Sunday, June 10, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 83 चाहत है तेरी, और तेरा इंतेख़ाब



83

चाहत है तेरी, और तेरा इंतेख़ाब1 है,
क्या दोस्त तेरा, तेरी तरह लाजवाब है?

सो लेना चाहिए, तुझे कुछ देर के लिए,
नींद की हालत में, यह बेजा ख़िताब2 है.

है एक ही नुमायाँ, वहाँ चाँद की तरह,
बाक़ी हसीन चेहरों के, रुख़ पे नक़ाब है.

शायर है बेअमल, कि इसे बा अमल करो,
चक्खी नहीं कभी, मगर मौज़ूअ शराब है.

क़ानून क़ाएदों के, उसूलों की नींद में ,
उस घर में घुस गया, जहाँ जीना सवाब है.

रोका नहीं है भीड़ ने, टोका है, रुका हूँ,
'मुंकिर' को रोक ले, ये भला किस में ताब है.

१ पसंद 2  -संबोधन

،چاہت ہے تیری اور ترا انتخاب ہے 
کیا دوست تیرا، تیری طرح لا جواب ہے؟ 

،سو لینا چاہئے تمہیں، کچھ دیر کے لئے
حالت غنودگی کی ہے، بے جا خطاب ہے٠ 

،ہے ایک ہی نُمایاں وہاں چاند کی طرح 
باقی حسین تاروں کے رُخ پر نقاب ہے٠ 

،شاعر ہے بے عمل، کہ اُسے با عمل کرو 
چکّھی نہیں شراب کو، موضوع شراب ہے٠ 

،قانون قاعدوں کے، اُصولوں کی نیند میں 
اُس گھر میں گھس گیا، جہاں جینا ثواب ہے٠ 

،روکا نہیں ہے بھیڑ نے ٹوکا ہے، رُک گیا
منکر کو روک لے، بھلا یہ کس میں تاب ہے٠ 

Saturday, June 9, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 82 शाखशाना कोई अज़मत नहीं है



82

शाख़शाना कोई अज़मत नहीं है, 
भूल जाने में कुछ दिक़्क़त नहीं है .

दिल है नालां मगर नफ़रत नहीं है ,
वह मेरा आशना, वहशत नहीं है. 

मेरी जानिब से शर मुमकिन नहीं है ,
दिल दुखाना मेरी आदत नहीं है. 

सच है दिल में, भटक रहे हो अबस,
दैर या फिर हरम में, सत् नहीं है. 

आजज़ी कर चुके मुंकिर बहुत,
और झुकने की अब ताक़त नहीं है. 

मिल गया सब, मगर राहत नहीं है, 
कह भी मुंकिर कि अब चाहत नहीं है. 

***

،شاخشانہ کوئی عظمت نہیں ہے
بھول جانے میں کچھ دقّت نہیں ہے٠  

،دل ہے نالاں مگر نفرت نہیں ہے
وہ میرا آشنا وحشت نہیں ہے٠  

،میری جانب سے شر مُمکن نہیں ہے 
دل دُکھانا میری عادت نہیں ہے٠  

،سچ ہے دل میں بھٹک رہے ہو عبس
دیر  یا حرم میں ست نہیں ہے٠  

،عاجزی کر چُکا منکر بہت 
اور جُھکنے کی اب طاقت نہیں ہے٠ 

،مل گیا سب مگر راحت نہیں ہے 
کہہ بھی منکر کہ اب چاہت نہیں ہے٠  

Friday, June 8, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 81 हर शब की क़ब्रगाह से, उठ कर जिया करो


81

हर शब की क़ब्रगाह से, उठ कर जिया करो,
दिन भर की ज़िन्दगी में, नई मय पिया करो.

उस भटकी आत्मा से, चलो कुछ पता करो,
इस बार आइना में बसे, इल्तेजा करो.

दिल पर बने हैं बोझ, दो मेहमाँ लड़े हुए,
लालच के संग क़िनाअत1? इक को दफ़ा करो.

तुम को नजात दे दें, शबो-रोज़ के ये दुःख,
ख़ुद से ज़रा सा दूर, जो फ़ाज़िल ग़िज़ा करो.

दरवाज़ा खटखटाओ, है गर्क़ ए मुराक़्बा2,
आई नई सदी है, उसे इत्तेला करो.

'मुंकिर' को क़त्ल कर दो, है फ़रमान ए किब्रिया3 ,
आओ कि हक़ शिनास को, मिल कर ज़िबह करो.

१-संतोष २-तपस्या रत ३-ईश्वरीय आज्ञा

،ہر شب کی قبر گاہ سے، اُٹھ کر جیا کرو 
دِن بھر کی زندگی میں، نئی مئے پیا کرو٠ 

،اُس بھٹکی آتما سے چلو کچھ پتہ کرو 
اِس بار آئینہ میں بسے، اِلتجا کرو٠ 

،دل پر بنے ہیں بوجھ، دو مہماں لڑے ہوے
لالچ بھی ہے، نجات بھی، اک کو دفع کرو٠

،تم کو نجات دینگے، شب و روز کے یہ دُکھ
خود سے ذرہ سا دور، جو فاضِل غذا کرو٠

،دروازہ کھٹ کھٹا ؤ، ہے غرقِ مراقبہ 
آئ نئی صدی ہے، اُسے اطلا ع کرو. 

،منکر کو قتل کر دو، ہے فرمانِ کبریا 
آؤ کہ حق شناش کو، مل کرذبح کرو٠

Thursday, June 7, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 80 तुम भी अवाम की, ही तरह डगमगा गए



80

तुम भी अवाम की, ही तरह डगमगा गए,
मेरे यक़ीं के शीशे पे, पत्थर चला गए.

घायल अमल हैं, और नज़रिया लहू लुहान,
तलवार तुम दलील की, ऐसी चला गए.

मफ़रूज़ा हादसात, तसुव्वुर में थे मेरे,
तुम कार साज़ बन के, हक़ीक़त में आ गए.

पोशीदा एक डर था, मेरे ला शऊर में,
माहिर हो नफ़्सियात के, चाक़ू थमा गए.

भेड़ों के साथ साथ, रवाँ आप थे जनाब,
उन के ही साथ गिन जो दिया, तिलमिला गए.

ख़ुद एतमादी मेरी, ख़ुदा को बुरी लगी,
सौ कोडे़ आ के उसके सिपाही लगा गए.

*मफरूज़ा=कल्पित *कार साज़=सहायक *ला शऊर=अचेतन मन 
*नफ़्सियात=मनो विज्ञानं *खुद एतमादी=आत्म विश्वास

،تُم بھی عوام ہی کی طرح،  ڈگمگا گئے 
میرے یقیں کے شیشے پہ، پتھر چلا گئے 

،گھایل عمل ہیں اور نظریہ لہو لہان 
تلوار تُم دلیل کی، ایسی چلا گئے٠ 

،مفروضہ حادثات، تخیّل میں تھے مرے 
تُم چارہ ساز بن کے، حقیقت میں آ گئے٠ 

،پوشیدہ ایک ڈر تھا مرے لا شعور میں 
ماہر ہو نفسیات کے، چاقو تھما گئے٠ 

،خود اعتماد ی میری خدا کو بُری لگی 
سو کوڑے آ کے، اُسکے سپاہی لگا گئے٠

Wednesday, June 6, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 79 तरस न खाओ, मुझे प्यार कि ज़रुरत है



79

तरस न खाओ, मुझे प्यार कि ज़रुरत है,
मुशीर कार नहीं, यार कि ज़रुरत है.

तुम्हारे माथे पे उभरे, हैं सींग के आसार,
तुम्हें तो फ़तह नहीं, हार की ज़रुरत है.

क़लम की निब ने, कुरेदा है ला शऊर तेरा,
जवाब में कहाँ, तलवार की ज़रुरत है.

अदावतों को भुलाना भी, कोई मुश्क़िल है,
दुआ, सलाम, नमस्कार की ज़रुरत है.

शुमार शेरों का होता है, न कि भेड़ों का,
कसीर कौमों, बहुत धार की ज़रुरत है.

तुम्हारे सीनों में आबाद इन किताबों को,
बस एक 'मुंकिर' व् इंकार कि ज़रुरत है.

*मुशीर कार = परामर्श दाता *ला शऊर =अचेतन मन कसीर=बहुसंख्यक 

،ترس نہ کھاؤ مجھے پیار کی ضرورت ہے 
مشیر کار نہیں یار کی ضرورت ہے 
٠ 
،تمہارے ماتھے پہ ابھرے ہیں سینگ کے آثار 
تمہیں تو فتح نہیں ، ہار کی ضرورت ہے 
٠
،قلم کے نب نے کریدا ہے لا شعور ترا 
جواب میں کہاں ، تلوار کی ضرورت ہے 
٠
،عداوتوں کو بھلانا بھی کوئی مشکل ہے 
دعا ، سلام ، نمسکار، کی ضرورت ہے 
٠
،شمار شیر کا ہوتا ہے ، نہ کہ بھیڑوں کا 
کثیر قوم ، بہت دھار کی ضرورت ہے 
٠
تمہارے سینے میں آباد ان کتابوں کو
بس ایک منکر و انکار کی ضرورت ہے ٠٠ 

Tuesday, June 5, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 78 मोहलिक तरीन रिश्ते



78

मोहलिक तरीन रिश्ते, निभाए हुए थे हम,
बार ए गराँ को सर पे, उठाए हुए थे हम.

ख़ामोश थी ज़ुबान, कि  अल्फ़ाज़  ख़त्म थे,
लाखों ग़ुबार दिल में, दबाए हुए थे हम.

ठगता था हम को इश्क़, ठगाता था ख़ुद को इश्क़,
कैसा था एतदाल, कि पाए हुए थे हम.

गहराइयों में हुस्न के, कुछ और ही मिला,
न हक़ वफ़ा को मौज़ूअ, बनाए हुए थे हम.

उसको भगा दिया कि वोह, कच्चा था कान का,
नाकों चने चबा के, अघाए हुए थे हम.

सब से मिलन का दिन था, बिछड़ने की थी घडी,
'मुंकिर' थी क़ब्रगाह, कि  छाए हुए थे हम,

*मोहलिक तरीन =हानि कारक *बारे गराँ=भारी बोझ *एतदाल=संतुलन *मौज़ू=विषय.

،محلق ترین رشتے، نبھاۓ ہوئے تھے ہم 
بارِ گراں کو سر پہ، اٹھاۓ ہوئے تھے ہم٠ 

،خاموش تھی زبان، کہ الفاظ ختم تھے  
لاکھوں غبار دل میں، دباے ہوئے تھے ہم٠ 

،ٹھگتا تھا عشق اور ٹھگاتا تھا خود کو عشق 
کیسا تھا اعتدال، کہ پاۓ ہوئے تھے ہم٠ 

،گہرایوں میں عشق کے، کچھ اور ہی ملا  
نا حق وفا کو موضوع، بناے ہوئے تھے ہم٠ 

،اُسکو بھگا دیا، کہ وہ کچّا تھا کان کا
ناکوں چنے چبا کے، اگھاۓ ہوئے تھے ہم٠ 

،سب سے ملن کا دن تھا، بچھڑ نے کا دن بھی تھا 
منکر تھی قبر گاہ، کہ چھاۓ ہوئے تھے ہم٠ 

Monday, June 4, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 77 है कैसी कशमकश ये



77

है कैसी कशमकश ये, कैसा या वुस्वुसा है,
यकसूई चाहता है, दो पाट में फँसा है.

दिल जोई तेरी की थी, बस यूँ ही वह हँसा है,
दिलबर समझ के जिस को, तू छूने में लसा है.

बकता है आसमाँ को, तक तक के मेरी सूरत,
पागल ने मेरा बातिन, किस ज़ोर से कसा है।

सच बोलने के ख़ातिर, दो आँख ही बहुत थीं,
अलफ़ाज़ चुभ रहे हैं, आवाज़ ने डंसा है.

कैसी है सीना कूबी? भूले नहीं हो अब तक,
बहरों का फ़ासला था, सदियों का हादसा है.

है वादियों में बस्ती, आबादी साहिलों पर,
देखो जुनून ए 'मुंकिर' गिर्दाब में बसा है.

*बातिन=अंतरात्मा *सीना कूबी=मातम *बहरों=समन्दरों *गिर्दाब=भंवर

ہے کیسی کشمکش یہ، یہ کیسا وسوسہ ہے؟ 
یکسوئی چاہتا ہے، دو پاٹوں میں پھنسا ہے٠ 

،دل جوئی تیری کی تھی، بس یوں ہی وہ ہنسا ہے 
دلبر سمجھ کے جسکو، تو چھونے میں لسا ہے٠ 

،تکتا ہے آسماں کو، تک تک کے میری صورت 
پاگل نے میرا باطن، کس زور سے کسا ہے٠ 

،سچ بولنے کی خاطر، دو آنکھین ہی بہت تھیں 
الفاظ چُبھ رہے ہیں، آواز نے ڈنسا ہے٠ 

کیسی ہے سینہ کوبی، بھولے نہیں ہو اب تک؟
صدیوں کا حادثہ ہے، بحروں کا فاصلہ ہے٠ 

،ہے وادیوں میں بستی، آبادی ساحلوں پر 
دیکھو جنونِ منکر، گرداب میں بسا ہے٠