Friday, January 11, 2013

ग़ज़ल - - - गुस्ल ओ वज़ू से दागे अमल धो रहे हो तुम




 
 
गुस्ल ओ वज़ू से दागे अमल धो रहे हो तुम,
मज़हब की सूइयों से रफ़ू हो रहे हो तुम.
 
हर दाना दागदार हुवा देखो फ़स्ल का,
क्यूँ खेतियों में अपनी खता बो रहे हो तुम।
 
हथियार से हो लैस हँसी तक नहीं नसीब,
ताक़त का बोझ लादे हुए रो रहे हो तुम।
 
होना है वाकेआते मुसलसल वजूद का,
पूरे नहीं हुए हो, अभी हो रहे हो तुम।
 
इंसानी अजमतों का तुम्हारा ये सर भी है,
लिल्लाह पी न लेना, चरन धो रहे हो तुम।
 
"मुंकिर" को मिल रही है ख़ुशी जो हक़ीर सी,
क्यूँ तुम को लग रहा है कि कुछ खो रहे हो तुम।
 
*अजमतों=मर्याओं *लिल्लाह=शपत है ईश्वर की

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