Thursday, May 3, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 48



48

कम ही जानें कम पहचानें, बस्ती के इंसानों को,
वक़्त मिले तो आओ जानें, जंगल के हैवानों को.

अश्क ए गराँ जब आँख में आएँ, मत पोछें मत बहने दें,
घर में फैल के रहने दें, पल भर के मेहमानों को.

भगवन तेरे रूप हैं कितने, कितनी तेरी राहें हैं,
कैसा झूला झुला रहा है, लोगों के अनुमानों को.

मुर्दा बाद किए रहती हैं, धर्म ओ मज़ाहिब की जंगें,
क़ब्रस्तनों की बस्ती को, मरघट के शमशानों को.

सेहरा के शैतान को कंकड़, मारने वाले हाजी जी!
इक लुटिया भर जल भी चढ़ा दो, वादी हे भगवानो को.

बंदिश हम पर ख़त्म हुई है, हम बंदिश पर ख़त्म हुए,
मुंकिर कफ़न की गाठें खोलो, रिहा करो बे जानो को.

***

کم ہی جانیں، کم پہچانے، بستی کے انسانوں کو
وقت ملے توآؤ سمجھیں، جنگل کے حیوانوں کو٠ 

اشکِ گراں جب آنکھ میں آئیں، مت پوچھو، مت بہنے دو  
گھر میں پھیل کے رہنے دو، پل بھر کے مہمانوں کو٠ 

بھگون تیرے روپ ہیں کتنے، کتنی تیری را ہیں ہیں
کیسا جھولا جھلا رہا ہے، لوگوں کے انومنوں کو٠ 

کیوں آباد کئے رہتی ہیں، دھرم و مذاہب کی جنگیں؟ 
قبرستانوں کی بستی کو، مرگھٹ کے شمشانوں٠ 


سہرا کے شیطان کو کنکڑ مارنے والے حاجی جی 
 اک لُٹیا بھر جل بھی چڑھا دو، وادی کے بھگوانوں کو٠ 

بندش مجھ پر ختم ہوئی ہے، میں بندش پر ختم ہوا 
لوگو! کفن کی گا ٹھیں کھولو، رہا کرو بے جا نوں کو٠ 

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