Monday, June 23, 2014

Junbishen 304


गज़ल

इस शहरी आबादी को, जंगल में बोया जाए,
परबत के दामन हैं खाली, चलो वहीँ सोया जाए.

जीवन भर के सृजित हीरे, आँख खुली तो पत्थर थे,
चुन कर लाए जहाँ से इनको, वहीँ कहीं खोया जाए.

आहें निकलें, आंसू बरसें, हस्ती का कुछ बोझ कटे,
मन भारी है, तन है बोझिल, फूट फूट रोया जाए.

ऐ फ़ातेह! यह तेरा जिगरा, बस्ती है वीरान पड़ी,
तौबा का साबुन ले कर आ, दागे जिगर धोया जाए.

दुःख को ढूंढो बाती लेकर, मिले कहीं तो बतलाना,
सुख की गठरी नहीं है सर पे, इस पर क्यों रोया जाए.

जुल दे कर भागी है "मुंकिर" उम्र जवानी हाय रे अब,
बूढी पीठ पे इस की करनी, किस बल से ढोया जाए.
*****

2 comments:

  1. सब्ज़ जमीँ के जर्रे बुनकर फर्श फ़रीदा बूटी किए..,
    बारानी वो लालो-गौहर शाख़ों-पाँख पे पोया जाए.....

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