Saturday, March 3, 2018

जुंबिशें - - - नईं अज़ान



नईं अज़ान 

यह धर्म और मज़हब इंसान के लिए अगर कारगर होते तो सदियों पहले आदमी इंसान बन चुका होता.
दर अस्ल इसने हमेशा इंसान और इंसानियत का बुरा ही किया है. 
जितना इंसानी ख़ून मज़ाहिब ने पिया है उतना किसी दूसरी तहरीक ने नहीं. अवतारों और पयम्बरों के ज़माने में ही बड़ी बड़ी जंगें हुईं, 
महा भारत हुईं है जिनको धर्म युद्ध अथवा जिहाद का नाम देकर पवित्र कर लिया गया.
धर्म गुरुओं ने कभी भी आदमी को इन्सान बन कर इंसानी आज़ादी नहीं दी.
बस मनवाया है पहले अपने गढ़े हुए ख़ुदा को, बाद में ख़ुद को.
इतिहास में कोई मिसाल नहीं मिलेगी कि देश में मज़हबी हुकूमत क़ायम हुई हो और पड़ोस में अमन रहा हो. रातों को भेस बदल कर अपनी रिआया का दुःख दर्द समझने वाले हुक्मराँ, 
दिन में दूसरे मुल्क पर हमला करने का फ़रमान जारी किया करते थे.
मौजूदा बड़े बड़े देवालय और बारगाहें लूट मार से वसूली गई दौलत से बनी हुई हैं. 
अजीब बात हुवा करती थी कि अपना धर्म को दूसरे पर थोपें, 
न माने तो गर्दन उड़ा दें, उसके बाद इस ज़ुल्म को जिहाद का नाम दें.
नया युग आ गया है. आप  पूरा यक़ीन कर सकते हैं कि अतीत की ग़ैर फ़ितरी (अलौकिक) मज़हबी बातें,जन्नत और दोज़ख कोरी कल्पनाएँ हैं. वैज्ञानिक खोजें इन मीनारों को ध्वस्त कर चुकी हैं, फिर भी इनका भूत आप के पिंडों को नहीं छोड़ता. यह कब तक चलेगा, हम कब तक झूट को जीते रहेंगे.
पेश किताब से मैंने शाइरी के तसव्वुत (माध्यम) से इंसानी ज़ेहन को 'जुंबिशें' दी है.
मैं नहीं जानता कि मैं शायर हूँ भी कि नहीं, मगर मैंने इतना ज़रूर जाना है कि अपनी बातें दो लाइन में कहने के लिए शायरी से बेहतर कोई माध्यम नहीं.
शेर ऐसा कैप्शूल है जिसे आसानी से निगला जा सकता है.
तवील मज़ामीन को पढ़ने के लिए किसी के पास वक़्त नहीं.
मेरे अशआर रंगीन, संगीन और ग़मगीन कैप्शूलों में बंद हैं, किसी तरह भी इनके असरात लोगों के दिमागों में पहूँचे और हलचल पैदा करे.
मौजूदा समाज को ज़ेहनी इलाज के लिए 'जुंबिशें' दे रहा हूँ.
मैं ख़ूब जानता हूँ कि सोए हुए व्यक्ति को जुंबिशें नागवार गुज़रती हैं, 
उनकी नींद में ख़लल जो पड़ता है.
वह झिंझोड़ने वाले को लाल पीली नज़रों से तो देखते ही हैं, 
फिर होश संभाल कर बैठ जाते है. 
मुझे पूरी उम्मीद है कि "जुंबिशें" उनको जब पूरी तरह से जगा देंगी तो वह मेरे अच्छे दोस्त बन जाएँगे.
जुंबिशें मेरी उरियां (नग्न) सदाक़तों की रोशनाई से लिखी हुई इबारतें हैं. 
मैंने कहीं कोई मस्लेहत और लिहाज़ नहीं बरती. 
मेरे हिसाब से यह बुज़दिली की अलामतें हैं. 
इन्हीं की वजह से मरज़ के जरासीम पनपते हैं.
जुंबिशें बहुत सा पड़ाव पेश करती हैं, हर पड़ाव पर आपको रुकना होगा, एक लंबी सांस लेकर फ़ितरत को निहारना होगा, आपको अपनी हस्ती का पता मिलेगा जो कि कहीं खोई हुई है. जब आप अपने आपको पा जाएँगे तो आपको किसी की ज़रुरत नहीं होगी. 
यह कितना बड़ा सनेहा (विडंबना) कि आप ख़ुद अपने आपसे नहीं मिलते.
जुन्बिशों की घटनाओं को आप अपने अन्दर घट जाने दें, 
आपको नज़रयाती गुलामी से नजात मिल जाएगी. 
उसके बाद आप होंगे और उसके बाद भी सिर्फ़ आप ही होंगे. 
इंसान ख़ुद को पा जाए तो यह उसके लिए सबसे बड़ा इनआम है. 
धर्म व मज़हब, ज़ात पात से मुक्त हो जाएँगे, कोई पराया न रह जाएगा. वजूद पर लदे इन तमाम बोझों से सुबुक दोशी होगी. 
ला महदूदयत (अनन्त) मज़ा आने लगेगा. न आपका कोई हक्वारा होगा न आप किसी पर ग़ालिब होना पसंद करेंगे. 
कोई झूट आपसे नज़रें मिलाने की हिम्मत न कर सकेगा. 
हम सभी कायनात के एक ज़र्रे हैं, 
बहुत कम वक़्त के लिए इसके दायरे में आए हैं,

पाई है हम ने जहाँ में गुल की मानिंद ज़िदगी,
रंग बन कर आए हैं, बू बन के उड़ जाएँगे हम.

कुछ देर के लिए स्टेज पर आए हैं, अपने रोल करके चले जाएँगे. 
स्टेज पर डेरा नहीं डालेंगे.
मैं तमाम  ख़ल्क़ का ख़ैर ख्वाह हूँ. 
हमारे इंसानी मज़हब में अदावत हराम है.
साथ साथ ग़लत को क़ायम रखना भी  हमें गवारा नहीं.
आइए हम सब मिल कर इंसान और सिर्फ़ इंसान बन जाएं.
इंसान के सिवा कुछ भी बाक़ी न बचें.
हर ज़ेहन में इंसानियत की रूह फूकें.
हर तरफ इंसानियत की खुशबू बिखेरें.
बिरादराना एकता से परे, 
ओछी पहचानो से दूर, 
सरहदी हद बंदियों से बेख़बर,
हम मुसलसल इंसानी आबादी बन जाएं.
पाषाण युग की तरह अतीत के धर्म व मज़हब को इतिहास के अजायब घर में रख दें. हमारा मज़हब एक, बस मज़हब ए इंसानियत हो.
इसकी ज़रुरत सिर्फ़ मानव जाति को ही नहीं, बल्कि धरती के हर जीव को है.
मेहनत हमारा दीन हो,
इन्साफ़ की रोटी हमारा ईमान हो,
इंसानी हुक़ूक़ की भरपाई हमारी पूजा हो और इबादत हो.
इस धरती को सजाना और संवारना हमारा मक़सद ए हयात हो.
इससे ज़्यादा और क्या चाहिए हमारी नस्लों को ?
*****

Thursday, March 1, 2018

जुंबिशें - - - अर्ज़ और निवेदन


अर्ज़ और निवेदन 

माज़ी में हमें समाज सुधार की राहों में बहुत सी हस्तियाँ झिलमिलाती हुई नज़र आएंगी, जिन्हें हम अवतार, पैग़म्बर, गुरु और महात्मा कहते हैं. 
उस ज़माने के समाजी मसाइल को मद्दे-नज़र रखते हुए, हमें उनके पैग़ाम पर एक नज़र डालना चाहिए. 
जिस तरह आदमी बचपन को पार करते हुए जवानी तक पहुँच जाता है, उसी तरह इंसानी समाज भी इरतेक़ाई सूरत में (रचना कालिक) है. 
इंसान की रिहाइश गुफाओं, जंगलों और दरख़्तों पर कभी हुवा करती थी, कुछ समझ आई तो घर बनाना शुरू किया, खेती बाड़ी करने लगा, 
कुछ और समझ आई तो बस्तियां बना कर रहने लगा, - - -  
गरज़ कि आज यहाँ तक नौबत आ गई है कि इंसान आसमान फ़तह करने लगा. 
समाज सुधारकों के हथियार भी इर्तेक़ाई हुवा करते हैं, इनमें भी तब्दीली हुवा करती है. जब अक्ल़ ए इंसान तिफ़ली (बचकानी) थी तब समाज सुधार के लिए जो हथियार गढ़े गए थे, क्या वही हथियार आज जवान शऊर के लिए कारामद साबित हो सकते हैं ? 
नहीं. 
इस वक़्त इन तमाम हथियारों को कुंद और नाकारा कहा जाएगा. 
इन्हीं कुंद हथियारों की उस वक़्त ज़रुरत थी, इसके आलावा कोई सूरत न थी.
आज की सच्चाई यह है कि उनके समाज सुधार के हथियार हुवा करते थे मन गढ़ंत. वह ज्ञान आधारित थे न विज्ञान आधारित. 
आत्मा, रूह, शैतान, भूत और फिर देवी देवता, उसके बाद ख़ुदाओं का तसव्वुर क़ायम हुवा. इन्हीं हथियारों से हमारे बुजुर्गों ने समाज सुधार और समाज कल्याण का फ़र्ज़ निभाया. 
खुदा और शैतान का तसव्वुर नेकी और बदी की अलामतें बना कर पेश की गईं. 
जन्नत और दोज़ख का ख़याल देकर अवाम को ललचाया और डराया गया. इसके बावजूद अगर लोग बुराइयों से कनारा कश न होते तो उन पर मज़हबी सख़्तियाँ होतीं. 
रहबरों ने इंसानी समाज के लिए जो भी किया उसे बुरा नहीं कहा जा सकता. वह बहरहाल समाज के हमदर्द थे. 
अहम् सवाल यह उठता है कि माज़ी के कुंद हथियार क्या आज कारामद हैं? 
जिन्हें कि सारे मुल्ला पंडित आज भी भांज रहे हैं. 
क्या किसी जवान को "बिलव्वा आया" कहकर डराया जा सकता है ? 
याद रख्खें आलमी सच्चाइयां, आलमी होती हैं. 
यह इंसान को आलम और इल्म से मिलती हैं न कि धर्म व मज़हब से.

नईं तअलीमी और ख़ासकर साइंसी इन्क्शाफ़ात (खोजें) ने कल के समाज को बच्चा साबित कर दिया है. आजका इंसान अब इर्तेक़ाई मरहलों (रचना कालिक पड़ाव) का बच्चा नहीं रहा. मौजूदा इंसानी समाज को उरयाँ (नंगी) सदक़तों (सच्चाइयां) की ज़रुरत है. 
इस बात पर यक़ीन किया जा सकता है कि उरियां  सदक़तों से हम आगोश मुआशरा ही मुकम्मल इंसान पैदा कर सकता है, जिसे कि महान जर्मन विचारक फेड्रिख बिलहिल्म्स नीत्शे ने महामानव कहा है.
आज ज़रुरत इस बात की है कि धर्म और मज़हब की गुत्थियों पर बारीक नज़र डाली जाए. क्या यह गुथ्थियाँ सुलझ कर इंसानियत के लिए सीधी राह दे सकती हैं ? 
  समाजी सांचे में फिट रहने के लिए हर फ़र्द किसी न किसी तंजीम, जमात, संघ या पार्टी वग़ैरा से जुड़ा रहना चाहता है, जिसके कि हक्वारे हुवा करते हैं, जोकि सीमित सोच रखने वाली अवाम को भेड़ बकरियां समझते है. अविकसित और अल्प बुद्धि मानव समाज का प्राणी अपनी कमज़ोर सोच के लिए यहाँ ऊर्जा पाता है. यह एक तरह की जन साधारण की ज़ेहनी हवालगी होती है. इसमें दाख़िले के बाद व्यक्ति हक्वारे के रेवड़ का एक मवेशी बन कर रह जाता है. यहाँ पर शब्द "डिसिप्लिन" हक्वारे के बड़ा काम आता है. एक वक़्त आता है जब फ़र्द ख़ुद अपने वजूद का मालिक नहीं रह जाता. वह अपने हक्वारे को ही अपना बख़्शनहारा मानने लगता है. यह आत्म घाती हवालगी उसे ज़मीन और आसमान की फ़िकरों से नजात दिला देती है. 

दर अस्ल यह कमज़ोर सोच रखने वालों के लिए एक तरह की राह-ए-फ़रार है. पलायन है. यह फ़रार लोग निहायत ग़ैर ज़िम्मेदार होते हैं. अपने बाल बच्चों को ख़ुदा की मर्ज़ी की वल्दियत दे देते हैं. यह लोग तंज़ीम में ख़ुद को बहुत महफ़ूज़ पाते हैं. इनका ख़मीर बुनयादी तौर पर काहिल और निकम्मा होता है. इनकी आसान पसंदी हकवारों की बद नियती को नज़र अंदाज़ करती रहती है.
झुण्ड की झुण्ड यह रूहानी भेड़ें अपने दिल व दिमाग़ और ज़मीर को हक्वारे की क़त्ल गाह के हवाले किए रहती है. इस तरह से क़ुदरत से मिला हुवा ज़िंदगी का नायाब तोहफ़ा ज़ाया हो जाता है. 
मैंने इन पेशावर पीरों के दर पर देखा कि मर्द बच्चे सिंफ़-ए -नाज़ुक की तरह अपनी ज़ात को इनके हवाले किए रहते हैं. 
उफ़ ! वजूद की इस क़दर पामाली. 

अपने आप की रहनुमाई की आवाज़ कहीं से मेरा कानों में आई, 
रहनुमाई के लिए सदाक़तें उँगली थमाने के लिए सामने खड़ी हुई थीं. 
बचपन में कबीरी दोहों को इम्तेहान पास करने के लिए जो रटे थे, 
उनमे माने नज़र आने लगे.
साँच बराबर तप नहीं, झूट बराबर पाप,
जाके ह्रदय सांच है, ताके ह्रदय आप. 

 इसके बाद भी ज़ेहनी बलूग़त (परपक्वता) ने सफ़र जारी रख्खा, 
मुझे इस आप (ख़ुदा) में भी साँच की तलाश महसूस हुई. 
लोगों ने इस आप की बाज़ार में पाप की दुकानें लगा रख्खी हैं 
और आप सर भी नहीं झटकता. 
कहीं कहीं यह आप भी बे सिर पैर की बातें करता है और ख़तरनाक पैग़ाम देता है. 
इस आप के ताजिर मुफ़्त का हलुवा पूरी खा रहे हैं. 
कहीं कोई कबीर नज़र नहीं आया जो मशक्क़त कर के अपने परिवार की रोज़ी रोटी कमा रहा हो. हमारा मौजूदा समाज हाँला कि तअलीम याफ़ता हुवा जा रहा है, इस के बावजूद धर्म के धंधे बाज़ो को बर्दाश्त कर रहा है. ऐसा माहौल बन गया है कि कोई भी इनसे पंगा नहीं लेना चाहता. 
हक़ीक़त से सभी वाक़िफ़ हैं और चाहते हैं कि कोई आगे आकर मोर्चा संभाले, मगर वह मेरे घर का फ़र्द न हो, पड़ोसी हो. 
पता नहीं लोग किस पयम्बर की आमद का इंतेज़ार कर रहे हैं.
ज़रुरत इस बात की है कि हम ख़ुद उठें और इन ख़ुदा फ़रोशों की दूकानों की बोहनी न होने दें. हमें मग़रिबी (पश्चिमी) मुल्कों की तरह जाग जाने की ज़रुरत है, न कि उन पर तनक़ीद करने की. 
हम ख़ुद साख़ता जगत गुरु बने बैठे हैं. इन बातों में कोई दम है ?
मग़रिब जहाँ इंसान क्या हैवान भी तहफ्फ़ुज़ पाए हुए हैं और हम इंसान को अपने बे बुन्याद नज़रिए को मनवाने के लिए मार देते हैं. हमें अपने तौर तरीक़ों को सुधारने और संवारने की ज़रुरत है. हमारे जमहूरी निज़ाम से कोई उम्मीद नहीं. इसने तो चोर उचक्कों, बदमाशों, डाकुओं, ज़ालिमो और क़ातिलों को भी सरकार बनाने की इजाज़त दे रख्खी है.
क़ौम का सब से बड़ा सानेहा (विडंबना) है, जवानो को अधूरी और नाक़िस तअलीम,(खास कर मुसलमानों में) . 
जो दीनी तअलीम बच्चों को दी जाती है वह मौजूदा पैमाने में उन्हें पीछे ले जाती है. बहुत कम लोग अपने बच्चों को जदीद तअलीम दे पाते हैं. 
बच्चों के ज़ेहनों में माफ़ोक़ुल फ़ितरत (अलौलिक) अक़ायद कूट कूट कर भर दिए जाते हैं. तअलीम से फ़ारिग़ होने के बाद यह नौजवान पुख़ता उम्र के मोलवी और मुल्लाओं के हत्थे चढ़ जाते हैं फिर समाज पर यह नव जवान बोझ बन जाते हैं. 
दूसरी तरफ़  बेदार तबक़े के नवजवान इनके मुक़ाबले में जब आला डिग्रियां लेकर आते हैं तो मदरसे  इनको नक़ली ओहदेदार का रुतबा दे देता है. यही नव जवान जब ज़िम्मेदारी के बोझ तले आते हैं तो इन्हें फुटपाथी रोज़ी के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता. यही नव जवान जब ऊधम मचाते हैं तो कभी बुत शिकन तालिबान बन जाते हैं तो कभी मस्जिद शिकन कार सेवक हैं. 
धर्म व मज़हब हमेशा से हुक्मरानों के लिए बहतरीन हथियार रहे हैं. 
या यूँ कहा जाए कि इनका ज़यादा हिस्सा सियासत है. 
ख़ास कर इस्लाम जो बड़े शान से कहता है कि वह मुकम्मल निज़ाम ए हयात है. 
धर्म इससे कुछ अलग है, यह मज़हब की होड़ में मज़हब नुमा हुवा जा रहा है. 
धर्म की व्याख्या बहुत ही मुख़्तसर है, 
"धर्म कांटे की सही नाप तौल धर्म है." 
मौजूदा धर्म और मज़हब पूरी तरह से सियासत बन चुके हैं. 
आज़ादी के 70 साल बाद इसकी बीमारी उप महाद्वीप में नए सिरे से फैल रही है, यह फैलाव इसके लिए दुर्भाग्य  ही कहा जाएगा. चरित्र स्कूल से लेकर अदालत तक गिरता चला जा रहा है. क़ौम रचना को छोड़ कर छूमंतर की तरफ़  दौड़ी चली जा रही है. 
कोई नहीं समझ पा रहा कि उप महाद्वीप को एक लामज़हब इंक़लाब की ज़रुरत है जिसमे अहिंसा की कोई महिमा न हो. तरक्क़ी याफ़्ता मुल्क हमारी इस अचेतन पर आँख गडोए हुए है, इन्हें पिछले दरवाज़े से हमारे घर में घुसने की इजाज़त भी मिल चुकी है. वह धर्म और मज़हब की बीमारी से मुक्त हो चुके हैं और हम पर यह दोहरी हुई जा रही हैं.
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Wednesday, February 28, 2018

जुंबिशें - - - मैंने जो जाना


मैंने जो जाना - - - 

मेरा लड़कपन कुछ दिनों के लिए ही मज़हबी जाल में उलझा रहा. 
शऊर बेदार होने के बाद मैंने मज़हबी दुन्या को ख़ुद अपनी आँखों से देखा. धीरे धीरे कुछ बातें अजीब सी लगने लगीं. समाजी विरासत में मिला जज़्बा ए दीन पस्ता क़द होने लगा. 
मैंने देखा कि मज़हबी दुन्या की तक़रीर व तहरीर में और उनके अमल में तज़ाद (विरोधावास) है. उनका दर्स (शिक्षा) और उनकी तबलीग़ (प्रचार), शिकारी शिकरे की तरह मेरे सर पर मंडलाते हुए लगे. 
मैं ने देखा कि क़िस्से कहानियों को, तारीख़ी वाक़आत को और अरबों की दास्तानों को अक़ीदत बना कर हमें नमाज़ों में पढ़ाया जाता है. 
जिनका तअल्लुक़ न हमारे पुरखों से है, न ही मौजूदा हालात से. 
ख़याली जन्नत और दोज़ख़ से हमें बहलाया और दहलाया जाता है. 
वह या तो ज़मीन से ऊपर आसमान की बातें करते हैं, 
या फिर ज़मीन के नीचे क़ब्र की बातें करते हैं, 
ज़मीन पर बिखरे इंसानी मसाइल की नहीं. 
यह धर्म व मज़हब सिर्फ़ इंसानी ज़िन्दगी का घेरा बंदी करते हैं. 
बड़े बड़े जय्यदों और दिग्गजों को पाया कि यह किसी ख़याली ख़ुदा को धुरी बना कर सदाक़त (सत्य) के साथ कज अदाई करते हैं. 
यह एक तरह से इनकी ज़ाती मजबूरी भी होती है, क्योंकि इनको इल्म नहीं बल्कि इनको मज़हब पढ़ाया जाता है जो इन्हें और इनकी ज्ञान को महदूद कर देता है. अगर इन्हें मेडिकल साइंस पढ़ाया गया होता तो आज ये कैंसर और एड्स जैसे मर्ज़ों का इलाज कर रहे होते.
समाजी ना बराबरी का हाद्साती नतीजा यह है कि ज़्यादा तर आलिम ग़रीब घरों के बच्चे होते हैं. यह ग़ुरबत और बदहाली के आलम में दीनी अदारों (संस्था) के हवाले कर दिए जाते हैं. यह अदारे अक्सर ख़ैराती इमदाद के भरोसे होते हैं. यहीं से शुरू हो जाती है शख्सि़यत की पामाली (पतन). नतीजतन यह वही बोलेंगे, वही लिखेंगे, वही करेंगे जो इनको सिखलाया गया है.

धर्म और मज़हब को ख़ुद नज़री और ख़ुद फ़िकरी फूटी आँख नहीं भाती. वह इसे ख़ुद सरी और अहं का नाम देते हुए धिक्कारते है. 
प्रवचनों में तो वह देते हैं उपदेश, आत्म ज्ञान और स्वचिन्तन का, 
लेकिन श्रोता जब  आत्म ज्ञानी और स्वचिन्तक बनने लगता है तो इनके कान खड़े हो जाते है. यह उसे अहंकारी और ख़ुदसर की उपाधियाँ देने लगते हैं. अजीब दोहरा मेयार होता है इनका. जन साधारण को हदों में रखने के लिए इनकी लक्षमन रेखा हुवा करती है. इसके बाहर होते ही नकेलें खींच ली जाती हैं. इनकी न मानने वालों को अधर्मी, नास्तिक, मुलहिद और दहरया का ख़िताब दे दिया जाता है जोकि एक तरह से इनकी धार्मिक गालियाँ होती हैं, अगर ग़ौर से देखा जाए तो ख़ुद उनके भीतर अहं और ग़ुरूर कूट कूट कर भरा होता है. यह अपने मुख़ालिफ़ को स्टेज पर बैठ कर एलान्या गालियाँ दिया करते हैं. सरकारें कुछ नहीं बोलतीं, जैसे विरोधियों को गरियाना इनका जन्म सिद्ध अधिकार हो.  
इन धर्म गुरुओं की दुकाने लगी हुई हैं. अब तो यह नौटंकी जैसी हुई जा रही है. यह दूकाने अवाम को अफ़ीम की गोलियां बाँट रही हैं. यह नहीं चाहते कि लोग चेतें और जागें. कुछ लोग जाग कर भी आँख खोलने से हिचकिचाते हैं. यह उनके दिए हुए लक़ब से डरते हैं. 
मुझे पचास साल पहले यह उम्मीद थी कि तअलीम आने के बाद इन दूकानों की बोरियां सिमट चुकी होंगी मगर नतीजा उल्टा निकलता दिख रहा है. 
भारत में हिन्दू जागरण के नाम से अन्धविश्वाश का होल सेल होने लगा है. मिटटी पत्थर और कागज़ की बनी मूर्तियाँ दूध पीने लगी हैं. हिन्दू मानस को सुलाने के लिए नईं नईं गोलियां ईजाद हो रही हैं. देश पाखण्ड और अंध विश्वाश के चपेट में बढ़ चढ़ कर आमादा नज़र आता है.
दुन्या के बेशतर मुस्लिम मुल्क मज़हबी क़ैद खाने बने हुए हैं, भारत में भी मुस्लिम समाज पर मुल्लों का ग़लबा होता चला जा रहा है. 

नेहरु का सपना चकना चूर होता चला जा रहा है. समाज पर असत्य का बोलबाला होता चला जा रहा है. तमाम इंसानी क़द्रें और मानव मूल्य पामाल होते चले जा रहे है, जिसका बड़ा कारण धर्म व मज़हब हैं. सच और हक़  के मुंह पर फ़तवा जड़ दिया जाता है और असत्य का प्रचार और प्रसार सरकार की सर परस्ती में होता है. देश प्रेम का नारा इनका बड़ा सहायक साबित होता है कि मुख़ालिफ़ पर देश द्रोह का इलज़ाम लगा दिया जाए. 
मुस्लिम मुख़ालिफ़ को काफ़िर कह देते हैं, हिन्दू देश द्रोही.
इन मज़हबी मुजरिमों के साथ मेरा तालमेल नहीं बैठ पाता. इनके साथ जंग मेरी ज़िन्दगी का मक़सद है.

बहुत से लोग मुख़्तलिफ़ ख़ुदाओं की लुद्दी (कमपाउंड) बना कर 
"ऊपर वाले, मालिक या कोई ताक़त" का ख़ाक़ा पेश करते हैं, 
चलिए ऐसा कुछ है भी तो अच्छी बात है, हुवा करे, वह कायनात के निज़ाम को कंट्रोल करता होगा, इंसानी ज़िन्दगी के समाजी और मुआशी (आर्थिक) मुआमलों में उसका कोई दख्ल़ नहीं हो सकता. न ही ज़मीन पर उसने अपना कोई मुसतनद एजेंट मुक़र्रर किया है. जितने भी अवतार और पैग़म्बर हैं, सब ख़ुद साख़ता (स्यंभू ) हैं. 
यह धूर्त मानव समाज से अपना कमीशन ऐंठते है. 
ऊपर वाला अगर कोई है ? तो हुवा करे, कभी नीचे आएगा तो देख लेंगे. वह कुछ भी होगा मगर अपने बन्दों को सज़ा देने का व्योहार करने वाला न होगा, न ही इबादत का भूखा. 
अगर वह क़हहार है तो ख़ुदा नहीं शैतान होगा. 
इंसान इस कायनात का एक ख़ूबसूरत और ख़ुशबूदार फूल है. 
इंसान, हैवान, चरिंद व परिन्द, कीट पतंग, पेड़ पौदे, ग़रज़ कि जितने जीवधारी हैं, इस कायनात में ज़िंदगी की अलामतें हैं, 
फ़ितरत के मज़ाहिरे हैं. 
अगर कोई ख़ुदा है तो यही सूरतें ख़ुदा का जुज़्व है. 
कोई दो चार दिन, कोई दोचार महीने, कोई दो चार साल और कोई सौ पचास साल के लिए ज़ाहिर होता है और फिर रूपोश हो जाता है. 
इंसान के आलावा बाक़ी तमाम जीव इस ज़िन्दगी का र.क्स करके चले जाते हैं, अभागा इन्सान ही तमाम जिंदगी ख़ारजी और ग़ैर ज़रूरी बकवासों में ज़िन्दगी का अनमोल तोहफ़ा गँवा देता है और बनता है अशरफ़ुल मख़लूक़ात (जीवों में श्रेष्ट).

बहर हाल हम इसान हैं, 
इंसान के सिवा और कुछ भी नहीं. 
हमारी खुशबु इंसानियत है, 
धर्म और मज़हब नहीं. 
इंसानियत की बूटी ही आज तक इंसान को बचाए हुए है 
वरना इन धर्म और मज़हब ने कोई कसर नहीं छोड़ी कि 
आदमी इनके शिकंजे में आए या फिर मौत को गले लगाए. 
ज़रुरत है इंसान को कि वक़्त का हम सफ़र बने 
और वक़्त के साथ साथ ख़ुद को बदलता जाए. 
जब मानव मानवता से लबरेज़ हो जाएगा 
तो महामानव का जन्म होना शुरू हो जाएगा.  
इसके बाद महान समाज ख़ुद बख़ुद वजूद में आ जाएगा. 
सदियों से मज़ाहिब हमें हिन्दू, मुसलमान, ईसाई वग़ैरा बनाते तो चले आए हैं मगर इंसान कभी नहीं बनाया. 
हमें सिर्फ़ हमारे एहसास और हमारी चेतना ही हमें इंसान बना सकते हैं, मज़हब नहीं.
धर्मों से पाई मुक्ति, मज़हब से पाई छुट्टी,
इंसानियत की बूटी पीड़ा हरे है मान की. 
***** 

जुंबिशें - - - मेरा इख्तेसार


मेरा इख़्तेसार (संक्षेप)  - - - 

ख़ुश हाल किसान का पोता और बदहाल मज़दूर का बेटा हूँ. 
बचपन की महरूमियाँ अकसर पीछा किया करती हैं, कभी क़लक़ बन कर तो कभी नेअमत की तरह. 
पेट फ़ाक़ो का शिकार होता तो आँखें शर्मिंदगी का. 
ग़ैरत मंद माँ के मासूमों ने कभी किसी रिश्तेदार के सामने हाथ नहीं फैलाया. बेबसी और बेकसी के आलम में माँ का छटपटाता हुवा साया हमारे सरों से गुम हो गया था. छः सात का सिन रहा होगा मेरा.
माँ की मौत के दूसरे दिन मेरे दिल में एक हूक सी उट्ठी थी. 
रो रो कर बुरा हाल कर लिया था, ज़िद की कि मैं भी अपनी बीबी (माँ) के पास चला जाऊंगा, नानी ने अपना वास्ता दिया कि मै अकेली कैसे रहूंगी, तुम्हारे बिना ? 
नानी मुझे बहुत चाहती थीं, दर अस्ल उनका जवां साल बेटा कुछ दिन पहले ही चल बसा था, तो बीबी ने मुझे उनके गोद में डाल दिया था. 
नानी पर तरस खाकर मैंने अपनी ज़िद छोड़ दी थी. मैं ने उनके सीने से लिपट कर नईं अमाँ पाई थी. 
माँ की मय्यत को क़ब्र में उतारने और दफ़नाने के अमल को देख कर मैं मौत से वाक़िफ तो हो ही गया था, नानी की गोद में मेरे लाशऊर ने राहत महसूस किया.
बाप की नाकारगी का ज़िक्र न करना ही बेहतर होगा. उनकी तरफ़ से यही ग़नीमत था कि उन्हों ने कभी हम लोगों को हराम नहीं खिलाया, अगर हलाल न खिला सके. हमारी विरासत भी पामाल नहीं किया. 
भाई और बहन में मैं सब से छोटा था, मुन्ने उर्फियत पाई थी. बड़े भाई ज़करिया तर्क ए दुन्या करके ज़िन्दगी को आज़माइश गाह के हवाले कर दिया था. 
दूसरे नंबर पे अजमल भाई थे, रंगा रंग, जमाल बीन, और बा कमाल शख्सि़यत पाई थी. कारोबार में मुजाहिद, जद्द व जहद करते हुए ही जान दे दी. उनकी हादसाती मौत मेरे लिए बड़ा अलमिया है. 
उवैस भाई तीसरे नंबर पर थे, उन्हों ने मुझे जादुई चाहत दी थी, 
काश मैं उनकी चाहत का शिकार न बनता. 
मुझसे बड़ी बहन क़ुबरा थीं, माँ के मौत के बाद वह ही घर की मिनी माँ बन गई थीं.
नानी ने जिन्हें कि हम लोग अम्मा कहते थे, अपने तीन पीढ़ियों को संभाला. बद तरीन हालात में मैं कैसे  जवान हो गया और अम्मा (नानी) ने सौ साल की उम्र कैसे पाई, इन बातों का यक़ीन नहीं होता.

दस साल की उम्र तक तअलीम गाह में क़दम रखने की नौबत नहीं आई. मेरे मामू मुंशी आफ़ाक़ अहमद ने 1955 में एक जूनियर हाई स्कूल खोला, पांचवीं पास बच्चों की एक कक्षा बनाई, कक्षा के बाहर मोहल्ले के लाख़ैरे बच्चों की दूसरी नुमाइशी कक्षा बनाया. उन्हीं लाख़ैरों में से एक मैं था. मुझे मामू के दो शफ़ीक़ हाथ मिल गए थे और मामू को घर का सौदा सुलुफ़ लाने के लिए मेरे दो छोटे छोटे पाँव. 
बस फिर क्या था, जल्दी ही मै कक्षा 6 के विद्यार्थियों के साथ हम क़दम हो गया. छः सात पास करते हुए मैं आठवीं में कक्षा में आठवें नंबर पर था और नवें में क्लास टॉप कर गया. 
पांच साल में दसवीं पास करने वाले तालिब इल्म के पास कोई रास्ता न था कि पढ़ाई जारी रख पाता. पढ़ाई छूट जाने का क़लक़ बरसों रहा. 
कालेज का अहाता न सही, मेरी पढ़ाई तो हमेशा ही जारी रही. 
किताबों की दौलत से हाथ कभी ख़ाली  न रहा.
पांच साला तालिब इल्मी जिंदगी (विद्यार्थी जीवन) के दौरान मुझे शिद्दत से एहसास रहा कि ग़रीबी हमारी सब से बड़ी दुश्मन है. अकेले में अक्सर मै इससे इंतेक़ाम लेने का अहद करता रहता. 
सपने साकार हुए, मैंने अपने परिवार को ही नहीं अपने अहबाब को भी ग़रीबी की खाईं से बाहर निकाला. 
बड़ी पाक साफ़ रोज़ी कमाई इससे मुझे सच्ची ख़ुशी का एहसास होता है. 
पुवर फंड पाने वाले बच्चे ने लाखों रुपिए इनकम टैक्स अदा किए. 
यह काफ़ी नहीं है क्या ? 
कालेज ने मुझे अक्षर ज्ञान दिया और पुवर फंड भी दिया, 
मैं ने कालेज को एक कक्षा बनवा कर दिया, शायद कुछ हक़ अदा हुवा हो.

ग़ुरबत की खाई पाट चुकने के बाद मैं कमाई के दौड़ से भी बाहर आ गया. अब पैसे के पीछे भागना पाप जैसा लगने लगा. कभी कभी सोचता हूँ कि दौलत की प्यास भी कुछ लोगों की बद नसीबी होती है. मुझे इससे भी नजात मिल गई है. इस पड़ाव का अगला मोड़, ज़ेहन में दबी हुई बरसों पुरानी चिंगारियों की तरफ़ ले गया. चिंगारियां ज्वाला मुखी का रूप धारन करके "जुंबिसें" में समा गईं. 
("जुंबिसें" मेरी पहली किताब का पद्य रूप है. इसके बाद गद्य में भी दिल की भड़ास निकाली)
यह "जुंबिसें" मैं अपने नीम बेदार मुआशरे को पेश कर रहा हूँ.

मेरा तअर्रुफ़ (परिचय)अधूरा रह जाएगा, अगर मैं यह न बतलाऊँ कि मैं किस खेत की मूली हूँ. 
उत्तर प्रदेश, ज़िला राय बरेली, क़स्बा सलोन में एक मोहल्ला ए नाहमवार "चौधराना" है, जिसकी नाहमवारी अपने बाशिंदों पर भी पूरा असर रखती है, यहीं पर ग़ालिबन 1944  में मैं पैदा हुवा.1971 में मेरी शादी हुई, 
दो बेटियों के बाद दो बेटे हैं. चारो अवलादें इल्म से मालामाल अपनी अपनी दुन्या में आबाद हैं. चारो नियोजित परिवार हैं, हर एक के दो दो बच्चे, भाई बहन हैं. 
मेरी बची खुची पूँजी निकहत परवीन हैं जो कि अनजाने में मेरे निकाह में आ गई थीं. 
मैं ठहरा ठेठ दहरया (नास्तिक) और वह कट्टर मुसलमान. 
दोनों एक दूसरे को पाल पोस रहे हैं.    
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जुंबिशें - - - पेश ए लफ़्ज़




जुंबिशें
 جنبشیں 
Junbishen


जुनैद मुंकिर

अपनी प्यारी नानी, 
सहीहमुन निसा के नाम - - -

जिनकी शफ़क़त की गोद और तरबियत की उंगलियों ने मुझे माँ की कमी महसूस नहीं होने दिया.
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जुंबिशें - - - तअर्रुफ़







हिन्दू के लिए मैं इक, मुस्लिम ही हूँ आखिर ,
मुस्लिम ये समझते हैं, गुमराह है काफ़िर ,
इंसान भी होते हैं, कुछ लोग जहाँ में ,
गफ़लत में हैं ये दोनों, समझाएगा 'मुनकिर';


ہندو کے لئے میں اک مسلم ہی ہوں آخر 
مسلم یہ سمجھتے، ہیں گمراہ ہے کافر 
انسان بھی ہوتے ہیں، کچھ لوگ جہاں میں 
غفلت میں ہیں یہ دونوں ، سمجھایگا منکر

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जुंबिशें - - - तस्वीर







जुनैद मुंकिर جنید منکر  Junaid Munkir