Monday, March 19, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 4




4

पोथी समाए भेजे में, तब कुछ यक़ीं भी हो,
ऐ गूंगी कायनात ! ज़रा नुक़ता चीं भी हो.

खोदा है इल्मे नव ने, अक़ीदत के फ़र्श को,
अब अगले मोर्चे पे, वह अर्श ए बरीं2 भी हो.

साइंस दाँ हैं बानी, नए आसमान के,
पैग़म्बरों के पास ही, इन की ज़मीं भी हो.

ऐ इश्तेराक़3 ठहर भी, जागा है इन्फ़्राद4,
कहता है थोडी पूँजी, सभी की कहीं भी हो.

बारूद पर ज़मीन , हथेली पे आग है,
है अम्न का तक़ाज़ा, कि हाँ हो, नहीं भी हो.

'मुंकिर' भी चाहता है, सदाक़त5 पे हो फ़िदा,
इन्साफ़ व् आगाही6 को लिए, तेरा दीं7 भी हो.

२-सातवाँ आसमान ३-साम्यवाद ४-व्यक्तिवाद ५-सच्चाई ६न्याय एवं विज्ञप्ति ७-धर्म

،پوتھی سماۓ بھیجے میں، تب کچھ یقی بھی ہو 
ائے گونگی کائنات ! ذرا نقطہ چیں بھی ہو٠ 

،کھودا ہے علم نو نے، عقیدت کی قبر کو 
اب اگلے مورچہ پہ، یہ عرشِ بریں بھی ہو٠ 

،سائنس داں ہیں بانی، نئے آسمان کے 
پیغمبروں کے ساتھ ہی، انکی زمیں بھی ہو٠ 

،ائے اشتراق ٹھہر بھی ، جاگا ہے انفراد 
کہتا ہے تھوڑی پونجی، سبھی کی کہیں بھی ہو٠ 

،بارود پر زمیں ہے ، ہتھیلی پہ آگ ہے 
ہے امن کا تقاضہ کہ، ہاں بھی ، نہیں بھی ہو٠ 

،منکر بھی چاہتا ہے، صداقت پہ ہو فدا 
انصاف و آگہی کو لئے، تیرا دین بھی ہو٠ 

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 3




3

सब रवाँ मिर्रीख़ पर, और आप का यह दर्स ए दीन,
काफ़िरीन व् मुशरिकीन व् मुनकिरीन व् मोमनीन3.

रौशनी कुछ सर पे कर लो, ताकि परछाईं का क़द,
छोटा हो जाए, तुम्हें कुछ अपने क़द पर हो यक़ीन.

सीखते क्या हो, इबादत और शरीअत के उसूल,
है ख़ुदा तो चाहता होगा, क़तार ए ग़ाफ़िलीन.

तालिबाने अफ़ग़नी, और कार सेवक हैं अडे़,
वह बजाएं, अपनी ढपली, यह बजाएं अपनी बीन.

जाने कितने काम बाक़ी हैं, जहाँ में और भी,
थोड़ी सी फ़ुर्सत उसे, दे दे ख़याल ए  नाज़नीन.

साहबे ईमाँ! तुम्हारे हक़ में है 'मुंकिर' की राह,
सैकड़ों सालों से, ग़ालिब हैं, ये तुम पर फ़ासिक़ीन4

१-मंगल ग्रह पर २-धर्म-शास्त्र दर्शन ३-शास्त्र-शीर्षक ४-झूठे


،سب رواں مِرّیخ پر، اور آپ کا یہ درسِ دین، 
کافرین و مُشرکین و منکرین و مومنین٠ 

،روشنی کچھ سر پہ کر لو، تاکہ پرچھائیں کا قد 
چھوٹا ہو جاۓ، تمہیں کچھ اپنے قد پر ہو یقین٠ 

،سیکھتے کیا ہوعبادت اورشریعت کے اُصول 
.ہے خدا تو جاہتا ہوگا قطارِ غافلین 

,طالبانِ افغنی اور کار سیوک ہیں اڑے 
.یہ بجائیں اپنی ڈفلی، وہ بجائیں اپنی بین 

،جانے کتنے کام باقی ہیں، جہاں میں اور بھی 
.تھوڑی سی فرصت اسے دےدے ، خیالِ نازنین 

،صاحبِ ایماں تمہارے حق میں ہے منکر کی راہ 
سیکڑوں سالوں سے غالب ہیں یہ تم فاسقین٠

Saturday, March 17, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 2



शोर ए किब्रियाई1 है, और स्वर हरे ! हरे !!
बख़्श दे इन्हें ख़ुदा, ईशवर उन्हें तरे.

वह है सच जो तूर पर, माइले ए कलाम है?2
या कि उस पहाड़ पर, जो कि है जटा धरे??

आसमाँ पर वह उड़ा, आप का यक़ीं अरे?
कैसा आदमी था वह, अपनी ज़ात से परे?

क़ब्र को खिला रहे हो, तुम सवाब की ग़िज़ा,
तुम को क्या ज़मीन, पर कोई भूक से मरे.

यह ख़ुदा का घर नहीं है, तेरे घर में है ख़ुदा,
क्यूँ भटक रहा है तू, काबा काशी बाँवरे.

है ख़बर कि चल पड़े, दोनों तेरी राह पर,
ये ख़बर भी आएगी, दोनों फिर से लड़ मरे.

१-ईश वंदना का शोर २-अर्थात मूसा जो तूर पर्वत पर जाकर ईश्वर से बातें करते थेs

!شورِ کِبریائی ہے اور سوَر ہرے! ہرے 
اِنکو خدا نجات دے، اُنکو ا یشور ترے٠ 

وہ ہے سچ جوطور  پر مائلِ کلام ہے
یا کہ اُس پہاڑ پر جو کہ ہے جٹا دھرے٠ 

آسماں پہ وہ اُڑا ؟ آپ یقیں ارے!  
کیسا آدمی تھا وہ؟ اپنی ذات سے پرے٠ 

قبر کو کھلا رہے ہو تم، ثواب کی غذا 
تم کو کیا زمین پر، کوئی بھوک سے مرے٠ 

یہ خدا کا گھر نہیں ہے، تیرے گھر میں ہے خدا
کیوں بھٹک رہا تو، کعبہ کاشی بانورے

ہے خبر کہ چل پڑے، دونوں تیری راہ پر 
یہ خبربھی آیگی، باہمی وہ لڑ مرے٠ 

Friday, March 16, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 1




1

किताब सर से उतारा है, कहे देता हूँ,
हमारे सर में भी पारा है, कहे देता हूँ.

फ़क़त नहीं वह तुम्हारा है, कहे देता हूँ,
सभी का उस पे इजारा है, कहे देता हूँ.

सवाब पढ़ के पढ़ा के मिले, तो लअनत है,
सवाब जीना गवारा है, कहे देता हूँ.

हिफ्ज़ ए रूदाद ऐ हाफ़िज़ है तज़ीउल वक़ती,
यह सर का भारी ख़सारा1 है, कहे देता हूँ.

दिमाग़ माने, कोई धर्म या कोई मज़हब,
लहू में पुरखों की धारा है, कहे देता हूँ.

यही इनकार तो 'मुंकिर'की जमा पूँजी है,
इसी ने उसको संवारा है, कहे देता हूँ.

हिफ्ज़ ए रूदाद =दास्तान कंठस्त , तज़ीउल वक़ती=समय की बर्बादी १-हानि 

کتاب سر سے اُتارا ہے، کہے دیتا ہوں، 
ہمارے سر میں بھی، پارہ ہے کہے دیتا ہوں. 

فقط نہیں وہ تمہارا ہے کہے دیتا ہوں، 
سبھی کا اُس پہ اِجارہ ہے کہے دیتا ہوں. 

ثواب پڑھ کے پڑھا کے ملے تو لعنت ہے، 
ثواب جینا گوارہ ہے کہے دیتا ہوں. 

حفظِ روداد ائےحافظ! ہےتضیع الوقتی، 
یہ سر کا بھاری خسارہ ہے کہے دیتا ہوں. 

دماغ مانگے کوئی دھرم، یا کوئی مذہب، 
لہو میں پُرکھوں کی دھارا ہے کہے دیتا ہوں. 

یہی انکار تو منکر کی جمع پونجی ہے، 
اِسی نے اُسکو سنوارا ہے کہے دیتا ہوں٠

जुंबिशें - - - तमहीद




मअज़रत

मेरे यारो ! न गर बुरा मानो,
देर तक मेरे पास मत बैठो,
मेरी दुल्हन उदास होती है,
तनहा पाकर ही पास होती है. 

मेरी दुल्हन है मेरी तन्हाई,
लेके आती है ऐसी अंगड़ाई,
कायनातों का राज़ देती है,
शेर माँगूं बयाज़2 देती है. 
१ क्षमा याचना २ कविता-पोथी 

معذرت

میرے یارو نہ گر بُرا مانو، 
دیر تک میرے پاس مت بیٹھو، 
میری دُ لہن اُداس ہوتی ہے، 
تنہا پا کر ہی پاس ہوتی ہے.
میری دُلہن ہے میری تنہائی، 
لے کے آتی ہے ایسی انگڑائی، 
کائناتوں کا راز دیتی ہے، 
شعر مانگوں، بیاض دیتی ہے٠

जुंबिशें - - - तअर्रुफ़






हिन्दू के लिए मैं इक, मुस्लिम ही हूँ आख़िर,
मुस्लिम ये समझते हैं, गुमराह है काफ़िर,
इंसान भी होते हैं, कुछ लोग जहाँ में,
गफ़लत में हैं ये दोनों, समझाएगा 'मुंकिर'.  



ہندو کے لئے میں اک مسلم ہی ہوں آخر، 
مسلم یہ سمجھتے ہیں، گمراہ ہے کافر،
انسان بھی ہوتے ہیں کچھ لوگ جہاں میں،
غفلت میں ہیں یہ دونوں، سمجھاۓ گا 'منکر'٠ 

Saturday, March 3, 2018

जुंबिशें - - - सलाम उन पर



सलाम उन पर - - -

अपनी माँ सुग़रा बेगम पर सलाम, जिनको कि उनके बच्चे बीबी कहते थे.
बहुत धुंधली सी सूरत उनकी मेरे ज़ेहन में बसी है.
मैं पांच छः साल का था कि वह चल बसीं.
अपनी प्यारी नानी पर सलाम जिनका ज़िक्र मैं पहले कर चुका हूँ,
जिनका रंग रूप और रूह मेरे वजूद में बसा हुवा है.
नानी के भाई नाना निसार ख़ान पर सलाम जिनकी तक़रीरों से मेरी मालूमात की बुन्यादें पड़ीं.
भाई मुहम्मद अजमल ख़ान पर सलाम जिनकी खट्टी मीठी यादगारें मेरे ज़ेहन पर नक्श हैं.
मामा मुंशी आफ़ाक़ पर सलाम जो मेरे उस्ताद भी थे.
स्वर्गीय राम आश्रय मिश्र पर सलाम जो सर्वोदय विद्या पीठ इंटर कालेज सलोन के प्रिंसपल थे, (साहब) मेरे आदर्श रहे, मैं उनका प्रिय था.
अपने बचपन के दोस्तों, फुससन, रज़ी, अतहर, सामिन को सलाम भेजता हूँ जो आज भी मुझे माज़ी की वादियों में पहुंचा देते हैं.
मेरे चतीते नफ़ीस और मुबीब भाई को सलाम 
और मेरे रहबर दोस्त शरीफ़ भाई (जिन्होंने ने मुझे दहरियत के ख़ला में ढकेल कर ख़ुद कनारे खड़े हो गए.) पर  सलाम. 
अतीक़ बरकाती को सलाम जो लोगों के काम आते रहते हैं और लोग उनके.
मास्टर शहिद को सलाम जो बहर हाल मुझे अज़ीज़ हैं.
जनाब फ़ारूक़ अहमद जायसी को ख़ुसूसी सलाम जिन्हों ने मेरी शायरी के मुंह पर अरूज़ी लगाम लगा दिया.
आख़ीर में उन सभी परियों को सलाम जिनसे कभी मेरा साहब सलाम हुवा करता था.
सलाम के बाद उन मासूमों को दुआएं जो मेरा मुस्तकबिल हैं.
डा. आसिया चौधरी अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर की हैसियत से नस्लों को इल्म  बाट रही है,
कहते हैं हर मर्द की कामयाबी में किसी औरत का हाथ होता है,
मगर आसिया की कामयाबी में उसके मर्द शिक़वत अली "ग़यास" का हाथ है. दोनों को दुआओं के साथ साथ उनके बच्चों अशअर और सारिया को दुआएं.
दुआएँ मेरी छोटी बेटी फ़रह ख़ान को, जो अपने शौहर कर्नल अशरफ़ ख़ान, अपने बेटी अनमोल और बेटे अरमान के साथ मुमबासा में क़याम  करती है .
अनमोल नें मेरे ख़्वाबों को साकार किया है,
मास्को में स्पेस साइंस (अंतरिक्ष विज्ञान) में तालीम हासिल कर रही है.
बड़ा बेटा फ़ैज़ी चौधरी अपने परिवार के साथ UK जा बसा. ज़ायान और सारा हमारे पोते और पोती को दुआएँ.
आख़ीर में दुआएं अपने छोटे बेटे मंज़र चौधरी (बाबर) को
जो बैंगलुरू में अपने परिवार अतिया दो बच्चे ज़ारा और जिबरान के साथ करता है.   

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