Sunday, February 17, 2019

जुंबिशें - - - नज़्म कुफ्र व ईमां



कुफ़्र और ईमान

कुफ़्र१ ओ ईमान2 दो सगे भाई,
सैकड़ों साल हुए बिछडे़ हुए,
हाद्साती३ हवा थी आई हुई,
एक तूफाँ ने इनको तोड़ा था.

कोहना क़द्रों4 पे कुफ़्र था क़ायम,
इक ख़ुदा की सदा लिए ईमाँ,
बस नज़रयाती इख़्तेलाफ़5 के साथ,
ठन गई कुफ्र और ईमाँ में.

नारा ए जंग और जेहाद६लिए,
भाई भाई को क़त्ल करते थे,
बरकतें लूट की ग़नीमत7थीं,
और ज़रीआ मुआश8 थे हमले.

कुफ़्र की देवियाँ लचीली थीं,
देवता बेनयाज़9 थे बैठे,
जैश१० ईमान का जो आता था,
देवता मालो-ज़र लुटाता था.

ज़द में थे एशिया व् अफ्रीक़ा,
हर मुक़ामी पे क़ह्र बरपा थी,
ऐसा ईमान ने गज़ब ढाया,
आधी धरती पे मौत बरसाया.

ख़ित्ता ए सख़्त, जमीं पे भारत था,
सख़्त जानी थी कुफ़्र की इस पर,
इसपे आकर रुका थका ईमाँ,
कुफ़्र के साथ कुछ हुवा राज़ी.

सदियों ग़ालिब रहा मगर इस पर,
कुफ़्र के आधे इल्तेज़ाम11के साथ,
कुफ़्र पहुँचा सिने बलूग़त11 को,
फ़िर ये जमहूर्यत की ऋतु आई,

कुफ़्र को कुछ ज़रा मिली राहत,
और उसने नतीजा अख्ज़12 किया,
क्यूं न ईमान की तरह हम भी,
जौर ओ शिद्दत13की राह अपनाएं.

मेरा भी एक ही पयम्बर हो,
राम से और कौन बेहतर है,
मेरा भी सिर्फ़ एक मक्का हो,
मन को भाई अयोध्या नगरी.

काबा जैसा ही राम का मन्दिर,
बाबरी टूटे, कुफ़्र क़ायम हो,
उनका इस्लाम, अपना हो हिंद्त्व,
सारे रद्दे-अमल14 हैं फ़ितरी15 से.

कुफ़्र में इख़्तेलाफ़16 दूर हुए,
फ़ार्मूला ये ठीक था शायद,
उसकी कुछ जुज़वी कामयाबी है,
उसकी गुजरात में जवाबी है.

आज ईमाँ को होश आया है,
बिसरी आयत17 को जान पाया है,
है लकुम-दीनकुम18 से अब मतलब,
भूले काफ़िर को, क़त्ल करना अब.

अहल-ऐ-ईमाँ की बड़ी मुश्किल है,
आज मोहलिक१९ निज़ाम-कामिल२०,
कोई भाई भी पुरसा हाल नहीं,
करके हिजरत२१ वह कहाँ जाएँ अब.

है बहुत दूर मर्कज़े-ईमाँ22,
उसकी अपनी ही चूलें ढ़ीली हैं,
हैं पड़ोसों  में भाई बंद कई,
जिन के अपने ही बख़्त23 फूटे हैं.

ईमाँ त्यागे अगर जो हट धर्मी,
कुफ़्र वालों के नर्म गोशे24 हैं,
उनकी नरमी से बचा है ईमाँ,
वरना दस फ़ी सदी के चे-माने ?

बात 'मुंकिर' की गर सुने ईमाँ,
जिसकी तजवीज़25 ही मुनासिब है,
जिसका इंसानियत ही मज़हब है,
कुफ़्र की भी यही ज़रूरत है. 

1-काफिर आस्था २-मुस्लिम आस्था ३-दुर्घटना -युक्त ४-पुरानी मान्यताएं ५-दिरिष्ट -कौणिक 
६-धर्म युद्ध ७-धर्म युद्ध में लूटा हुआ माल ८-जीविका-श्रोत ९-अबोध १०-लश्कर 10- nishana 
११-चपेट १२-समझौता १३-निकाला १४-ज़ुल्म,ज्यादती १५-प्रति-क्रिया १६-स्वाभाविक 
१७-विरोध १८-कुरानी लेख अंश १९-तुहारा दीन तुहारे लिए,हमारा दिन हमारे लिए २०-हानि कारक
 २१-सम्पूर्ण जीवन शैली २२स्वदेश त्याग २३-मक्का की ओर संकेत २४-भाग्य २५-कुञ्ज २६-उपाय .

کُفر اور ایمان



کُفر و ایمان دو سگے بھائی 

سیکڑوں سال ہوئے بِچھڑے ہوئے 
حادثاتی ہوا تھی آئ ہوئی ،
ایک طوفاں نے انہیں توڑا تھا 


کُہنہ قدروں پہ کُفر تھا قایم 

اِک خدا کی صدا لئے ایماں 
بس نظریاتی اختلاف کے ساتھ 
ٹھن گئی کُفر اور ایماں میں؛


نعرہء جنگ اور جہاد لئے 

قائم ایمان قتل و خوں پہ ہوا 
برکتیں لوٹ کی غنیمت تھیں 
اور ذریعہ مُعاش تھے حملے ٠


کُفر کی دیویاں لچیلی تھیں 

دیوتا بے نیاز تھے بیٹھے 
جیش ایمان کا جو آتا تھا 
کُفر بس مال و دھن لُٹاتا تھا 


زد میں تھے ایشیا و افریقہ 

ہر مقامی پہ قہر برپا تھا 
ایسا ایمان نے غضب ڈھایا 
 آدھی دھرتی پہ زلزلہ آیا 


ایک خطّہ زمیں پہ بھارت تھا 

سخت جانی تھی کفر کی اس پر 
اس پہ آکر رُکا تھکا ایماں 
کُفر کے ساتھ کُچھ ہوا راضی ٠


صدیوں قابض رہا یہ مل جُل کر 

کُفر کے آدھے التزام کے ساتھ 
کُفر میں طاقت کُہن جاگی 
پھر یہ جمہوریت کی رُت آئ 


کُفر کو کُچھ ذرا مِلی راحت 

اور اس نے نتیجہ اخذ کیا 
کیوں نہ ایمان کی طرح ہم بھی 
جور و شِدّت کی راہ اپنائیں ٠


میرا بھی اِک بڑا پیمبر ہو 

رام سے اور کون بہتر تھا 
میرا بھی صِرف کوئی کعبہ ہو 
من کو بھائی ایودھیا نگری 


کعبہ جیسا ہی رام کا مندر 

بابری ٹوٹے کُفر قائم ہو 
اِنکے اسلام کی طرح ہندتو 
سارے ردِ عمل تھے فطری سے ٠


کُفر میں اِختلاف دور ہوے 

فارمولا یہ ٹھیک تھا شاید
انکی دلّی میں کامیابی ہے 
اور گجرات میں جوابی ہے٠ 


آج ایماں کو ہوش آیا ہے

بِسری آیت میں جان پایا ہے
اب لکُم دینکُم ہی جائز ہے
بھولا کافِر کو قتل کرنا اب ٠


اہل ایمان پہ سخت مشکل ہے

آج  مہلک نظام کامِل ہے
کوئی پُرسان حال ملتا نہیں
کرکے ہجرت یہ اب کہاں جائیں


 ہے بہت دور مرکزِ ایمان

اِنکی اپنی ہی چولیں ڈھیلی ہیں
ہیں پڑوسوں میں بھائی بند کئی
جِن کے اپنے ہی بخت پھوٹے ہیں٠ 


ایماں چھوڑے اگر جو ہٹ دھرمی

کُفر کے پھر بھی نرم گوشے ہیں
ان کی نرمی سے بچا ہے ایماں
ورنہ دس فی صدی کے چہ معنی ؟


بات 'منکر' کی گر سُنے ایماں

جِس کی تجویز ہی غنیمت ہے
جِس کی انسانیت ہی منزل ہے  
ایسے مذہب کی اب ضرورت ہے٠  





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