Monday, August 18, 2014

Junbishen 227


गज़ल

बडी कोताहियाँ जी लीं, बड़ी आसानियाँ जी लीं,
कि अब जीना है फ़ितरत को, बहुत नादानियाँ जी लीं.


तलाशे हक़ में रह कर, अपनी हस्ती में न कुछ पाया,
कि आ अब अंजुमन आरा!, बहुत तन्हाईयाँ जी लीं.

जवानी ख्वाब में बीती, ज़ईफ़ी सर पे आ बैठी,
हक़ीक़त कुछ नहीं यारो, कि बस परछाइयाँ जी लीं.

मेरी हर साँस, मेरे हाफ्ज़े से, मुन्क़ते कर दो,
कि बस उतनी ही रहने दो, कि जो रानाइयाँ जी लीं.

जो घर में प्यार के काबिल नहीं, तो दर गुज़र घर हो,
बहुत ही सर कशी झेलीं, बहुत ही ख़ामियाँ जी लीं.

तआकुब क्या, तजाऊज़, कुछ ख़ताएँ कर रहीं 'मुंकिर',
इन्हें रोको कि कफ़्फ़ारे  की, हमने सख्तियाँ जी लीं.
*****
*फितरत=प्रक्रिति *हक=खुदा * हाफ्ज़े=स्मरण *मुन्क़ते=विच्छिन *तआकुब=पीछा करना *तजाऊज़=उल्लंघन *कफ्फारे=प्राश्यचित

Saturday, August 16, 2014

Junbishen 226


गीत 
ख़लील जिब्रान के नाम 

बहुत थके ऐ हमराही हम , आओ थोड़ा जी जाएँ ,
मैं भी प्यासा , तुम भी प्यासे , इक दूजे को पी जाएँ .

अरमानो के बीज दबे हैं , बर्फ़ीली चट्टानों में ,
बरखा रानी हिम पिघला , अंकुर फूटें , हम लहराएँ .

कुछ न बोलें , मुँह न खोलें , शब्दों के परछाईं तले ,
चारों नयनों के दर्पन को , सारी छवि दे दी जाएँ .

तेरे तन की झीनी चादर , मेरे देह की तंग क़बा ,
आओ दोनों परिधानों को, उतन पुतन के सी जाएँ .

सूरज के किरनों से बंचित , नर्म हवाओं से महरूम ,
काया क़ैदी कपड़ों की है ,आओ बग़ावत की जाएँ .

Thursday, August 14, 2014

Junbishen 225


नज़्म 
कुदरत की चोलियाँ

विज्ञान के विरुद्ध, हैं पुजारी की बोलियाँ,
जो भर रहा है, दान के टुकड़ों से झोलियाँ,
जो बेचता है,जनता को धर्माथ गोलियाँ ,
छूती हैं जिनके पाँव को, निंद्रा में टोलियाँ,
जो मठ में दासियों की, उतारे हैं डोलियाँ,
हर रात है दीवाली, जिनकी रोज़ होलियाँ।

विज्ञान है मनुष्य के लक्छों में अग्रसर ,
वैज्ञानिकों को अपनी, कहाँ है कोई ख़बर,
जन्नत की आरजू है, न दोज़ख का कोई डर,
हुज्जत से, नफ़रतों से, सियासत से ख़ाली सर,
ईजाद कुछ नया हो, हैं इनकी ठिठोलियाँ,
क़ुदरत की खोलते हैं, नई रोज़ चोलियाँ।

Monday, August 11, 2014

Junbishen 224



पाकर आपस में लड़े, दीन धरम का ज्ञान ,
इनमें कितना मेल था , जब थे अज्ञान .
दोहे


चला अरब से क़ाफ़िला , न पहुँचा जापान ,
भारत में फंस सा गया , इस्लामी अभियान .


पानी की कल कल सुने, सुन ले राग बयार।
ईश्वर वाणी है यही, अल्ला की गुफ्तार॥


उनका अल्ला एक है , उसके नबी रसूल ,
पुख्ता ये ईमान है , ढीली हैं सब चूल .


सर पे सूरज है खड़ा , अल्ला रख्खा जाग ,
मज़हब ही रुसवाई से,भाग सके तो भाग .
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Friday, August 8, 2014

Junbishen 223



मुस्कुराहटें 
सलोनी ग़ज़ल 
(मादरी ज़बान में)

आंधी पानी आवत है , चिड़िया ढोल बजावत है .
बदरी छपरा छावत है , सूरज आँख चुरावत है .
मछरी ताल मां नाचत है , मेढक सुर मां गावत है .
पागल मेघा गर्जत है , मस्त बयरया धावत है .
गोरी तन का सीचत है, छोरा नयन सुखावत है .

जी मां कितनी रहत है, बरषा रूप रिझावत है .
दूर खड़ी भरमावत है , दुविधा मोर बगावत है .
कैसी अद्भुत चाहत है , यह सावन की दावत है .
भावत  है सो भावत है , मुंकिर क़दम बढ़ावत है .

Monday, August 4, 2014

Junbishen 222


रूबाइयाँ 

कब तक ते रवादारियाँ जायज़ होंगी,
औरत की ये कुरबानियाँ जायज़ होंगी,
हर रोज़ तलाक़ और हल्लाला ओ निकाह?
कब तक ये कलाकारयाँ जायज़ होंगी,


शैतान को भड़काते, किसी ने देखा?
आवाज़ सुनी उसकी, किसी नें समझा?
आओ मैं दिखता हूँ अगर चाहो तो,
तबलीग के परदे में छिपा है बैठा.


ईसाई गनीमत हैं, बदल जाते हैं,
हालात के साँचे में ही ढल जाते हैं,
फ़ितरत के हुए कायल, साइंस शुआर,
मजलिस की जिहालत से निकल जाते हैं.

Friday, August 1, 2014

Junbishen 221



गज़ल

तारीकियों से पहले, सरे शाम चाहिए,
हर सुब्ह आगही से भरा, जाम चाहिए।

अब जशने हुर्रियत को फ़रामोश भी करो,
आजादी ऐ मुआश3 का पैग़ाम चाहिए।

आरी हथौडा छोड़ के, चाक़ू उठा लिया,
मेहनत कशों के हाथों को, कुछ काम चाहिए।

मैं भी दबाए बैठा था, मुद्दत से उसके ऐब,
उस को भी एक ज़िद थी, कि इलज़ाम चाहिये।

कानो में रूई डाल के, बैठा है वह अमीन,
कुछ शोर चाहिए, ज़रा कोहराम चाहिए।

जद्दो जेहाद में, जाने जवानी कहाँ गई,
"मुंकिर" को बाक़ियात में आराम चाहिए।

१- अधकार २ -स्वतंत्रता दिवस ३-जीविका