Saturday, April 7, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 22



22

सुकून ए क़ल्ब को, दिल की हसीं परी तो मिले,
तेरे शऊर को, इक हुस्न ए दिलबरी तो मिले.

नफ़स नफ़स की बुख़ालत  को ख़त्म कर देंगे,
तेरे निज़ाम में, पाकीज़ा रहबरी तो मिले.

क़िनाअतें तेरी, तुझ को सुकूं भी दे देंगी,
कि तुझ को सब्र, बशक्ल ए क़लन्दरी तो मिले.

जेहाद अब नए मअनो को ले के आई है.
तुम्हें ''सवाब व्  ग़नीमत'' से, बे सरी तो मिले.

वहाँ पे ढूँढा तो, बेहतर न कोई बरतर था,
फ़रेब खुर्दा ए एहसास ए बरतरी तो मिले.

तू एक रोज़ बदल सकता है ज़माने को,
ख़याल को तेरे 'मुंकिर" सुख़नवरी तो मिले.

*बुख़ालत=कंजूसी *केनाआतें=संतोष *कलंदरी=मस्त-मौला *''सवाब ओ गनीमत'' =पुण्य एवं लूट-पाट*सुख़नवरी=वाक्-

،سکونِ قلب کو دل کی حسین پری تو ملے 
ترے شعور کو اک حسنِ دلبری تو ملے٠ 

،نفس نفس کی بُخا لت کو ترک کر دینگے 
ترے نظام میں پاکیزہ رہبری تو ملے٠

،قناعتیں تری تُجھکو سکوں بھی دیدیں گی 
کہ تجھ کو صبر بَشکلِ قلندری تو ملے٠

،جہاد اب نئےمعنوں کو لے کے آئی ہے 
تمہیں ثواب و غنیمت سے بے سری تو ملے٠

،وہاں پہ ڈھونڈھا تو، کم تر نہ کوئی برتر تھا
فریب خوردہء احساسِ برتری تو ملے٠

،تو ایک روز بدل سکتا ہے زمانے کو 
خیال کو ترے منکر سُخن وری تو ملے٠

Friday, April 6, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 21



21

सच्चाइयों ने हम से, जो तक़रार कर दिया,
हमने ये सर मुक़ाबिल-ए-दीवार कर दिया.

अपनी ही कायनात से, बेज़ार जो हुए,
इनको सलाम, उनको नमस्कार कर दिया.

तन्हाइयों का सांप, जब डसने लगा कभी,
ख़ुद को सुपुर्द ए ग़ाज़िए, गुफ़्तार1 कर दिया.

देकर ज़कात सद्क़ा, मुख़य्यर अवाम ने,
अच्छे भले ग़रीब को बीमार कर दिया.

हाँ को न रोक पाया, नहीं भी न कर सका,
गोया कि हर गुनाह का, इक़रार कर दिया.

रूहानी हादसात व् अक़ीदत के ज़र्ब ने,
फ़ितरी असासा2 क़ौम का, बेकार कर दिया.

1 बातूनी 2 क़ुदरती पूंजी 

،سچائیوں نے ہم سے جب تقرا ر کر دیا 
ہم نے یہ سر مقابلِ دیوار کر دیا٠ 

،اپنی ہی کائنات سے، بیزار جب ہوئے 
انکو سلام، انکو نمسکار کر دیا٠ 

،تنہائیوں کا سانپ جب ڈسنے لگا کبھی 
خود کو سپردِ غازی گفتار کر دیا٠ 

،دے کر زکات صدقہ، مخیّر عوام نے 
اچھے بھلے غریب کو بیمار کر دیا٠ 

،ہاں کو نہ روک پاۓ، نہیں بھی نہ کر سکے
نا کردہ تھے گناه ، کہ اقرار کر دیا٠ 

،روحانی حادثاتِ عقیدت کے ضرب نے 
فطری اثاثے قوم کا بیکار کر دیا٠ 

Thursday, April 5, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 20



20

ख़ारजी हैं सब तमाशे, साक़िया इक जाम हो,
अपनी हस्ती में सिमट जाऊं, तो कुछ आराम हो.

ख़ुद सरी, ख़ुद बीनी, ख़ुद दारी, मुझे इल्हाम1 है,
क्यूं ख़ुदा साज़ों की महफ़िल से, मुझे कुछ काम हो.

तुम असीर2 ए पीर मुर्शिद हो, कि तुम मफ़रूर3 हो,
हिम्मत ए  मरदां न आई, या कि तिफ़्ल ए ख़ाम4 हो.

हाँ यक़ीनन एक ही, लम्हे की यह तख़्लीक़5 है, 
वरना दुन्या यूं अधूरी, और तशना काम हो.

हम पशेमाँ हों कभी, न फ़ख्र के आलम में हों,
आलम ए मासूमियत हो बे ख़बर अंजाम हो.

अस्तबल में नींद की, मारी हैं "मुंकिर" करवटें,
औने पौने बेच दे घोडे को, ख़ाली दाम हो.

1 ईश वाणी 2 क़ैदी ३ फ़रार 4 बच्चा 5 रचना 

خارجی ہیں سب تماشے، ساقیہ اک جام ہو 
اپنی ہستی میں سمٹ جاؤں تو کچھ آرام ہو٠ 

،خود سری خود بینی خود داری، مجھے الہام ہے 
کیوں خدا سازوں کی محفل سے، میرا کچھ کا م ہو٠ 

،تم اسیرِ پیرِ مرشد ہو کہ تم مفرور ہو 
ہمّت مرداں نہ آئ، یا کہ طِفل خام ہو٠ 

،ہاں یقیناً ایک ہی لمحے کی یہ تخلیق ہے 
ورنہ دنیا یوں ادھوری، اور تشنہ کا م ہو٠ 

،ہم پشیماں ہوں کبھی، نہ فخر کے عالم میں ہوں 
عالمِ معصومیت ہو، بے خبرانجام ہو٠ 

،اصطبل میں نیند کی ماری ہیں منکر کروٹیں 
اَونے پَونے بیچ دے، گھوڑے کو خالی دام ہو٠ 

Wednesday, April 4, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 19




19

ग़ुस्ल व् वज़ू से, दाग़े अमल धो रहे हो तुम,
मज़हब की सूइयों से, रफ़ू हो रहे हो तुम.

हर दाना दाग़दार हुवा, देखो फ़स्ल का,
क्यूँ खेतियों में अपनी ख़ता, बो रहे हो तुम.

हथियार से हो लैस, हँसी तक नहीं नसीब,
ताक़त का बोझ लादे हुए, रो रहे हो तुम.

होना है वाक़ेआत ए मुसलसल वजूद का,
पूरे नहीं हुए हो, अभी हो रहे हो तुम.

इंसानी अज़मतों का, तुम्हारा ये सर भी है,
लिल्लाह पी न लेना, चरन धो रहे हो तुम.

"मुंकिर" को मिल रही है, ख़ुशी जो हक़ीर सी,
क्यूँ तुम को लग रहा है, कि कुछ खो रहे हो तुम.

*अजमतों=मर्याओं *लिल्लाह=शपत है ईश्वर की

، غُسل و وضو سے داغِ عمل دھو رہے ہو تم
مذہب کی سوئیوں سے رفو ہو رہے ہو تم٠ 

، ہر دانہ داغ دار ہوا، دیکھو فصل کا
کیوں
 کھیتیوں میں اپنی خطا بو رہے ہو تم٠ 

، ہتھیار سے ہو لیس، ہنسی بھی نہیں نصیب 
طاقت کا بوجھ لادے ہوئے، رو رہے ہو تم٠ 

، ہونا ہے واقعاتِ مسلسل وجود کا 
پورے نہیں ہوئے ہو، ابھی ہو رہے ہو تم٠ 

 ، انسانی عظمتوں کا، تمہارا یہ سر بھی ہے
لللہ پی نہ لینا، چرن دھو رہے ہو تم٠ 

، منکر کو مل رہی ہے، خوشی جو حقیر سی
 تم کویہ لگ رہا ہے، کہ کچھ کھو رہے ہو تم٠ 

Tuesday, April 3, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 18



18

महरूमियाँ सताएँ न, नींदों की रात हो,
दिन बन के बार गुज़रे न, ऐसी नजात हो.

हाथों की इन लकीरों पे, मत मारिए छड़ी,
उस्ताद मोहतरम, ज़रा शेफ्क़त का हाथ हो.

यह कशमकश सी क्यूं है, बग़ावत के साथ साथ,
पूरी तरह से देव से छूटो, तो बात हो.

कुछ तर्क गर करें तो सुकून व् क़रार है,
ख़ुद नापिए कि आप की, कैसी बिसात हो.

उंगली से छू रहे हैं, तसव्वर की माह व् रू,
मूसा की गुफ़्तुगु में, ख़ुदाया सबात4 हो.

इक गोली मौत की मिले 'मुंकिर' हलाल की,
गर रिज़्क1 का ज़रीया2 मदद हो, ज़कात3 हो.

१-भरण-पोषण २-साधन ३-दान 4 तत्व 

، محرومیاں ستائیں نہ، نیندوں کی رات ہو
دن بار بن کے گزرے نہ ایسی نجات ہو٠ 

، ہاتھوں کی ان لکیروں پہ، مت مارئے چھڑی 
استادِ محترم زرہ شفقت کا ہاتھ ہو٠ 

یہ کشمکش سی کیوں ہے، بغاوت کے ساتھ ساتھ؟ 
پوری طرح سے دیو سے چھوٹو تو بات ہو٠ 

، کچھ ترک گر کریں، تو سکون و قرار ہے 
خود ناپئے کہ آپ کی کیسی بساط ہو٠ 

، اُنگلی سے چھو رہے ہیں، تصوّر کی وہ پری 
.موسیٰ کی گُفتگو میں خدایا ثبات ہو. 

، اک گولی موت کی کما منکر حلال کی 
گر رزق کا زریعہ مدد ہو، زکات ہو٠ 

Monday, April 2, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 17




17

मख़लूक़ ए ज़माने1 की ज़रूरत को समझ ले,
बेहतर है इबादत से, तिजारत को समझ ले.

ऐ मर्द ए जवान साल, तू अब सीख ले उड़ना,
माँ-बाप की मजबूर किफ़ालतको समझ ले.

हुजरे3 में मसाजिद के, अज़ीज़ों को मत पढ़ा,
ग़िलमा के तलब गारों की, ख़सलत को समझ ले.

बारातों, ज़नाज़ों के लिए, चाहिए इक भीड़,
नादाँ तबअ उनकी, सियासत को समझ ले.

मनवा के "उसे" अपने को मनवाएगा वह शेख़,
यह दूर कि कौड़ी है, नज़ाक़त को समझ ले.

'मुंकिर' हो फ़िदा ताकि बक़ा6 हाथ हो तेरे,
मशरूत7 वजूदों की, शहादत को समझ ले.

१-जन साधारण २ -पालन-पोषण ३-कमरों 
४-सेवक बालक ५-सरल-स्वभाव ६-स्थायित्व ७- सशर्त

،مخلوقِ زمانہ کی، ضرورت کو سمجھ لے 
بہتر ہے تجارت کو، عبادت تو سمجھ لے٠ 

،اے مرد جواں سال، تو اب سیکھ لے اڑ نا
ماں باپ کی مجبور، کفالت کو سمجھ لے٠

،حجرے میں مساجد کے، عزیزوں کوپڑھا مت 
غلمہ کی طلب گاروں کی، خصلت کو سمجھ لے٠

،منوا کے 'اُسے'، اپنے کو منواے گا وہ شیخ
یہ دور کی کوڑی ہے، نزاقت کو سمجھ لے٠ 

،منکر ہو فنا، تاکہ بقا ہاتھ ہو تیرے
مشروط وجودوں کی شہادت کو سمجھ لے٠

Sunday, April 1, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 16




16

इस ज़मीं के वास्ते, मिल कर दुआ बन जाएँ हम,
रह गुज़र इंसानियत हो, क़ाफ़िला बन जाएँ हम.

क्यों किसी नाहक़ की, मरज़ी की रज़ा बन जाएँ हम, 
मुख़्तसर सी ज़िंदगी का, हादसा बन जाएँ हम.                                          

रद कर दो रहनुमाई की, ये नाहक़ रस्म को,
हो न क़ायद कोई अपना, क़ायदा बन जाएँ हम.

तुम ज़रा सी ज़िद को छोडो, हम ज़रा सी आन को.
क्या से क्या बन जाए ये घर, क्या से क्या बन जाएँ हम. 

अब महा भारत न उपजे, न फ़साद ए करबला,
शर के बुत को तोड़ कर, अमनी फ़िज़ा बन जाएँ हम. 

आख़िरी ज़ीने पे चढ़ कर, राज़ हस्ती का खुला,
इन्तेहा है क़र्ब मुंकिर, इब्तिदा बन जाएँ हम.

، اس زمیں کے واسطے مل کر دعا بن جائیں ہم
رہگزرانسانیت ہو، قافله بن جائیں ہم٠ 

، کیوں کسی نا حق کی مرضی کی رضا بن جائیں ہم
مختصر سی زندگی کا، حادثہ بن جائیں ہم٠

، رد کر دو رہنمائی کی، یہ ناقص رسم کو 
ہو نہ قاعد کوئی اپنا، قاعدہ بن جائیں ہم٠

، تم ذرہ سی ضد کو چھوڑو، ہم ذرہ سی آن کو 
کیا سے کیا ہو جاۓ یہ گھر، کیا سے کیا ہو جائیں ہم٠ 

، اب مہا بھارت نہ اُپجے، نہ فسادِ کربلہ 
شر کے بُت کو توڑ کر، امنی فضا بن جائیں ہم٠ 

، آخری زینے پہ چڑھ کر راز ہستی کا کھلا 
انتہا ہے قرب منکر، ابتدا بن جائیں ہم٠