Monday, August 29, 2016

jUNBISHEN 753


नज़्म 
फ़िक्र ए आक़बत  

ये कौन शख्स है, जो झुर्रियों का पैकर है ,
कमर को दोहरी किए, बर्फ़ जैसी सुब्ह में ,
सदा अज़ान की सुन कर, वह जानिब ए मस्जिद ,
रुकु सुजूद की हरकत को, भागा जाता है।

वह कोई और नहीं , देखो ग़ौर से उसको ,
जो अपने फेन में था यकता , वह मिस्त्री है वह ,
लड़कपने में वह ग़ुरबत की मार खाए है ,
जवान था कभी तो गाज़ी ए मशक़्क़त था .

नहीं सुकून ए दरूं अब भी उसकी क़िस्मत में ,
खबर फ़लक़ की उसे अब सताए रहती है ,
बड़ी ही ज़्यादती की है , ये जिसने भी की हो ,
नहीफ़ बूढ़े को, ये फ़िक्र ए आकबत दे के . 

فکر عاقبت

وہ کون شخص ہے ، جو جھرریوں کا پیکر ہے 
کمر کو دوہری کئے ، برف جیسی صبح میں 
صدا اذان کی سن کر وہ جانب مسجد
رقوع سجود کی حرکت کو بھا گا جاتا ہے ٠

وہ کوئی اور نہیں ، دیکھو غور سے اسکو 
جو اپنے فن میں تھا یکتا ، وہ مستری ہے وہ 
لڑکپنے میں وہ غربت کی مار کھاۓ ہے 
جوان تھا کبھی تو ، غازی ے مشققت تھا ٠

ضعیف ہے تو لائق شریف بیٹے ہیں 
نہیں سکون دروں اب بھی اسکی قسمت میں 
خبر فلق کی اسے اب ستاۓ رہتی ہے 
بڑی ہی زیادتی کی ہے ، یہ جسنے بھی کی ہو 
نحیف بوڑھے کو ، یہ فکر عاقبت دیکر ٠  

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