Saturday, July 14, 2018

जुंबिशें - - - नज़्म 1 बइस्म ए सिद्क़




1

बइस्म ए सिद्क़ 1

(सच्चाई के नाम से शुरू करता हूँ )

यह जुम्बिशें हैं दिल की, बेदारी2 सू ए ज़न2 की,
हैं रूह की ख़राशें, टीसें हैं मेरे मन की.

रस्मो की बारगाहें3, बाज़ार हैं चलन की,
बोसीदा4 हो चुकी हैं, दूकानें यह सुख़न5 की. 

फ़रमान ए साबक़ा6 के, ऐ बाज़ गश्तो ठहरो,
अब होगी आज़माइश, थोड़े से बाँकपन की.

आतिश फ़िशाँ8 की नोबत, आए तो क्यों न आए,
बेचैन हो चुकी हैं, पाबंदियाँ दहन* की.

जिस झूट में सदाक़त10, साबित हुई हो शर से,
उस सिद्क़11 को ज़रूरत, है गोर12 और कफ़न की.

तअलीम नव13 के तालिब14, अब अर्श१५ छू रहे हैं,
डोरी न इनको खींचे, इन शेख़ व बरहमन की.

गर दिल पे बोझ आये, ईमान छटपटाए,
ऐसे क़फ़स१६ से निकलो, छोडो फ़िज़ा चुभन की.

हम सब ही आलमीं17 हैं, भूगोल सब की माँ है,
आओ बढ़ाएँ अज़मत18, हम मादर ए वतन की.

धर्मो से पाई मुक्ति, मज़हब से पाई छुट्टी,
इंसानियत की बूटी, पीडा हरे है मन की.

तअमीर19 में है बाक़ी, जो ईंट, वह है 'मुंकिर',
मेमार20 इसको चुन दे, तकमील21 हो चमन की.

१-प्रचलित बिस्मिल्लाह या श्री गणेश २-जागरण 2+ MITURITY३-दरबार ४-जीर्ण ५-वाणी ६-पुरानेआदेश 
७-प्रति -ध्वनी ८-ज्वाला-मुखी ९-मुख (दहन =मुँह)१० सत्यता 11-सत्य 12 -कब्र १३-नवीं शिक्छा १४-इच्छुक 
१५-आकाश १६-पिंजडा १७-अन्तर राष्ट्रीय 18 मर्यादा 19-रचना 20-रचना कार २१-सम्पूर्णता.

بئسمِ صدق 

،یہ جُنبشیں ہیں دل کی، بیداری سوئےِزن کی
ہیں روح کی خراشیں، ٹیسیں ہیں میرے من کی٠

،رسموں کی بارگاہیں، بازار ہیں چلن کی
بوسیدہ ہو چکی ہیں، دوکانیں یہ سُخن کی٠

،فرمانِ گزشتہ کی، ائے بازِگشتو ٹھہرو
تم میں ہے آزمائش، تھوڑے سے بانک پن کی٠

،آتش فشاں کی نوبت، آتی تو کیوں نہ آتی
بے چین ہو چُکی تھیں، پابندیاں دَہن کی٠

،جس جھوٹ کی صداقت، ثابِت ہی ہو شر سے
اُس صِدق کو ضرورت، ہے گور اور کفن کی٠ 

،تعلیمِ نَو کے طالب ، ہیں عالمِ  فلک پہ 
 ڈوری نہ ان کو کھینچے، اب شیخ و برہمن کی٠

،گر دل  پہ  بوجھ  آئے، ایمان چھٹپٹائےِ
ایسے قفس سے نکلو، چھوڑو فضا گُھٹن کی٠

،ہم سب ہی عالمی ہیں، بھوگول سب کی ماں ہے
آؤ بڑھأئیں عظمت ، ہم مادرِ وطن کی٠ 

،دھرموں سے پائی مُکتی، مذہب سے پائی چُھٹّی
انسانیت کی بوٹی، پیڑا ہرے ہے من کی٠

،تعمیر میں ہے باقی، جو اینٹ وہ ہے منکر
معمار اسکو چُن دے ، تکمیل ہو وطن کی٠ 

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