Friday, June 14, 2019

जुंबिशें -- ग़ज़ल

 ग़ज़ल
इस ज़मीं के वास्ते, मिल कर दुआ बन जाएँ हम,
रह गुज़र इंसानियत हो, क़ाफ़िला बन जाएँ हम.

क्यों किसी नाहक़ की, मरज़ी की रज़ा बन जाएँ हम, 
मुख़्तसर सी ज़िंदगी का, हादसा बन जाएँ हम.                                          

रद कर दो रहनुमाई की, ये नाहक़ रस्म को,
हो न क़ायद कोई अपना, क़ायदा बन जाएँ हम.

तुम ज़रा सी ज़िद को छोडो, हम ज़रा सी आन को.
क्या से क्या बन जाए ये घर, क्या से क्या बन जाएँ हम. 

अब महा भारत न उपजे, न फ़साद ए करबला,
शर के बुत को तोड़ कर, अमनी फ़िज़ा बन जाएँ हम. 

आख़िरी ज़ीने पे चढ़ कर, राज़ हस्ती का खुला,
इन्तेहा है क़र्ब मुंकिर, इब्तिदा बन जाएँ हम.


اس زمیں کے واسطے مل کر دعا بن جائیں ہم 
رہگزرانسانیت ہو، قافله بن جائیں ہم٠ 

کیوں کسی نا حق کی مرضی کی رضا بن جائیں ہم 
مختصر سی زندگی کا، حادثہ بن جائیں ہم٠

رد کر دو رہنمائی کی، یہ ناقص رسم کو، 
ہو نہ قاعد کوئی اپنا، قاعدہ بن جائیں ہم٠

تم ذرہ سی ضد کو چھوڑو، ہم ذرہ سی آن کو 
کیا سے کیا ہو جاۓ یہ گھر، کیا سے کیا ہو جائیں ہم٠ 

اب مہا بھارت نہ اُپجے، نہ فسادِ کربلہ 
شر کے بُت کو توڑ کر، امنی فضا بن جائیں ہم٠ 

آخری زینے پہ چڑھ کر راز ہستی کا کھلا 
انتہا ہے قرب منکر، ابتدا بن جائیں ہم٠

Thursday, June 13, 2019

जुंबिशें --- दोहे


दोहे 
सन्यासी सूफी बने, तो माटी पाथर खाए,
दूजी पीस पिसान को, काहे मांगन जाए।

سنیاسی صوفی بنے ، تو ماٹی پاتھر کھاۓ 
دوجی پیس پسان کو ، کاہے ماگن جاۓ ٠

--
माटी के तन पर तेरे, चढत है चादर पीर
बिन चादर के शीत में, मानव तजें शरीर.

ماٹی کے تن پر ترے ، چڑھت ہیں چادر پیر 
بن لتہ کے شیت میں ، مانو تجت شریر ٠
*


उनका अल्ला एक है , उसके नबी रसूल ,
पुख्ता ये ईमान है , ढीली हैं सब चूल .

انکا الله ایک ہے ، انکے نبی رسول 
پختہ یہ ایمان ہے ، ڈھیلی ہیں سب چول ٠
*

सर पे सूरज है खड़ा , अल्ला रख्खा जाग ,
मज़हब ही रुसवाई से,भाग सके तो भाग .

سر پی سورج ہے کھڑا ، اب 'منکر' تو جا گ 
مذہب کی رسوائی سے ، بھگ سکے تو بھاگ ٠
*


माँ बाप भाई बहन, रिश्ते सब ब्योपार ,
पत्नी पुत्री पुत्र पर, करके देख उधर . 

مائی ، باپ ،بھائی بہن ، رشتے سب بیوپار 
پتنی ، پتری ، پتر پر کرکے دیکھ ادھار ٠
*

Wednesday, June 12, 2019

जुबिo----मुस्कुराहटें


मुस्कुराहटें


पंडितो-मुल्ला -----

पंडितो-मुल्ला दो गहरे दोस्त थे इक चाल में,
खूब बनती, खूब छनती दोनों की हर हाल में,

एक दिन मुल्ला ये बोला, सुन कि ऐ पंडित महान!
बाँधता तू है ग़लत, पेशाब में अपने ये कान ?

सुन के पंडित ने कहा और वज़ू तेरा मियाँ?
गंध करता है कहाँ से ? साफ़ करता है कहाँ ?

तेरे मेरे आस्थाओं में ज़रा सा फ़र्क़ है,
मेरी कश्ती नर्क में है, तेरा बेडा ग़र्क़ है.

نہلے پر دہلا 

پنڈت و مللہ دو باہم، دوست تھے اک چال میں،
خوب بنتی ، خوب چھنتی ، دونوں کی ہر حال میں ٠ 
ایک دن مللہ نے پوچھا ، سن کہ ائے پنڈت مہان،
جاتا ہے پیشاب کو ، کیوں باندھتا ہے اپنے کان ؟
سن کے پنڈت نے کہا ، جیسے وضو تیرا میاں 
گندہ کرتا ہے کہاں سے اور دھوتا ہے کہاں ٠ 
*
ایک دن پنڈت نے چھیڑا، مللہ ائے قلب سیاہ 
جب ڈکاریں آتی ہیں ، علحمد کی لیتا ہے تھاہ 
پاس تیرے ہر گھڑی، اوسر کی ہوتی ہے دعا،     
ہے کوئی ایسی دعا ، جو بعد ہو خارج ، 
بولا ملا ہاں ! ہے نہ ائے کاشی نریش، 
ایسے موقعہ پر پڑھا کرتا ہوں میںجے جے گنیش ٠ 

Tuesday, June 11, 2019

जुबिसे --- रुबाइयात


 रुबाइयात  
ये ईश की बानी, ये निदा की बातें, 
आकाश से उतरी हुई ये सलवातें , 
इन्सां में जो नफ़रत की दराडें डालें, 
पाबन्दी लगे ज़प्त हों इनकी घातें. 

یہ ایش کی بانی ، یہ ندا کی گھاتیں  
آکاش سے اتری ہوئی یہ صلواتیں 
انسان میں نفرت کی دراڑیں ڈالیں 
پابندی لگے ، ضبط ہوں انکی باتیں٠ 
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कहते हैं कि मुनकिर कोई रिश्ता ढूंढो, 
बेटी के लिए कोई फ़रिश्ता ढूंढो, 
माँ   बाप के मेयार पे आएं पैग़ाम, 
अब कौन कहे, अपना गुज़िश्ता ढूंढो. 
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کہتے ہیں کہ منکر کوئی رشتہ ڈھونڈھو 
بیٹی کے لئے کوئی فرشتہ ڈھونڈھو 
ماں باپ کے اعمال پہ آئیں پیغام 
اب کون کہے اپنا گزشتہ ڈھونڈھو ٠
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लगता है कि जैसे हो पराया ईमान, 
या आबा व् अजदाद से पाया ईमान, 
या उसने डराया धमकाया इतना, 
वह खौ़फ़ के मारे ले आया ईमान. 
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لگتا ہے کہ جیسے ہو پرا یا ایمان 
یا باپ سے دادا سے، ہو پایا ایمان 
یا اُسنے ڈرایا دھمکایا اتنا 
وہ خوف کے مارے لے آیا ایمان ٠ 

Monday, June 10, 2019

जुबिसे --- अजम --- तुम - - -




तुम - - -

ख़ुद को समझ रहे हो, कि रूहे रवाँ1 हो तुम,
ख़िलक़त2 ये कह रही है, कि उसपे गराँ हो तुम.

सब फ़ारिग़ ए सलात3 अभी तक अजाँ हो तुम,
हर सम्त है बहार,  शिकार खिजाँ4 हो तुम.

क्यूँ चाहते हो, अपना यकीं सब पे थोप दो,
है भूत आस्था का, वहीं पर जहाँ हो तुम.

फ़रदा5 की कोख में हैं, सभी हल छिपे हुए,
माज़ी6 सवार सम्त, मुख़ालिफ़7 रवाँ हो तुम.

सर जिस्म पर ज़रूर है, रूहों का क्या पता ?
सर का ख़याल पहले करो, नातवाँ8 हो तुम.

शिद्दत9 है, जंग जूई10, बेएतदाली11 है,
आपस में लड़ रहे हो, जहाँ इम्तेहाँ हो तुम.

महकूम12 गर हुए, तो रवा दारी13 चाहिए,
कुछ और ही लगे हो, जहाँ हुक्मराँ14 हो तुम.

कुछ ऐसे बन सको, कि तुम्हारी हो पैरवी,
दुन्या गवाह हो, कि उरूज ए जहाँ15 हो तुम.

'मुंकिर' जगा रहा है, उठो मर्तबा16 वालो,
इक्कीसवीं सदी में, जहाँ है, कहाँ हो तुम.

1-प्राण-वर्धक २- अन्तर राष्ट्रिय जन समूह ३-नमाज़ अदा कर चुकना 
४-पतझड़ ५-आनेवाला कल ६-अतीत ७-उल्टी दिशा ८ -कमजोर
 ९-उग्रता १०-युद्धाभियान ११-असंतुलन १२-आधीन 
१३ -उचित बर्ताव १४-शाशक१५- दुन्या ऊपर १६-श्रेरेष्ट

تُم 

خود کو سمجھ رہے ہو ، کہ روحِ رواں ہو تم 
خِلقت یہ کہ رہی ہے کہ ، اُس پہ گراں ہو تم ٠

سب فارغِ صلات ، ابھی تک اذاں ہو تم 
ہر سمت ہے بہار ، شِکار خزاں ہو تم ٠

کیوں چاہتے ہو اپنا یقیں سب پہ تھوپ دو 
ہے بھوت آستھا کا وہیں پر، جہاں ہو تم ٠

فردہ کے کوکھ میں ہیں ، سبھی حل چُھپے ہوئے
ماضی سوار ، سمت مخالف رواں ہو تم ٠

سر جِسم پر ضرور ہے روحوں کا کیا پتہ 
اِس کا خیال پہلے کرو، ناتواں ہو تم ٠

شِدّت ہے ، جنگ جوئی ہے ، اعتدالی ہے 
آپس میں لڑ رہے ہو ، جہاں امتحاں ہو تم ٠

محکوم جب ہوئے تو ، روا داری چاہئے 
کچھ اور ہی لگے ہو ، جہاں حکمراں ہو تم ٠

کچھ ایسے بن سکو ، کہ تمہاری ہو پیروی 
دُنیا گواہ ہو کہ ، عروجِ جہاں ہو تم ٠

منکر' جگا رہا ہے اُٹھو ! اہل مرتبہ ،'
اِکیسویں صدی میں جہاں ہے ، کہاں ہو تم ٠   

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Sunday, June 9, 2019

जुंबिशें - ग़ज़ल



ग़ज़ल  

हक्क़ुल इबाद से ये, लबरेज़ है न छलके,
राह ए अमल में थोड़ा, मेरे पिसर संभल के.

ऐ शाख़ ए गुल निखर के, थोड़ा सा और फल के,
अपने फलों को लादे, कुछ और थोड़ा ढल के.

अपने ख़ुदा को ख़ुद मैं, चुन लूँगा बाबा जानी,
मुझ में सिन ए  बलूग़त, कुछ और थोड़ा झलके.

लम्हात ज़िन्दगी के, हरकत में क्यूँ न आए,
तुम हाथ थे उठाए, चलते बने हो मल के.

कहते हो उनको काफ़िर  जो थे तुम्हारे पुरखे,
है तुम में ख़ून उनका, लोंडे अभी हो कल के.

मेहनत कशों की बस्ती, में बेचो मत दुआएँ,
"मुंकिर" ये पूछता है, तुम हो भी कुछ अमल के.

हक्कुल इबाद =मानव अधिकार

حق العباد سے یہ، لبریزہے، نہ چھلکے 
گامِ عمل میں تھوڑا، میرے پِسر سنبھل کے٠ 

ائے شاخِ گل سنبھل کے، تھوڑااور پھل کے 
اپنے پھلوں کو لادے، رہنا زرہ سا ڈھل کے٠ 

اپنے خدا کو خود میں، چُن لونگا بابا جانی 
مجھ میں سنِ بلوغت، تھوڑا سا اور جھلکے٠ 

لمحاتِ زندگی کے، حرکت میں کیوں نہ آے؟ 
تم ہاتھ تھے اُٹھاۓ، چلتے بنے ہو مل کے٠ 

ہے تم میں خون اُنکا، لونڈے ابھی ہو کل کے٠ 

محنت کشوں کی بستی، میں بیچو مت دعا ئیں 
منکر یہ پوچھتا ہے، تم ہو بھی کچھ عمل کے ٠ 

Friday, June 7, 2019

जुंबिशें - भतीजे के नाम


मुस्कुराहटें
भतीजे के नाम 

मत आना इन के जाल में ऐ मेरे भतीजे,
अ.क्साम ए ख़ुदा सब हैं क़यासों के नतीजे.

जो बात तुझे लगती हो फ़ितरत के मुख़ालिफ़,
उस बात पे हरगिज़ न मेरे लाल पसीजे.

जालों को बिछाए हैं ये रिश्तों के शिकारी,
बहनें हों कि भाई हों कि साले हों कि जीजे.

मिट्टी को निजी चाक के तू  कर दे हवाले,
माँ बाप की मुट्ठी तो रहेगी तुझे मींजे.

दिखला दे ज़माने को तेरा रंग ही जुदा है,
टक्कर में तेरे कोई भी दूजे हैं न तीजे.
अ.क्साम =क़िस्में

بھتیجے کے نام 

مت آنا انکے جال میں ایے میرے بھتیجے 
اقسام ے خدا ہیں یہ  قیاسوں کے نتیجے٠  

جو بات تجھے لگتی ہو فطرت کے مخالف 
اس بات پہ  ہرگز نہ میرے لعل پسیجے٠  

جالوں کو بچھاۓ ہیں یہ رشتوں کے شکاری
بہنیں ہوں کہ بھائی ہوں کہ سالے ہوں کہ جیجے٠  

مٹتی کو نجی چاک کے تو کر دے حوالے 
ماں باپ کی مٹھی تو رہیگی تجھے مینجے٠  

دکھلا دے زمانے کو تیرا رنگ ہی جدا ہے 
ٹکّر میں تیرے کوئی بھی دوجے ہیں نہ تیجے٠  

***