Friday, April 15, 2016

Junbishen 777



ग़ज़ल

आप वअदों की हरारत को, कहाँ जानते हैं.
हम जो रखते हैं, वह पत्थर की ज़ुबाँ जानते हैं.

पुरसाँ हालों को, बताते हुए मेरी हालत,
मुस्कुराते हैं, मेरा दर्दे निहाँ निहाँ जानते हैं.

क़ौम को थोडी ज़रुरत है, मसीहाई की,
आप तो बस की फ़ने तीर ओ कमाँ जानते हैं.

नंगे सर, नंगे बदन, उनको चले आने दो,
वोह अभी जीने के, आदाब कहाँ जानते हैं.

नहीं मअलूम किसी को, कि कहाँ है लादेन,
सब को मअलूम है कि अल्लाह मियाँ जानते हैं.

न तवानी की अज़ीयत में पड़े हैं 'मुंकिर',
है बहारों का ये अंजाम,खिज़ां जानते हैं.

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*मसीहाई=मसीहाई*न तवानी=दुर्बलता* अज़ीयत=कष्ट


غزل

آپ وعدوں کی حرارت کو کہاں جانتے ہیں
ہم جو رکھتے ہیں ، وہ پتھر کی زبان جانتے ہیں ٠ 

پرساں حالوں کو بتاتے ہوئے ، میری حالت 
مسکراتے ہیں ، مرا درد نہاں جانتے ہیں ٠ 

قوم کو تھوڑی، ضرورت ہے مسیحائی کی 
آپ تو بس کہ ، فن تیر و کماں ، جانتے ہیں ٠

ننگے سر ، ننگے بدن ، انکو چلے آنے دو
وہ ابھی رہنے کے آداب ، جانتے ہیں ٠

نہیں معلوم کسی کو کہ کہاں ہے لادین 
سب کو معلوم ہے کہ الله میاں ، جانتے ہیں ٠

ناتوانی کی اذیت میں، پڑے ہیں منکر
ہے بہاروں کا یہ انجام خزاں ، جانتے ہیں ٠٠ 

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Wednesday, April 13, 2016

Junbishen 776


ग़ज़ल

चाहत है तेरी, और तेरा इंतेख़ाब है,
क्या दोस्त तेरा, तेरी तरह लाजवाब है?

सो लेना चाहिए, तुझे कुछ देर के लिए,
नींद की हालत में, यह बेजा खिताब1 है।

है एक ही नुमायाँ, वहाँ चाँद की तरह,
बाक़ी हसीन चेहरों के, रुख पे नकाब है।

शायर है बेअमल, कि इसे बा अमल करो,
चक्खी नहीं कभी, मगर मौज़ूअ शराब है।

क़ानून क़ाएदों के, उसूलों की नींद में ,
उस घर में घुस गया, जहाँ जीना सवाब है।

रोका नहीं है भीड़ ने, टोका है, रुका हूँ,
'मुंकिर' को रोक ले, ये भला किस में ताब है।

१ -संबोधन

غزل
چاہت ہے تیری اور ترا انتخاب ہے
کیا دوست تیرا ، تیری طرح لا جواب ہے٠ 

سو لینا چاہئے تمہیں ، کچھ دیر کے لئے 
حالت غنودگی کی ہے ، بے جھ خطاب ہے ٠ 

ہے ایک ہی نمایاں وہاں چاند کی طرح 
باقی حسین تاروں کے رخ پر نقاب ہے ٠ 

شاعر ہے بے عمل، کہ اسے با عمل کرو 
چکھی نہیں شراب کو ، موضوع شراب ہے ٠ 

قانون قاعدوں کے ، اصولوں کی نیند میں 
اس گھر میں گھس گیا ، جہاں جینا ثواب ہے ٠ 

روکا نہیں ہے بھیڑ نے ٹوکا ہے ، رک گیا 
منکر کو روک لے ، بھلا یہ کس میں تاب ہے ٠  

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Monday, April 11, 2016

Junbishen 775



ग़ज़ल

सुब्ह फिर शुरू हुई है, आँखें फिर हुई न हैं नम,
चल गरानी ए तबअ, सर पे रख के अपने ग़म.

नेमतें हज़ार थीं, इक ख़ुलूस ही न था,
तशना रूह हो गई, भर गया था जब शिकम.

बे यक़ीन लोग हैं, उन सितारों की तरह,
टिमटिमा रहे हैं कुछ, और दिख रहे है कम.

उँगलियाँ थमा दिया था, मैं ने उस कमीन को,
कर के मुझको सीढयाँ, सर पे रख दिया क़दम.

कहर न गज़ब है वह, फ़ितरी वाक़ेआत हैं,
तुम मुक़ाबला करो, वोह है माइले सितम.

राज़दार हो चुका है, कायनात का जुनैद,
जुज़्व बे बिसात था, कुल में हो गया है ज़म.

*****

غزل

صبح پھر شروع ہوئی ،آنکھیں پھر ہوئیں ہیں نم
چل گرانی ے حیات ، سر پہ رکھ کے اپنے غم ٠ 

نعمتیں ہزار تھیں ، اک خلوص ہی نہ تھا 
تشنہ روح رہ گئی تھی ، بھر گیا تھا جب شکم ٠ 

بے یقین لوگ ہیں ، ان ستاروں کی طرح 
ٹمٹما رہے ہیں کچھ ، اور دکھ رہے ہیں کم ٠ 

انگلیاں تھما یں تھی ، میں نے اس کمین کو 
کر کے ہم کو سیڑھیاں ، سر پہ رکھ کے دیا قدم ٠ 

قہر نہ غضب ہیں وہ ، فطری واقعات ہیں 
تم مقابلہ کرو ، وہ ہے مائل ستم ٠ 

رازدار ہو گیا ہے ، کائنات کا جنید 
جزو بے بساط ہے ، کل میں ہو گیا ہے ضم ٠ 
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Friday, April 8, 2016

JUNBISHEN 774


ग़ज़ल

हर शब की क़ब्रगाह से, उठ कर जिया करो,
दिन भर की ज़िन्दगी में, नई मय पिया करो।

उस भटकी आत्मा से, चलो कुछ पता करो,
इस बार आइना में बसे, इल्तेजा करो।

दिल पर बने हैं बोझ, दो मेहमान लड़े हुए,
लालच के संग क़ेनाअत1, इक को दफ़ा करो।

तुम को नजात देदें, शबो-रोज़ के ये दुःख,
ख़ुद से ज़रा सा दूर, जो फ़ाज़िल गिज़ा करो।

दरवाज़ा खटखटाओ, है गर्क़े-मुराक़्बा2,
आई नई सदी है, ज़रा इत्तेला करो।

'मुंकिर' को क़त्ल कर दो, है फ़रमाने-किब्रिया3 ,
आओ कि हक़ शिनास को, मिल कर ज़िबा करो।

१-संतोष २-तपस्या रत ३-ईश्वरीय आगयान


غزل

ہر شب کی قبر گاہ سے، اٹھ کر جیا کرو 
دن بھر کی زندگی میں، نی مے پیا کرو٠ 

اس بھٹکی آتما سے چلو کچھ پتہ کریں
اس بار آئینہ میں بسے، التجھ کرو ٠ 

دل پر بنے ہیں بوجھ ، دو مہماں لڑے ہوے، 
لالچ بھی ہے ، نجات بھی ، اک کو جدا کرو ٠ 

تم کو نجات دینگے ، شب و روز کے یہ دکھ 
خود سے ذرہ سا دور، جو فاضل غذا کرو ٠ 

دروازہ کھٹ کھٹا ؤ ، ہے غرق مراقبہ 
ائی نی صدی ہے ، اسے اطلا ع کرو٠ 

منکر کو قتل کر دو، ہے فرمان کبریا 
 کہ حق شناش کو، مل کر ذبح کرو
 ٠ 

Wednesday, April 6, 2016

Junbishen 773




ग़ज़ल

तुम भी अवाम की, ही तरह डगमडा गए,
मेरे यकीं के शीशे पे, पत्थर चला गए.

घायल अमल हैं, और नज़रिया लहू लुहान,
तलवार तुम दलील की, ऐसी चला गए.

मफरूज़ा हादसात, तसुव्वुर में थे मेरे,
तुम कार साज़ बन के, हक़ीक़त में आ गए.

पोशीदा एक डर था, मेरे ला शऊर में,
माहिर हो नफ़्सियात के, चाक़ू थमा गए.

भेड़ों के साथ साथ, रवाँ आप थे जनाब,
उन के ही साथ गिन जो दिया, तिलमिला गए.

खुद एतमादी मेरी, खुदा को बुरी लगी,
सौ कोडे आ के उसके सिपाही लगा गए.
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*मफरूज़ा=कल्पित *कार साज़=सहायक *ला शऊर=अचेतन मन *नफ़्सियात=मनो विज्ञानं *खुद एतमादी=आत्म विश्वास

غزل
تم بھی عوام کی طرح ہی ، ڈگمگا گئے
میرے یقیں کے شیشے پہ ، پتھر چلا گئے ٠ 

گھایل عمل ہیں اور نظریہ لہو لہان 
تلوار تم دلیل کی، ایسی چلا گئے ٠ 

مفروضہ حادثات، تخیّل میں تھے مرے 
تم چارہ ساز بن کے، حقیقت میں آ گئے ٠ 

پوشیدہ ایک ڈر تھا مرے لا شعور میں 
ماہر تھے نفسیات کے ، چاقو تھما گئے ٠ 

خود عتماد ی میری خدا کو بری لگی 
سو کورے آ کے ، اسکے سپاہی لگا گئے ٠

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Monday, April 4, 2016

Junbishen 772



ग़ज़ल

तरस न खाओ, मुझे प्यार कि ज़रुरत है,
मुशीर कार नहीं यार कि ज़रुरत है.

तुम्हारे माथे पे उभरे हैं, सींग के आसार,
तुम्हें तो फ़तह नहीं हार की ज़रुरत है.

कलम की निब ने, कुरेदा है ला शऊर तेरा,
जवाब में कहाँ, तलवार की ज़रुरत है.

अदावतों को भुलाना भी, कोई मुश्क़िल है,
दुआ, सलाम, नमस्कार की ज़रुरत है.

शुमार शेरों का होता है, न कि भेड़ों का,
कसीर कौमों, बहुत धार की ज़रुरत है.

तुम्हारे सीनों में आबाद इन किताबों को,
बस एक 'मुंकिर' ओ इंकार कि ज़रुरत है.
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*मुशीर कार = परामर्श दाता *ला शऊर =अचेतन मन


غزل

ترس نہ کھاؤ مجھے پیار کی ضرورت ہے 
مشیر کار نہیں یار کی ضرورت ہے ٠ 

تمہارے ماتھے پہ ابھرے ہیں سینگ کے آثار
تمہیں تو فتح نہیں ، ہار کی ضرورت ہے ٠

قلم کے نب نے کریدا ہے لا شعور ترا 
جواب میں کہاں ، تلوار کی ضرورت ہے ٠

عداوتوں کو بھلانا بھی کوئی مشکل ہے 
دعا ، سلام ، نمسکار، کی ضرورت ہے ٠

شمار شیر کا ہوتا ہے ، نہ کہ بھیڑوں کا، 
کثیر قوم ، بہت دھار کی ضرورت ہے ٠

تمہارے سینے میں آباد ان کتابوں کو 
بس ایک منکر و انکار کی ضرورت ہے ٠٠ 
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Friday, April 1, 2016

Junbishen 771



ग़ज़ल

मोहलिक तरीन रिश्ते, निभाए हुए थे हम,
बारे गराँ को सर पे, उठाए हुए थे हम.

खामोश थी ज़ुबान, कि  अल्फ़ाज़  ख़त्म थे,
लाखों गुबार दिल में दबाए हुए थे हम.

ठगता था हम को इश्क, ठगाता था खुद को इश्क,
कैसा था एतदाल, कि पाए हुए थे हम.

गहराइयों में हुस्न के, कुछ और ही मिला,
न हक़ वफ़ा को मौज़ू ,बनाए हुए थे हम.

उसको भगा दिया कि वोह, कच्चा था कान का,
नाकों चने चबा के, अघाए हुए थे हम.

सब से मिलन का दिन था, बिछड़ने की थी घडी,
'मुंकिर' थी क़ब्रगाह, कि  छाए हुए थे हम,
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*मोहलिक तरीन =हानि कारक *बारे गराँ=भारी बोझ *एतदाल=संतुलन *मौज़ू=विषय.



غزل

محلق ترین رشتے، نبھاۓ ہوئے تھے ہم، 
بار گراں کو سر پہ، اٹھاۓ ہوئے تھے ہم ٠ 

خاموش تھی زبان، کہ الفاظ ختم تھے 
لاکھوں غبار دل میں، دباے ہوئے تھے ہم ٠ 

ٹھگتا تھا عشق اور ٹھگاتا تھا خود کو عش
 کیسا تھا عتدال، کہ پاۓ ہوئے تھے ہم ٠ 

گہرایوں میں عشق کے، کچھ اور ہی ملا
نا حق وفا کو رکن، بناے ہوئے تھے ہم ٠ 

اسکو بھگا دیا، کہ وہ کچا تھا کان کا
ناکوں چنے چبا کے، اگھاۓ ہوئے تھے ہم ٠ 

سب سے ملن کا دن ہے ، بچھاڑ نے کا دن بھی ہے، 
منکر تھی قبر گاہ، کہ چھاۓ ہوئے تھے ہم ٠ ٠ 

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