Friday, November 25, 2016

Junbishen 772

रुबाईयाँ 

हैवान हुवा क्यूँ न भला, तख्ता ए मश्क़
इंसान का होना है, रज़ाए अहमक
शैतान कराता फिरे, इन्सां से गुनाह
अल्लाह करता रहे, उट्ठक बैठक
حیوان ہوا کیوں نہ بھلا تختہ ے مشق 
انسان کا ہونا ہے رضا ے احمق 
شیطان کرتا پھرے ، انساں سے گناہ 
الله کرا تا رہے ، اٹھک بیٹھک 




साइंस की सदाक़त पे यकीं रखता हूँ,
अफकार ओ सरोकार का दीं रखता हूँ, 
सच की देवी का मैं पुजारी ठहरा, 
बस दिल में यही माहे-जबीं रखता हूँ.
سائنس کی صداقت پہ یقیں رکھتا ہوں 
افکار و سروکار کا دیں رکھتا ہوں 
سچ کی دیوی کا میں پجاری ٹھہرا 
بس دل میں یہی ماہ جبیں رکھتا ہوں 



ना ख्वान्दा ओ जाहिल में बचेंगे मुल्ला,
नाकारा ओ काहिल में बचेगे मुल्ला,
बेदार के क़ब्जे में समंदर होगा, 
सीपी भरे साहिल पे बचेगे मुल्ला.
نا خواندہ و جاہل میں بچینگے مللہ 
نا کارہ و کاحل میں بچینگے مللہ 
بیداروں کے قبضے میں سمندر ہوگا 
سیپی بھرے ساحل بچینگے مللہ

1 comment:

  1. laajawab kavita hai . hindi ki kavitayan padhne ka maza hi alag hai NEW YEAR WISHES 4 YOU

    ReplyDelete