Friday, May 18, 2018

62 हरगिज़ न परेशान हों, जो इलज़ाम लगा हो,



62

हरगिज़ न परेशां हों, जो इलज़ाम लगा हो,
जब तक कि हक़ीक़त में, तुम्हारी न ख़ता हो.

जो बातें बड़ों की तुम्हें अच्छी न लगी हों,
बेजा है कि छोटों को, वही तुमने कहा हो. 

वह मौत की तफ़सीर बताने में है माहिर,
जिसने कि कभी ज़िन्दगी, समझा न जिया हो. 

जज़्बात के कानों में ज़रा उंगली लगा ले, 
जब खूं में तेरे, आग कोई घोल रहा हो. 

वह बोझ गुनाहों का,उठाए है कमर पे,
अब ढूंढ रहा है कि कहीं कोई गढ़ा हो. 

नस्लों का तेरे चाँद सितारों पे जनम हो,
जन्नत की नहीं, हक में मेरे ऐसी दुआ हो .

***

،ہرگز نہ پریشان ہوں، کوئی بھی سزا ہو 
جب تک کہ حقیقت میں تمہاری خطا نہ ہو٠ 

، جو بات بڑوں کی تمہیں اچھی نہ لگی ہوں 
بے جہ ہے کہ چھوٹوں کو، وہی تم نے کہا ہو٠ 

،وہ موت کی تفسیر بتانے میں ہے ماہر 
جس نے نہ کبھی زیست کو، سمجھا نہ جِیا ہو٠ 

،ڈھو ڈھو کے گُناہوں کو کمر جُھک جو گئی ہے 
اب ڈھونڈھ رہا ہے کہ کہیں کوئی گڑھا ہو٠ 

،نسلوں کا تیرے چاند ستاروں پہ جنم ہو 
جنّت کی نہیں، حق میں مرے ایسی دعا ہو٠ 

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