Sunday, May 6, 2018

जुंबिशें - - - ग़ज़ल 55 उसकी टेढ़ी नज़र है,



55 

उसकी टेढ़ी नज़र है,
सिर फिरी राह पर है.

तेरा पत्थर का दिल है,

मेरा शीशे का घर है.

मसख़रा आ गया है,

आबरू दाँव पर है.

हो गए हैं वो राज़ी,

साथ में इक मगर है.

इल्म ए नव शेख़ समझें?

नए मअनो का डर है.

निभावो या कि जाओ,

तुम्हीं पर मुनहसर है.

खेतियाँ बस कमल की,

बाग़ बानी में शर है.

***

، اُسکی ٹیڑھی نظر ہے
بے روی راہ پر ہے٠ 

، تیرا پتھر کا دل ہے 
میرا شیشے کا گھر ہے٠ 

، تم نِبھاؤ کہ جاؤ، 
تم ہی پر منحصر ہے٠ 

، کپکپی چھوٹتی ہے 
نۓ معنوں کا ڈ ر ہے٠ 

، مسخرہ آ گیا ہے 
آبرو دانو پر ہے٠ 

، ہو گئے ہیں وہ راضی 
ساتھ میں اِک مگر ہے٠ 

کھیتیاں بس کمل کی؟ 

باغبانی میں شر ہے٠ 

، دُشمنوں میں گھرا وہ
اُس میں دل ہے جگر ہے٠ 

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