Friday, November 4, 2011

ग़ज़ल - - - जब से हुवा हूँ बे गरज़, शिकवा गिला किया नहीं


जब से हुवा हूँ बे गरज़, शिकवा गिला किया नहीं,
कोई यहाँ बुरा नहीं, कोई यहाँ भला नहीं.
 
 
अपने वजूद से मिला तो मिल गई नई सेहर,
माज़ी को दफ़्न कर दिया, यादों का सिलसिला नहीं.
 
 
पुख्ता निज़ाम के लिए, है ये ज़मीं तवाफ़ में,
जीना भी इक उसूल है दिल का मुआमला नहीं.
 
 
बख्शा करें ज़मीन को, मानी मेरे नए अमल,
मेरे लिए रिवाजों का, कोई काफ़िला नहीं.
 
 
ज़ेहनों के सब रचे मिले, सच ने कहाँ रचा इन्हें,
ढूँढा किए खुदा को हम, कोई हमें मिला नहीं.
 
 
थोडा सा और चढ़ के आ, हस्ती का यह उरूज है,
कोई भी मंजिले न हों, कोई मरहला नहीं.
 
*****

6 comments:

  1. बेहतरीन ग़ज़ल...दाद कबूल करें

    नीरज

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  2. सुन्दर गज़ल....
    सादर बधाई...

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  3. pshansniya rachana ... shukriya ji /

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  4. आपकी उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. आप लोगों का आभारी हूँ. मेरी कद्रो-क़ीमत आँकने का शुक्रिया.

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