Monday, September 15, 2014

Junbishen 230


नज़्म 


फ़िक्र ए आक़बत  

ये कौन शख्स है, जो झुर्रियों का पैकर है ,
कमर को दोहरी किए, बर्फ़ जैसी सुब्ह में ,
सदा अज़ान की सुन कर, वह जानिब ए मस्जिद ,
रुकु सुजूद की हरकत को, भागा जाता है।

वह कोई और नहीं , देखो ग़ौर से उसको ,
जो अपने फ़न में था यकता , वह मिस्त्री है वह ,
लड़कपने में वह ग़ुरबत की मार खाए है ,
जवान था कभी तो गाज़ी ए मशक़्क़त था .

नहीं सुकून ए दरूं अब भी उसकी क़िस्मत में ,
खबर फ़लक़ की उसे अब सताए रहती है ,
बड़ी ही ज़्यादती की है , ये जिसने भी की हो ,
नहीफ़ बूढ़े को, ये फ़िक्र ए आकबत दे के . 

Saturday, September 13, 2014

Junbishen 239

रूबाइयाँ 


ग़ारत हैं इर्तेक़ाई मज़मून वले, 
अज़हान थके हो गए, ममनून वले,
साइन्स के तलबा को खबर खुश है ये, 
इरशाद हुवा "कुन" तो "फयाकून"वले,. 



तुम अपने परायों की खबर रखते थे, 
हालात पे तुम गहरी नज़र रखते थे, 
रूठे  हों कि छूटे हों तुम्हारे अपने, 
हर एक के दिलों में, घर रखते थे. 



बेयार ओ मददगार हमें छोड़ गए, 
कैसे थे वफ़ादार हमें छोड़ गए, 
अब कौन निगहबाने-जुनूँ होगा मेरा, 
लगता है कि घर बार हमें छोड़ गए. 

Thursday, September 11, 2014

Junbishen 238


दोहे

सब से मुंकिर राखियो , जय जय राम सलाम ,
भिड जाए जब चूतिया , मुंह पर लगे लगाम .


तन सिंचित मोती जड़ित , मन मोहन मुस्कान ,
है सृजित शोभा गणित ,अल्ला तेरी शान .


उपदेशों से न बनी , लाए ईश आदेश ,
शक्ति को भगती मिले , ऐसे हैं आदेश .


दावत हक की ले हैं , खिला रहे हैं भूख ,
इनके उनके फ़िक्र में भी गए हैं सूख .


खोले अपना डाक चार , बैठा उपर खुदाए ,
ख़त ले आया डाकिया , मार मार पढवाए .

Tuesday, September 9, 2014

Junbishen 237


रूबाइयाँ 

इन रस्म रवायत की मत बात करो,
तुम जिंसी खुराफात की मत बात करो,
कुछ बातें हैं मायूब नई क़दरों में ,
मज़हब की, धरम ओ ज़ात की मत बात करो.


आओ कि लबे-क़ल्ब, खुदा को ढूंढें,
रूहानी दुकानों में, वबा को ढूंढें,
क्यूं कौम हुई पस्त सफ़े अव्वल की?
मज़हब की पनाहों में ख़ता को ढूंढें.


क्यों सच के मज़ामीन यूँ मल्फूफ़ हुए, 
फ़रमान बजनिब हक, मौकूफ हुए, 
इंसान लरज़ जाता है गलती करके, 
लग्ज़िश के असर में खुदा मौसूफ़ हुए. 

Sunday, September 7, 2014

Junbishen 236


गज़ल

मय्यत का मेरी आग या दरिया हो ठिकाना ,
तुम खाता बही लेके मियाँ क़ब्र में जाना . 

पहले तो वज़ू और रुकुअ तक ही फसाना ,
मैं फंस जो गया तो मुझे उंगली पे नचाना .

इंसान का है ज़िक्र मवेशी का नहीं है ,
लाखों को हांकता है यहाँ फ़र्द ए शयाना  .

है गिलमा के तोहफ़े की तलब गार इमामत ,
हुजरे में मसाजिद के न बच्चों को पढ़ना .

अपनी ख़ुशी के रोड़े हटा ले तो मैं चलूँ ,
जिन रास्तों पर चलने को कहता है ज़माना .

अल्ला मियां की ज़ात घसीटे है बहस में ,
दर अस्ल मेरी ज़ात है ज़ाहिद का निशाना 

Friday, September 5, 2014

Junbishen 236


गज़ल

यह गलाज़त भरी रिशवत,
लग रहा खा रहे नेमत.

बैठी कश्ती पे माज़ी के,
फँस गई है बड़ी उम्मत.

कुफ्र ओ ईमाँ का शर लेके,
जग में फैला दिया नफरत.

सर कलम कर दिए कितने,
लेके इक नअरा ए वहदत.

सर बुलंदी हुई कैसी?
आप बोया करें वहशत.

धर्म ओ मज़हब हो मानवता,
रह गई एक ही सूरत.

माँ ट्रेसा बनीं नोबुल,
खिदमतों से मिली अज़मत.

हो गया हादसा आखिर,
हो गई थी ज़रा हफ्लत.

खा सका न वोह 'मुंकिर",
खा गई उसे है उसे दौलत.
*****
*माज़ी= अतीत *उम्मत=मुस्लमान *शर=बैर *वहदत=एकेश्वर

Tuesday, September 2, 2014

Junbishen 235



गज़ल

सुकूने क़ल्ब को, दिल की हसीं परी तो मिले,
तेरे शऊर को, इक हुस्ने दिलबरी तो मिले.

नफ़स नफ़स की बुख़ालत  को ख़त्म कर देंगे,
तेरे निज़ाम में, पाकीज़ा रहबरी तो मिले.

क़िनाअतें तेरी, तुझ को सुकूं भी देदेंगी,
कि तुझ को सब्र, बशकले क़लन्दरी तो मिले.

जेहाद अब नए मअनो को ले के आई है.
तुम्हें ''सवाब ओ ग़नीमत'' से, बे सरी तो मिले.

वहाँ पे ढूँढा तो, बेहतर न कोई बरतर था,
फ़रेब खुर्दाए एहसास ए बरतरी तो मिले.

तू एक रोज़ बदल सकता है ज़माने को,
ख़याल को तेरे 'मुंकिर" सुख़नवरी तो मिले.
*****
*बोखालत=कंजूसी *केनाआतें=संतोष *कलंदरी=मस्त-मौला *''सवाब ओ गनीमत'' =पुण्य एवं लूट-पाट*सुखनवरी=वाक्-