Friday, June 1, 2012

ग़ज़ल - - - कम ही जानें कम पहचानें बस्ती के इंसानों को




कम ही जानें कम पहचानें बस्ती के इंसानों को,
वक़्त मिले तो आओ जानें जंगल के हैवानों को.


अश्के गराँ जब आँख में   आएँ मत पोछें मत बहने दें,
घर में फैल के रहने दें, पल भर के मेहमानों को.


भगवन तेरे रूप हैं कितने, कितनी तेरी राहें हैं,
कैसा झूला झुला रहा है, लोगों के अनुमानों को.


मुर्दा बाद किए रहती हैं, धर्म ओ मज़ाहिब की जंगें,
क़ब्रस्तनों की बस्ती को, मरघट के शमशानों को.


सेहरा के शैतान को कंकड़, मारने वाले हाजी जी!
इक लुटिया भर जल भी चढा, दो वादी हे भगवानो को.


बंदिश हम पर ख़त्म हुई है, हम बंदिश पर ख़त्म हुए,
"मुंकिर" कफ़न की गाठें खोलो रह करो बे जानो को.

2 comments:

  1. वाह...बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. भगवन तेरे रूप हैं कितने, कितनी तेरी राहें हैं,
    कैसा झूला झुला रहा है, लोगों के अनुमानों को.

    तमाम अश आर बढ़िया अश्के गरां का मायना /अर्थ लिख देते ,लिखा करें मतलब मुश्किल से अल्फाजों का ताकी हमारे जैसे लोग भी बेहतर समझ सकें .शुक्रिया . .कृपया यहाँ भी पधारें -
    वैकल्पिक रोगोपचार का ज़रिया बनेगी डार्क चोकलेट
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/06/blog-post_03.html और यहाँ भी -
    साधन भी प्रस्तुत कर रहा है बाज़ार जीरो साइज़ हो जाने के .
    गत साठ सालों में छ: इंच बढ़ गया है महिलाओं का कटि प्रदेश (waistline),कमर का घेरा
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    लीवर डेमेज की वजह बन रही है पैरासीटामोल (acetaminophen)की ओवर डोज़
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    इस साधारण से उपाय को अपनाइए मोटापा घटाइए ram ram bhai
    रविवार, 3 जून 2012
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