Saturday, March 17, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 2



शोर ए किब्रियाई1 है, और स्वर हरे ! हरे !!
बख़्श दे इन्हें ख़ुदा, ईशवर उन्हें तरे.

वह है सच जो तूर पर, माइले ए कलाम है?2
या कि उस पहाड़ पर, जो कि है जटा धरे??

आसमाँ पर वह उड़ा, आप का यक़ीं अरे?
कैसा आदमी था वह, अपनी ज़ात से परे?

क़ब्र को खिला रहे हो, तुम सवाब की ग़िज़ा,
तुम को क्या ज़मीन, पर कोई भूक से मरे.

यह ख़ुदा का घर नहीं है, तेरे घर में है ख़ुदा,
क्यूँ भटक रहा है तू, काबा काशी बाँवरे.

है ख़बर कि चल पड़े, दोनों तेरी राह पर,
ये ख़बर भी आएगी, दोनों फिर से लड़ मरे.

१-ईश वंदना का शोर २-अर्थात मूसा जो तूर पर्वत पर जाकर ईश्वर से बातें करते थेs

!شورِ کِبریائی ہے اور سوَر ہرے! ہرے 
اِنکو خدا نجات دے، اُنکو ا یشور ترے٠ 

وہ ہے سچ جوطور  پر مائلِ کلام ہے
یا کہ اُس پہاڑ پر جو کہ ہے جٹا دھرے٠ 

آسماں پہ وہ اُڑا ؟ آپ یقیں ارے!  
کیسا آدمی تھا وہ؟ اپنی ذات سے پرے٠ 

قبر کو کھلا رہے ہو تم، ثواب کی غذا 
تم کو کیا زمین پر، کوئی بھوک سے مرے٠ 

یہ خدا کا گھر نہیں ہے، تیرے گھر میں ہے خدا
کیوں بھٹک رہا تو، کعبہ کاشی بانورے

ہے خبر کہ چل پڑے، دونوں تیری راہ پر 
یہ خبربھی آیگی، باہمی وہ لڑ مرے٠ 

Friday, March 16, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 1




1

किताब सर से उतारा है, कहे देता हूँ,
हमारे सर में भी पारा है, कहे देता हूँ.

फ़क़त नहीं वह तुम्हारा है, कहे देता हूँ,
सभी का उस पे इजारा है, कहे देता हूँ.

सवाब पढ़ के पढ़ा के मिले, तो लअनत है,
सवाब जीना गवारा है, कहे देता हूँ.

हिफ्ज़ ए रूदाद ऐ हाफ़िज़ है तज़ीउल वक़ती,
यह सर का भारी ख़सारा1 है, कहे देता हूँ.

दिमाग़ माने, कोई धर्म या कोई मज़हब,
लहू में पुरखों की धारा है, कहे देता हूँ.

यही इनकार तो 'मुंकिर'की जमा पूँजी है,
इसी ने उसको संवारा है, कहे देता हूँ.

हिफ्ज़ ए रूदाद =दास्तान कंठस्त , तज़ीउल वक़ती=समय की बर्बादी १-हानि 

کتاب سر سے اُتارا ہے، کہے دیتا ہوں، 
ہمارے سر میں بھی، پارہ ہے کہے دیتا ہوں. 

فقط نہیں وہ تمہارا ہے کہے دیتا ہوں، 
سبھی کا اُس پہ اِجارہ ہے کہے دیتا ہوں. 

ثواب پڑھ کے پڑھا کے ملے تو لعنت ہے، 
ثواب جینا گوارہ ہے کہے دیتا ہوں. 

حفظِ روداد ائےحافظ! ہےتضیع الوقتی، 
یہ سر کا بھاری خسارہ ہے کہے دیتا ہوں. 

دماغ مانگے کوئی دھرم، یا کوئی مذہب، 
لہو میں پُرکھوں کی دھارا ہے کہے دیتا ہوں. 

یہی انکار تو منکر کی جمع پونجی ہے، 
اِسی نے اُسکو سنوارا ہے کہے دیتا ہوں٠

जुंबिशें - - - तमहीद




मअज़रत

मेरे यारो ! न गर बुरा मानो,
देर तक मेरे पास मत बैठो,
मेरी दुल्हन उदास होती है,
तनहा पाकर ही पास होती है. 

मेरी दुल्हन है मेरी तन्हाई,
लेके आती है ऐसी अंगड़ाई,
कायनातों का राज़ देती है,
शेर माँगूं बयाज़2 देती है. 
१ क्षमा याचना २ कविता-पोथी 

معذرت

میرے یارو نہ گر بُرا مانو، 
دیر تک میرے پاس مت بیٹھو، 
میری دُ لہن اُداس ہوتی ہے، 
تنہا پا کر ہی پاس ہوتی ہے.
میری دُلہن ہے میری تنہائی، 
لے کے آتی ہے ایسی انگڑائی، 
کائناتوں کا راز دیتی ہے، 
شعر مانگوں، بیاض دیتی ہے٠

जुंबिशें - - - तअर्रुफ़






हिन्दू के लिए मैं इक, मुस्लिम ही हूँ आख़िर,
मुस्लिम ये समझते हैं, गुमराह है काफ़िर,
इंसान भी होते हैं, कुछ लोग जहाँ में,
गफ़लत में हैं ये दोनों, समझाएगा 'मुंकिर'.  



ہندو کے لئے میں اک مسلم ہی ہوں آخر، 
مسلم یہ سمجھتے ہیں، گمراہ ہے کافر،
انسان بھی ہوتے ہیں کچھ لوگ جہاں میں،
غفلت میں ہیں یہ دونوں، سمجھاۓ گا 'منکر'٠ 

Saturday, March 3, 2018

जुंबिशें - - - सलाम उन पर



सलाम उन पर - - -

अपनी माँ सुग़रा बेगम पर सलाम, जिनको कि उनके बच्चे बीबी कहते थे.
बहुत धुंधली सी सूरत उनकी मेरे ज़ेहन में बसी है.
मैं पांच छः साल का था कि वह चल बसीं.
अपनी प्यारी नानी पर सलाम जिनका ज़िक्र मैं पहले कर चुका हूँ,
जिनका रंग रूप और रूह मेरे वजूद में बसा हुवा है.
नानी के भाई नाना निसार ख़ान पर सलाम जिनकी तक़रीरों से मेरी मालूमात की बुन्यादें पड़ीं.
भाई मुहम्मद अजमल ख़ान पर सलाम जिनकी खट्टी मीठी यादगारें मेरे ज़ेहन पर नक्श हैं.
मामा मुंशी आफ़ाक़ पर सलाम जो मेरे उस्ताद भी थे.
स्वर्गीय राम आश्रय मिश्र पर सलाम जो सर्वोदय विद्या पीठ इंटर कालेज सलोन के प्रिंसपल थे, (साहब) मेरे आदर्श रहे, मैं उनका प्रिय था.
अपने बचपन के दोस्तों, फुससन, रज़ी, अतहर, सामिन को सलाम भेजता हूँ जो आज भी मुझे माज़ी की वादियों में पहुंचा देते हैं.
मेरे चतीते नफ़ीस और मुबीब भाई को सलाम 
और मेरे रहबर दोस्त शरीफ़ भाई (जिन्होंने ने मुझे दहरियत के ख़ला में ढकेल कर ख़ुद कनारे खड़े हो गए.) पर  सलाम. 
अतीक़ बरकाती को सलाम जो लोगों के काम आते रहते हैं और लोग उनके.
मास्टर शहिद को सलाम जो बहर हाल मुझे अज़ीज़ हैं.
जनाब फ़ारूक़ अहमद जायसी को ख़ुसूसी सलाम जिन्हों ने मेरी शायरी के मुंह पर अरूज़ी लगाम लगा दिया.
आख़ीर में उन सभी परियों को सलाम जिनसे कभी मेरा साहब सलाम हुवा करता था.
सलाम के बाद उन मासूमों को दुआएं जो मेरा मुस्तकबिल हैं.
डा. आसिया चौधरी अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर की हैसियत से नस्लों को इल्म  बाट रही है,
कहते हैं हर मर्द की कामयाबी में किसी औरत का हाथ होता है,
मगर आसिया की कामयाबी में उसके मर्द शिक़वत अली "ग़यास" का हाथ है. दोनों को दुआओं के साथ साथ उनके बच्चों अशअर और सारिया को दुआएं.
दुआएँ मेरी छोटी बेटी फ़रह ख़ान को, जो अपने शौहर कर्नल अशरफ़ ख़ान, अपने बेटी अनमोल और बेटे अरमान के साथ मुमबासा में क़याम  करती है .
अनमोल नें मेरे ख़्वाबों को साकार किया है,
मास्को में स्पेस साइंस (अंतरिक्ष विज्ञान) में तालीम हासिल कर रही है.
बड़ा बेटा फ़ैज़ी चौधरी अपने परिवार के साथ UK जा बसा. ज़ायान और सारा हमारे पोते और पोती को दुआएँ.
आख़ीर में दुआएं अपने छोटे बेटे मंज़र चौधरी (बाबर) को
जो बैंगलुरू में अपने परिवार अतिया दो बच्चे ज़ारा और जिबरान के साथ करता है.   

*****

जुंबिशें - - - नईं अज़ान



नईं अज़ान 

यह धर्म और मज़हब इंसान के लिए अगर कारगर होते तो सदियों पहले आदमी इंसान बन चुका होता.
दर अस्ल इसने हमेशा इंसान और इंसानियत का बुरा ही किया है. 
जितना इंसानी ख़ून मज़ाहिब ने पिया है उतना किसी दूसरी तहरीक ने नहीं. अवतारों और पयम्बरों के ज़माने में ही बड़ी बड़ी जंगें हुईं, 
महा भारत हुईं है जिनको धर्म युद्ध अथवा जिहाद का नाम देकर पवित्र कर लिया गया.
धर्म गुरुओं ने कभी भी आदमी को इन्सान बन कर इंसानी आज़ादी नहीं दी.
बस मनवाया है पहले अपने गढ़े हुए ख़ुदा को, बाद में ख़ुद को.
इतिहास में कोई मिसाल नहीं मिलेगी कि देश में मज़हबी हुकूमत क़ायम हुई हो और पड़ोस में अमन रहा हो. रातों को भेस बदल कर अपनी रिआया का दुःख दर्द समझने वाले हुक्मराँ, 
दिन में दूसरे मुल्क पर हमला करने का फ़रमान जारी किया करते थे.
मौजूदा बड़े बड़े देवालय और बारगाहें लूट मार से वसूली गई दौलत से बनी हुई हैं. 
अजीब बात हुवा करती थी कि अपना धर्म को दूसरे पर थोपें, 
न माने तो गर्दन उड़ा दें, उसके बाद इस ज़ुल्म को जिहाद का नाम दें.
नया युग आ गया है. आप  पूरा यक़ीन कर सकते हैं कि अतीत की ग़ैर फ़ितरी (अलौकिक) मज़हबी बातें,जन्नत और दोज़ख कोरी कल्पनाएँ हैं. वैज्ञानिक खोजें इन मीनारों को ध्वस्त कर चुकी हैं, फिर भी इनका भूत आप के पिंडों को नहीं छोड़ता. यह कब तक चलेगा, हम कब तक झूट को जीते रहेंगे.
पेश किताब से मैंने शाइरी के तसव्वुत (माध्यम) से इंसानी ज़ेहन को 'जुंबिशें' दी है.
मैं नहीं जानता कि मैं शायर हूँ भी कि नहीं, मगर मैंने इतना ज़रूर जाना है कि अपनी बातें दो लाइन में कहने के लिए शायरी से बेहतर कोई माध्यम नहीं.
शेर ऐसा कैप्शूल है जिसे आसानी से निगला जा सकता है.
तवील मज़ामीन को पढ़ने के लिए किसी के पास वक़्त नहीं.
मेरे अशआर रंगीन, संगीन और ग़मगीन कैप्शूलों में बंद हैं, किसी तरह भी इनके असरात लोगों के दिमागों में पहूँचे और हलचल पैदा करे.
मौजूदा समाज को ज़ेहनी इलाज के लिए 'जुंबिशें' दे रहा हूँ.
मैं ख़ूब जानता हूँ कि सोए हुए व्यक्ति को जुंबिशें नागवार गुज़रती हैं, 
उनकी नींद में ख़लल जो पड़ता है.
वह झिंझोड़ने वाले को लाल पीली नज़रों से तो देखते ही हैं, 
फिर होश संभाल कर बैठ जाते है. 
मुझे पूरी उम्मीद है कि "जुंबिशें" उनको जब पूरी तरह से जगा देंगी तो वह मेरे अच्छे दोस्त बन जाएँगे.
जुंबिशें मेरी उरियां (नग्न) सदाक़तों की रोशनाई से लिखी हुई इबारतें हैं. 
मैंने कहीं कोई मस्लेहत और लिहाज़ नहीं बरती. 
मेरे हिसाब से यह बुज़दिली की अलामतें हैं. 
इन्हीं की वजह से मरज़ के जरासीम पनपते हैं.
जुंबिशें बहुत सा पड़ाव पेश करती हैं, हर पड़ाव पर आपको रुकना होगा, एक लंबी सांस लेकर फ़ितरत को निहारना होगा, आपको अपनी हस्ती का पता मिलेगा जो कि कहीं खोई हुई है. जब आप अपने आपको पा जाएँगे तो आपको किसी की ज़रुरत नहीं होगी. 
यह कितना बड़ा सनेहा (विडंबना) कि आप ख़ुद अपने आपसे नहीं मिलते.
जुन्बिशों की घटनाओं को आप अपने अन्दर घट जाने दें, 
आपको नज़रयाती गुलामी से नजात मिल जाएगी. 
उसके बाद आप होंगे और उसके बाद भी सिर्फ़ आप ही होंगे. 
इंसान ख़ुद को पा जाए तो यह उसके लिए सबसे बड़ा इनआम है. 
धर्म व मज़हब, ज़ात पात से मुक्त हो जाएँगे, कोई पराया न रह जाएगा. वजूद पर लदे इन तमाम बोझों से सुबुक दोशी होगी. 
ला महदूदयत (अनन्त) मज़ा आने लगेगा. न आपका कोई हक्वारा होगा न आप किसी पर ग़ालिब होना पसंद करेंगे. 
कोई झूट आपसे नज़रें मिलाने की हिम्मत न कर सकेगा. 
हम सभी कायनात के एक ज़र्रे हैं, 
बहुत कम वक़्त के लिए इसके दायरे में आए हैं,

पाई है हम ने जहाँ में गुल की मानिंद ज़िदगी,
रंग बन कर आए हैं, बू बन के उड़ जाएँगे हम.

कुछ देर के लिए स्टेज पर आए हैं, अपने रोल करके चले जाएँगे. 
स्टेज पर डेरा नहीं डालेंगे.
मैं तमाम  ख़ल्क़ का ख़ैर ख्वाह हूँ. 
हमारे इंसानी मज़हब में अदावत हराम है.
साथ साथ ग़लत को क़ायम रखना भी  हमें गवारा नहीं.
आइए हम सब मिल कर इंसान और सिर्फ़ इंसान बन जाएं.
इंसान के सिवा कुछ भी बाक़ी न बचें.
हर ज़ेहन में इंसानियत की रूह फूकें.
हर तरफ इंसानियत की खुशबू बिखेरें.
बिरादराना एकता से परे, 
ओछी पहचानो से दूर, 
सरहदी हद बंदियों से बेख़बर,
हम मुसलसल इंसानी आबादी बन जाएं.
पाषाण युग की तरह अतीत के धर्म व मज़हब को इतिहास के अजायब घर में रख दें. हमारा मज़हब एक, बस मज़हब ए इंसानियत हो.
इसकी ज़रुरत सिर्फ़ मानव जाति को ही नहीं, बल्कि धरती के हर जीव को है.
मेहनत हमारा दीन हो,
इन्साफ़ की रोटी हमारा ईमान हो,
इंसानी हुक़ूक़ की भरपाई हमारी पूजा हो और इबादत हो.
इस धरती को सजाना और संवारना हमारा मक़सद ए हयात हो.
इससे ज़्यादा और क्या चाहिए हमारी नस्लों को ?
*****

Thursday, March 1, 2018

जुंबिशें - - - अर्ज़ और निवेदन


अर्ज़ और निवेदन 

माज़ी में हमें समाज सुधार की राहों में बहुत सी हस्तियाँ झिलमिलाती हुई नज़र आएंगी, जिन्हें हम अवतार, पैग़म्बर, गुरु और महात्मा कहते हैं. 
उस ज़माने के समाजी मसाइल को मद्दे-नज़र रखते हुए, हमें उनके पैग़ाम पर एक नज़र डालना चाहिए. 
जिस तरह आदमी बचपन को पार करते हुए जवानी तक पहुँच जाता है, उसी तरह इंसानी समाज भी इरतेक़ाई सूरत में (रचना कालिक) है. 
इंसान की रिहाइश गुफाओं, जंगलों और दरख़्तों पर कभी हुवा करती थी, कुछ समझ आई तो घर बनाना शुरू किया, खेती बाड़ी करने लगा, 
कुछ और समझ आई तो बस्तियां बना कर रहने लगा, - - -  
गरज़ कि आज यहाँ तक नौबत आ गई है कि इंसान आसमान फ़तह करने लगा. 
समाज सुधारकों के हथियार भी इर्तेक़ाई हुवा करते हैं, इनमें भी तब्दीली हुवा करती है. जब अक्ल़ ए इंसान तिफ़ली (बचकानी) थी तब समाज सुधार के लिए जो हथियार गढ़े गए थे, क्या वही हथियार आज जवान शऊर के लिए कारामद साबित हो सकते हैं ? 
नहीं. 
इस वक़्त इन तमाम हथियारों को कुंद और नाकारा कहा जाएगा. 
इन्हीं कुंद हथियारों की उस वक़्त ज़रुरत थी, इसके आलावा कोई सूरत न थी.
आज की सच्चाई यह है कि उनके समाज सुधार के हथियार हुवा करते थे मन गढ़ंत. वह ज्ञान आधारित थे न विज्ञान आधारित. 
आत्मा, रूह, शैतान, भूत और फिर देवी देवता, उसके बाद ख़ुदाओं का तसव्वुर क़ायम हुवा. इन्हीं हथियारों से हमारे बुजुर्गों ने समाज सुधार और समाज कल्याण का फ़र्ज़ निभाया. 
खुदा और शैतान का तसव्वुर नेकी और बदी की अलामतें बना कर पेश की गईं. 
जन्नत और दोज़ख का ख़याल देकर अवाम को ललचाया और डराया गया. इसके बावजूद अगर लोग बुराइयों से कनारा कश न होते तो उन पर मज़हबी सख़्तियाँ होतीं. 
रहबरों ने इंसानी समाज के लिए जो भी किया उसे बुरा नहीं कहा जा सकता. वह बहरहाल समाज के हमदर्द थे. 
अहम् सवाल यह उठता है कि माज़ी के कुंद हथियार क्या आज कारामद हैं? 
जिन्हें कि सारे मुल्ला पंडित आज भी भांज रहे हैं. 
क्या किसी जवान को "बिलव्वा आया" कहकर डराया जा सकता है ? 
याद रख्खें आलमी सच्चाइयां, आलमी होती हैं. 
यह इंसान को आलम और इल्म से मिलती हैं न कि धर्म व मज़हब से.

नईं तअलीमी और ख़ासकर साइंसी इन्क्शाफ़ात (खोजें) ने कल के समाज को बच्चा साबित कर दिया है. आजका इंसान अब इर्तेक़ाई मरहलों (रचना कालिक पड़ाव) का बच्चा नहीं रहा. मौजूदा इंसानी समाज को उरयाँ (नंगी) सदक़तों (सच्चाइयां) की ज़रुरत है. 
इस बात पर यक़ीन किया जा सकता है कि उरियां  सदक़तों से हम आगोश मुआशरा ही मुकम्मल इंसान पैदा कर सकता है, जिसे कि महान जर्मन विचारक फेड्रिख बिलहिल्म्स नीत्शे ने महामानव कहा है.
आज ज़रुरत इस बात की है कि धर्म और मज़हब की गुत्थियों पर बारीक नज़र डाली जाए. क्या यह गुथ्थियाँ सुलझ कर इंसानियत के लिए सीधी राह दे सकती हैं ? 
  समाजी सांचे में फिट रहने के लिए हर फ़र्द किसी न किसी तंजीम, जमात, संघ या पार्टी वग़ैरा से जुड़ा रहना चाहता है, जिसके कि हक्वारे हुवा करते हैं, जोकि सीमित सोच रखने वाली अवाम को भेड़ बकरियां समझते है. अविकसित और अल्प बुद्धि मानव समाज का प्राणी अपनी कमज़ोर सोच के लिए यहाँ ऊर्जा पाता है. यह एक तरह की जन साधारण की ज़ेहनी हवालगी होती है. इसमें दाख़िले के बाद व्यक्ति हक्वारे के रेवड़ का एक मवेशी बन कर रह जाता है. यहाँ पर शब्द "डिसिप्लिन" हक्वारे के बड़ा काम आता है. एक वक़्त आता है जब फ़र्द ख़ुद अपने वजूद का मालिक नहीं रह जाता. वह अपने हक्वारे को ही अपना बख़्शनहारा मानने लगता है. यह आत्म घाती हवालगी उसे ज़मीन और आसमान की फ़िकरों से नजात दिला देती है. 

दर अस्ल यह कमज़ोर सोच रखने वालों के लिए एक तरह की राह-ए-फ़रार है. पलायन है. यह फ़रार लोग निहायत ग़ैर ज़िम्मेदार होते हैं. अपने बाल बच्चों को ख़ुदा की मर्ज़ी की वल्दियत दे देते हैं. यह लोग तंज़ीम में ख़ुद को बहुत महफ़ूज़ पाते हैं. इनका ख़मीर बुनयादी तौर पर काहिल और निकम्मा होता है. इनकी आसान पसंदी हकवारों की बद नियती को नज़र अंदाज़ करती रहती है.
झुण्ड की झुण्ड यह रूहानी भेड़ें अपने दिल व दिमाग़ और ज़मीर को हक्वारे की क़त्ल गाह के हवाले किए रहती है. इस तरह से क़ुदरत से मिला हुवा ज़िंदगी का नायाब तोहफ़ा ज़ाया हो जाता है. 
मैंने इन पेशावर पीरों के दर पर देखा कि मर्द बच्चे सिंफ़-ए -नाज़ुक की तरह अपनी ज़ात को इनके हवाले किए रहते हैं. 
उफ़ ! वजूद की इस क़दर पामाली. 

अपने आप की रहनुमाई की आवाज़ कहीं से मेरा कानों में आई, 
रहनुमाई के लिए सदाक़तें उँगली थमाने के लिए सामने खड़ी हुई थीं. 
बचपन में कबीरी दोहों को इम्तेहान पास करने के लिए जो रटे थे, 
उनमे माने नज़र आने लगे.
साँच बराबर तप नहीं, झूट बराबर पाप,
जाके ह्रदय सांच है, ताके ह्रदय आप. 

 इसके बाद भी ज़ेहनी बलूग़त (परपक्वता) ने सफ़र जारी रख्खा, 
मुझे इस आप (ख़ुदा) में भी साँच की तलाश महसूस हुई. 
लोगों ने इस आप की बाज़ार में पाप की दुकानें लगा रख्खी हैं 
और आप सर भी नहीं झटकता. 
कहीं कहीं यह आप भी बे सिर पैर की बातें करता है और ख़तरनाक पैग़ाम देता है. 
इस आप के ताजिर मुफ़्त का हलुवा पूरी खा रहे हैं. 
कहीं कोई कबीर नज़र नहीं आया जो मशक्क़त कर के अपने परिवार की रोज़ी रोटी कमा रहा हो. हमारा मौजूदा समाज हाँला कि तअलीम याफ़ता हुवा जा रहा है, इस के बावजूद धर्म के धंधे बाज़ो को बर्दाश्त कर रहा है. ऐसा माहौल बन गया है कि कोई भी इनसे पंगा नहीं लेना चाहता. 
हक़ीक़त से सभी वाक़िफ़ हैं और चाहते हैं कि कोई आगे आकर मोर्चा संभाले, मगर वह मेरे घर का फ़र्द न हो, पड़ोसी हो. 
पता नहीं लोग किस पयम्बर की आमद का इंतेज़ार कर रहे हैं.
ज़रुरत इस बात की है कि हम ख़ुद उठें और इन ख़ुदा फ़रोशों की दूकानों की बोहनी न होने दें. हमें मग़रिबी (पश्चिमी) मुल्कों की तरह जाग जाने की ज़रुरत है, न कि उन पर तनक़ीद करने की. 
हम ख़ुद साख़ता जगत गुरु बने बैठे हैं. इन बातों में कोई दम है ?
मग़रिब जहाँ इंसान क्या हैवान भी तहफ्फ़ुज़ पाए हुए हैं और हम इंसान को अपने बे बुन्याद नज़रिए को मनवाने के लिए मार देते हैं. हमें अपने तौर तरीक़ों को सुधारने और संवारने की ज़रुरत है. हमारे जमहूरी निज़ाम से कोई उम्मीद नहीं. इसने तो चोर उचक्कों, बदमाशों, डाकुओं, ज़ालिमो और क़ातिलों को भी सरकार बनाने की इजाज़त दे रख्खी है.
क़ौम का सब से बड़ा सानेहा (विडंबना) है, जवानो को अधूरी और नाक़िस तअलीम,(खास कर मुसलमानों में) . 
जो दीनी तअलीम बच्चों को दी जाती है वह मौजूदा पैमाने में उन्हें पीछे ले जाती है. बहुत कम लोग अपने बच्चों को जदीद तअलीम दे पाते हैं. 
बच्चों के ज़ेहनों में माफ़ोक़ुल फ़ितरत (अलौलिक) अक़ायद कूट कूट कर भर दिए जाते हैं. तअलीम से फ़ारिग़ होने के बाद यह नौजवान पुख़ता उम्र के मोलवी और मुल्लाओं के हत्थे चढ़ जाते हैं फिर समाज पर यह नव जवान बोझ बन जाते हैं. 
दूसरी तरफ़  बेदार तबक़े के नवजवान इनके मुक़ाबले में जब आला डिग्रियां लेकर आते हैं तो मदरसे  इनको नक़ली ओहदेदार का रुतबा दे देता है. यही नव जवान जब ज़िम्मेदारी के बोझ तले आते हैं तो इन्हें फुटपाथी रोज़ी के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता. यही नव जवान जब ऊधम मचाते हैं तो कभी बुत शिकन तालिबान बन जाते हैं तो कभी मस्जिद शिकन कार सेवक हैं. 
धर्म व मज़हब हमेशा से हुक्मरानों के लिए बहतरीन हथियार रहे हैं. 
या यूँ कहा जाए कि इनका ज़यादा हिस्सा सियासत है. 
ख़ास कर इस्लाम जो बड़े शान से कहता है कि वह मुकम्मल निज़ाम ए हयात है. 
धर्म इससे कुछ अलग है, यह मज़हब की होड़ में मज़हब नुमा हुवा जा रहा है. 
धर्म की व्याख्या बहुत ही मुख़्तसर है, 
"धर्म कांटे की सही नाप तौल धर्म है." 
मौजूदा धर्म और मज़हब पूरी तरह से सियासत बन चुके हैं. 
आज़ादी के 70 साल बाद इसकी बीमारी उप महाद्वीप में नए सिरे से फैल रही है, यह फैलाव इसके लिए दुर्भाग्य  ही कहा जाएगा. चरित्र स्कूल से लेकर अदालत तक गिरता चला जा रहा है. क़ौम रचना को छोड़ कर छूमंतर की तरफ़  दौड़ी चली जा रही है. 
कोई नहीं समझ पा रहा कि उप महाद्वीप को एक लामज़हब इंक़लाब की ज़रुरत है जिसमे अहिंसा की कोई महिमा न हो. तरक्क़ी याफ़्ता मुल्क हमारी इस अचेतन पर आँख गडोए हुए है, इन्हें पिछले दरवाज़े से हमारे घर में घुसने की इजाज़त भी मिल चुकी है. वह धर्म और मज़हब की बीमारी से मुक्त हो चुके हैं और हम पर यह दोहरी हुई जा रही हैं.
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