Sunday, April 14, 2013

Junbishen (2)


नज़्म 

ह्म्द1


तेरी संगत तो मुश्किल,कि ऐ मौला निभा पाऊँ,
अजाबों में तेरे ख़ुद को, हमेशा मुब्तिला पाऊँ ।

अक़ीदा है मगर कितना ख़तरनाकी की हद में,
कि तुझ पर सर झुका कर ही, सरे अक़दस उठा पाऊँ।

तमस्खुर को बुरा माने ,तू संजीदा हुवा वाके ,
तुझे गर भूल ही जाऊं थोड़ा मुस्कुरा पाऊँ ।

बड़ा ही मुन्तक़िम है तू चला करता है चालें भी ,
कहीं मफ़रूर होकर ही अदू १० से सर बचा पाऊँ ।

अना ११ तेरी रक़ीबाना १२ , है क़ायम वाहिदे मुतलक १३ ,
बड़ा मुश्किल मुक़ामे किब्रियाई १४ है, अमां पाऊँ।

नमाज़ो , हज ,ज़कातो ,रोज़ादारी १५ ,क़र्ज़ हैं तेरे ,
हयाते खुश नुमा १६ को, गर सज़ा दूँ तो चुका पाऊँ।

मुझे मंज़ूर हैं दोज़ख़  की सारी कुल्फ़तें १७ 'मुंकिर ',
तलाशे हक़ १८ में मर जाऊं, तो कोई भी सज़ा पाऊँ ।

१-वन्दना २-विपत्ति ३-आस्था ४-पवित्र शीश ५-हस-परिहास ६-गंभीर ७-स्थापित होना
८-प्रति शोध ९-पलायन वादी १०-शत्रु ११आत्म सम्मान १२-दुश्मनी १३- एकेश्वर ४-ईश्वरीय श्रेष्टता
१५-ये चार इस्लाम के मूल-भूत कर्म-कांड हैं १६-सुखी जीवन १७-यातनाएं १८-सत्य की खोज .

1 comment:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १६ /४/ १३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

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