.

क़ुर्बानियों का जज़्बा, मज़ाहिब की तश्नगी3 है,
खूराक़ इनको भाए, वफ़ादारों की शहादत .

 लिपटा हुवा जवाँ है, मज़ारों के देवता से, 
शर्मिंदा जुस्तुजू है4, हमागोश5 है अक़ीदत.

मुमकिन नहीं की ख़ालिक़6, अगर हो तो मुन्तक़िम7 हो, 
होगा अगर जो होगा , माँ बाप की ही सूरत. 

मेरी तरह ही तुम भी, हटा लोगे बोझ दिल का,
क्या शय है फ़िक्र ए मुंकिर, ज़रा समझो इसकी क़ीमत. 

1 कंजूसी 2 संतोष 3 प्यास 4 तलाश 5 लिपटना 6 खुदा 7 प्रति घात

،جب تک روا رکھو گے، میرے ساتھ تم بُخا لت
تب تک نہ کر سکون گا، میرے یار میں قِناعت٠  

،بیداریاں یہ کیسی کہ ، کھنچتا ہے سمت ماضی
بے ہوشی ہی بھلی تھی، ترا سونا ہی غمیمت٠  

،قربانیوں کا جذبہ ، مذاہب کی تشنگی ہے
خوراق انکو بھاۓ، وفا داروں کی شہادت٠  

،لِپٹا ہوا جواں ہے، مزاروں کے دیوتا سے
شرمندہ جُستجو ہے، ہمّہ گوش ہے عقیدت٠  

،ممکن نہیں کہ خالق، اگر ہو تو منتقم ہو
ہوگا اگر جو ہوگا، ماں باپ کی ہی صورت٠  

،میری طرح ہی تم بھی، ہٹا لوگے بوجھ دل کا
کیا شے ہے فکرِ منکر ، ذرا سمجھو اسکی قیمت٠  

Friday, June 15, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 88 अपने घरों में, मंदिर ओ मस्जिद बनाइए


88

अपने घरों में, मंदिर ओ मस्जिद बनाइए,
अपने सरों पे, धर्म और मज़हब सजाइए.

उस सब्ज़ आसमान के, नीचे न जाइए,
इस भगुवा कायनात से, खुद को बचाइए.

सड़कों पे हो नमाज़, न फुटपाथ पर भजन,
जो रह गुज़र अवाम है, उस पर न छाइए.

बचिए ज़ियारतों से, दर्शन की दौड़ से,
थोडा स वक़्त बैठ के, ख़ुद में बिताइए.

परिक्रमा और तवाफ़ के हासिल पे ग़ौर हो,
मत ज़िन्दगी को नक़ली सफ़र में गंवाइए.

बच्चों का इम्तेहान है, बीमार घर पे हैं,
मीलाद ओ जागरण के ये भोपू हटाइए.

अरबों की सर ज़मीन है, जंगों से बद नुमा,
'मुंकिर' वतन की वादियों में घूम आइए.

***

،اپنے گھروں میں مندر و مسجد بنائے 
اپنے سروں پہ دھرم اور مذهب سجائے٠ 

،اس سبزآسمان کے نیچے نہ جائیے
اِس بھگوا کائنات سے خود کو بچائے٠ 

،سڑکوں پہ ہو نماز، نہ فٹ پاتھ پر بھجن 
جو رہگزرعوامی ہے، اس پر نہ چھائے٠ 

،بچئے زیارتوں سے، اور درشن کے رسم سے 
تھوڑا سا وقت بیٹھ کر، خود میں گزارئیے٠ 

،پریکّرمہ اور طواف کے حاصل پہ غور ہو 
مت زندگی کو نقلی سفر میں بتا ئیے٠ 

،عربوں کی سر زمین ہے جنگوں سے بد نما

 منکر وطنکی وادیوں میں گھوم آئیے ٠ 

،بچوں کے امتحان ہیں، بیمار گھر میں ہیں  
میلاد و جاگرن کے نہ بھونپو بجائیے٠ 

Thursday, June 14, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 87 जितना बड़ा है क़द तेरा, उतना अज़ीम है


87

जितना बड़ा है क़द तेरा, उतना अज़ीम है,
ऐ पेड़! तू भी राम है, तू भी रहीम है.

ईमान दार लोगों के, ज़ानों पे रख के सर,
बे खटके सो रहे हो, ये अक़्ल ए सलीम है.

तेरह दिलों की धड़कनें, तेरह दलों का बल,
जम्हूर का मरज़ ये, वबाल ए हकीम है.

अलक़ाब में आदाब के, अंबार मत लगा,
बालाए ताक़ कर इसे, क़द्रे ए क़दीम है.

खूं का लिखा हुवा, मेरा दिल में उतार लो,
ये आसमानी कुन, न अलिफ़,लाम, मीम है.

'मुंकिर' खिला रहा है, जो कडुई सी गोलियाँ,
इंकार की दवा है, ये तअसीर नीम है.

***

،جِتنا بڑا ہے قد ترا، اُتنا عظیم ہے 
اے پیڑ تو بھی رام ہے، تو بھی رحیم ہے٠ 

،ایمان دار لوگوں کے، زانو پہ رکھ کے سر 
بے کھٹکے سو رھے ہو، یہ عقلِ سلیم ہے٠ 

،تیرہ دلوں کی دھڑکنیں، تیرہ دلوں کا بل
جمہور کا مرض، یہ وبالِ حکیم ہے٠ 

،القاب میں آداب کے انبار مت لگا  
بالاۓ طاق کر اِسے، قدرِ قدیم ہے٠ 

،خوں سے لکھا ہوا مرا، دل میں اُتار لو 
یہ آئیں بائیں شائیں، نہ الف لام میم ہے٠ 

،منکر کِھلا رہا ہے جو کڑوی سی گولیاں 
اِنکار کی دوا ہے، یہ تاثیرِ نیم ہے٠ 

Wednesday, June 13, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 86 जहान ए अर्श का बन्दा है, बार ए अन्जुमन होगा


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जहान ए अर्श का बन्दा है, बार ए अन्जुमन होगा,
मसाइल पेश कर देगा, नशा सारा हिरन होगा.

मुझे दो गज़ ज़मीन दे दे, अगर शमशान में अपने,
मज़ार ए यार पे अर्थी जले तेरी, मिलन होगा.

मिले हैं पेट पीठों से, तलाशी इनकी भी लेना,
कहीं कुछ अन्न मिल जाए, तो बाक़ी है हवन होगा.

वो जिस दिन से ग़लाज़त साफ़ करना बंद कर देगा,
कोई सय्यद न होगा, और न कोई बरहमन होगा.

अपीलें सेक्स करता हो, तो ऐसा हुस्न है बरतर,
अजब मेयार लेके हुस्न का, यह बांक पन होगा.

फ़्री के, गिफ्ट के, और मुफ़्त के, हमराह हैं सौदे,
ख़रीदो मौत गर 'मुंकिर' तो तोहफ़े में कफ़न होगा.

***

،جہانِ عرش کا بندہ ہے، بارِ انجمن ہوگا 
مسائل پیش کر دیگا ، نشہ سارا ہِرن ہوگا٠ 

،مجھے دو گز زمیں دیدے، اگر شمشان میں اپنے 
مزارِ یار پہ ارتھی جلے تیری، ملن ہوگا٠ 

،ملے ہیں پیٹ، پیٹھوں سے، تلاشی اُن کی بھی لینا 
کہیں کُچھ انّ مل جاۓ، تو باقی ہے ہَون ہوگا٠ 

،وہ جس دن سےغلاظت صاف کرنا بند کر دیگا 
کوئی سیّد نہ ہوگا اور نہ کوئی برہمن ہوگا٠ 

،اپیلیں سیکس کی کرتا ہو، ایسا حسن ہے برتر 
عجب معیار لے کے، حسن کا اب بانک پن ہوگا٠ 

،فری کے، گِفٹ کے اور مُفت کے، ہمراہ سودے ہیں
خریدو موت گر منکر، تو تحفے میں کفن ہوگا٠  

Tuesday, June 12, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 85 खुद से चुनी अज़ीयत,

85

खुद से चुनी अज़ीयत,
रोज़ा नफ़िल तहारत.

तामीर है नफ़ी में,
है इक जुनूं इबादत.

दो बीवी तेरह बच्चे,
अल्लाह तेरी रहमत.

सब्र ओ रज़ा का चेहरा,
दर पर्दा ए बुख़ालत.

बे तु.ख्म का बशर था,
सुबहान तेरी क़ुदरत.

इज्ज़त दे चाहे ज़िल्लत,
मल्हूज़ हो दयानत.

मशहूर हो रहा है,
मुंकिर बफ़ज़्ल  ए तोहमत. 

अज़ीयत=कष्ट , नमाज़ ,तहारत=पाकीजगी ,
बुख़ालत=कंजूसी तु.ख्म =वीर्य , मल्हूज़=लिहाज़ 

،خود سے چنی اذیّت 
روزہ ، نفل طہارت٠ 

،تعمیر ہے نفی میں 
ہے اک جُنوں عبادت٠ 

،دو بیوی تیرہ بچے 
الله تیری رحمت٠ 

،صبر و رضا کا چہرا 
در پردہ ہے بخالت٠ 

،مفلوج ہو گئے ہو
کیوں بھا گئی قناعت٠ 

بے تخم کا بشر تھا؟ 
سبحان تیری قدرت؟

،عزت دے چاہے ذلّت 
ملحوظ ہو دیانت٠ 

،مشہور ہو رہے ہیں 
منکر بفضلِ تہمت٠

Monday, June 11, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 84



84

आप वअदों की हरारत को, कहाँ जानते हैं.
हम जो रखते हैं, वह पत्थर की ज़ुबाँ जानते हैं.

पुरसाँ हालों को, बताते हुए मेरी हालत,
मुस्कुराते हैं, मेरा दर्द ए निहाँ जानते हैं.

क़ौम को थोडी ज़रुरत है, मसीहाई की,
आप तो बस कि फ़न ए तीर व् कमाँ जानते हैं.

नंगे सर, नंगे बदन, उनको चले आने दो,
वोह अभी जीने के, आदाब कहाँ जानते हैं.

नहीं मअलूम किसी को, कि कहाँ है लादेन,
सब को मअलूम है कि अल्लाह मियाँ जानते हैं.

ना तवानी की अज़ीयत में पड़े हैं 'मुंकिर',
है बहारों का ये अंजाम, खिज़ां जानते हैं.

*मसीहाई=मसीहाई*न तवानी=दुर्बलता* अज़ीयत=कष्ट

،آپ وعدوں کی حَرارت کو کہاں جانتے ہیں
ہم جو رکھتے ہیں، وہ پتّھر کی زبان جانتے ہیں٠ 

،پُرساں حالوں کو بتاتے ہوئے، میری حالت 
مُسکراتے ہیں، مرا دردِ نہاں جانتے ہیں٠ 

،قوم کو تھوڑی، ضرورت ہے مسیحائی کی 
آپ تو بس کہ فنِ تیر و کماں، جانتے ہیں٠ 

،ننگے سر، ننگے بدن، اُنکو چلے آنے دو
وہ ابھی جینے کے آداب، کہاں جانتے ہیں٠

،نہیں معلوم کسی کو، کہ کہاں ہے لادین 
سب کو معلوم ہے کہ الله میاں، جانتے ہیں٠

،ناتوانی کی اذیت میں، پڑے ہیں منکر 
ہے بہاروں کا یہ انجامِ خزاں، جانتے ہیں٠ 

Sunday, June 10, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 83 चाहत है तेरी, और तेरा इंतेख़ाब



83

चाहत है तेरी, और तेरा इंतेख़ाब1 है,
क्या दोस्त तेरा, तेरी तरह लाजवाब है?

सो लेना चाहिए, तुझे कुछ देर के लिए,
नींद की हालत में, यह बेजा ख़िताब2 है.

है एक ही नुमायाँ, वहाँ चाँद की तरह,
बाक़ी हसीन चेहरों के, रुख़ पे नक़ाब है.

शायर है बेअमल, कि इसे बा अमल करो,
चक्खी नहीं कभी, मगर मौज़ूअ शराब है.

क़ानून क़ाएदों के, उसूलों की नींद में ,
उस घर में घुस गया, जहाँ जीना सवाब है.

रोका नहीं है भीड़ ने, टोका है, रुका हूँ,
'मुंकिर' को रोक ले, ये भला किस में ताब है.

१ पसंद 2  -संबोधन

،چاہت ہے تیری اور ترا انتخاب ہے 
کیا دوست تیرا، تیری طرح لا جواب ہے؟ 

،سو لینا چاہئے تمہیں، کچھ دیر کے لئے
حالت غنودگی کی ہے، بے جا خطاب ہے٠ 

،ہے ایک ہی نُمایاں وہاں چاند کی طرح 
باقی حسین تاروں کے رُخ پر نقاب ہے٠ 

،شاعر ہے بے عمل، کہ اُسے با عمل کرو 
چکّھی نہیں شراب کو، موضوع شراب ہے٠ 

،قانون قاعدوں کے، اُصولوں کی نیند میں 
اُس گھر میں گھس گیا، جہاں جینا ثواب ہے٠ 

،روکا نہیں ہے بھیڑ نے ٹوکا ہے، رُک گیا
منکر کو روک لے، بھلا یہ کس میں تاب ہے٠