Tuesday, May 14, 2013

Junbishen 16


ग़ज़ल 


हैं मसअले ज़मीनी, हलहाए आसमानी,
नीचे से बेखबर है, ऊपर की लन तरानी।

फ़रमान सीधे सादे, पुर पेच तर्जुमानी,
उफ़! कूवाते समाअत* उफ़! हद्दे बे जुबानी।

ना जेबा तसल्लुत1 है, बेजा यकीं दहानी2,
ख़ुद बन गई है दुन्या, या कोई इसका बानी।

मैं सच को ढो रहा था, तुम कब्र खोदते थे,
आख़िर ज़मीं ने उगले, सच्चाइयों के मानी।

कर लूँ शिकार तेरा, या तू मुझे करेगा,
बन जा तू ईं जहानी3, या बन जा आँ जहानी4

ईमान ऐ अस्ल शायद, तस्लीम का चुका है,
वह आग आग हस्ती, "मुंकिर" है पानी पानी।

* श्रवण-शक्ति १-लदान २-विशवास दिलाना ३-इस जहान के ४-उस जहान के

Sunday, May 12, 2013

Junbishen 15


नज़्म 

ग्यारहवीं  सदी की आहें


हमारे घर में घुसे, बस कि धड़धदाए हुए ,
वो डाकू कौन थे? इन वादियों में आए हुए ।

यक़ीन ओ खौफ़,सज़ा और तमअ1की तलवारें ,
अजीब रब था कोई, उनको था थमाए हुए ।

खुदाए सानी2 बने हुक्मरां,वज़ीर ओ सिपाह ,
सितम के तेग़ थे, हर शख्स में चुभाए हुए ।

जेहाद उनकी बज़िद थी, लडो या जज़या  दो ,
नहीं तो ज़ेहनी गुलामी, को थे जताए हुए ।

दलाल उसके, रिया कारियों3 का दीन लिए ,
दूकाने अपनी थे, हर कूंचे में सजाए हुए ।

दोबारा रोपे गए हैं, वह शजर4 हैं 'मुंकिर',
महद5 से माँ के हैं, ज़ालिम उसे उठाए हुए ।

१-लालच २-द्वतीय ईश्वर ३-ढोंगी ४-पेड़ ५-पालना

Saturday, May 11, 2013

Junbishen 14


क़फ़्से इन्कलाब1

हद बंदियों में करके, आज़ाद कर गए,
दी है नजात या फिर, बेदाद कर गए।

अरबो-अजम,हरब के, दर्जाते-इम्तियाज़4,
अपनों को दूसरों पर, आबाद कर गए।

जिस्मो, दिलों,दिमागों पर, हुक्मरान हैं वह,
बे बालो पर हमें यूँ ,सय्याद कर गए।

ज़ेहनो में भर दिया है, इक आख़िरी निज़ाम ,
हर नक्श इर्तेक़ा को, बरबाद कर गए।

इंसान चाहता है,  बेख़ौफ़ ज़िन्दगी,
वह सहमी सी, ससी सी, इरशाद कर गए।

इक्कीसवीं सदी में, आया है होश 'मुंकिर',
उनके सभी सितम को, फिर याद कर गए।

१-इन्कलाब का पिंजडा २-जुल्म ३-मुल्कों की इस्लामी श्रेणी ४पदोन का अन्तर
५-आखेटक ६- व्यवस्था ७-रचनात्मक चिन्ह ८-फरमान

Wednesday, May 8, 2013

Junbishen 1 3


दोहे 

जिनके पंडित मोलवी  घृणा पाठ पढ़ाएँ ,
दीन धरम को छोड़ के , वह मानवता अपनाएं .
*
क़ुदरत ही है आइना, प्रकृति ही है माप,
तू भी उसका अंश है, तू भी उसकी नाप।
*
बा-मज़हब मुस्लिम रहे, हिदू रहे सधर्म,
अवसर दंगा का मिला, हत्या इन का धर्म।
*
गति से दुरगत होत है, गति से गत भर मान,
गति की लागत कुछ नहीं, गति के मूल महान।
*
काहे हंगामा करे, रोए ज़ारो-क़तार,
आंसू के दो बूँद बहुत हैं, पलक भिगोले यार।

Tuesday, May 7, 2013

Junbishen 12


मुस्कुराहटें 

बैटिंग---

क्या बात है, अकेले ही 'मुंकिर' खड़े हो तुम?
लगता है इस समाज से कस के लड़े हो तुम।

तफसीर1,तर्जुमा2 कि हो तारीख, चट चुके,
जितने ज़मीं से निकले हो उतने गडे हो तुम।

इब्लीस3 की तरह ही, खुदी के नशे में हो,
आदम की वल्दियत है, ये किस पे पड़े हो तुम?

मज़हब हैं ग्यारह, बारह किसी पर तो पसीजो,
दिल नर्म है, दिमाग़ से कितने कड़े हो तुम।

कैच- - -
लोगो ये कायनात4 तगय्युर पजीर5 है,
सदियों पुरानी रस्मे-कुहन6 पर अडे हो तुम।

ख़ुद अपनी रहनुमाई के काबिल नहीं हुए?
कब तक रहोगे गोद में। जल्दी बड़े हो तुम।

१-ब्याख्या २-अनुवाद ३-बड़ा शैतान ४-ब्रम्हांड ५-परिवर्तन शील ६-पुराणी रस्में

Sunday, May 5, 2013

Junbishen 11



ग़ज़ल 

तालीम नई जेहल1 मिटाने पे तुली है,
रूहानी वबा है, कि लुभाने पे तुली है।

बेदार शरीअत3 की ज़रूरत है ज़मीं को,
अफ्लाफ़4 की लोरी ये सुलाने पे तुली है।

जो तोड़ सकेगा, वो बनाएगा नया घर,
तरकीबे रफ़ू, उम्र बिताने पे तुली है।

किस शिद्दते जदीद की, दुन्या है उनके सर
बस ज़िन्दगी का जश्न, मनाने पे तुली है।

मैं इल्म की दौलत को, जुटाने पे तुला हूँ,
कीमत को मेरी भीड़, घटाने पे तुली है।

'मुंकिर' की तराजू पे, अनल हक5 की  धरा6 है,
"जुंबिश" है कि तस्बीह के दानों पे तुली है।

१-अंध विशवास २-आध्यात्मिक रोग ३-बेदार शरीअत=जगी हुई नियमावली ४-आकाश ५- मैं ख़ुदा हूँ 6- वह वजन जो तराजू का पासंग ठीक करता है

Thursday, May 2, 2013

Junbishen 10


ग़ज़ल 

पोथी समाए भेजे में, तब कुछ यकीं भी हो,

ऐ गूंगी कायनात! ज़रा नुक़ता चीं भी हो।


खोदा है इल्मे नव ने, अक़ीदत के फर्श को,

अब अगले मोर्चे पे, वह अर्शे बरीं2 भी हो।


साइंस दाँ हैं बानी, नए आसमान के,

पैग़म्बरों के पास ही, इन की ज़मी भी हो।


ऐ इश्तेराक़3 ठहर भी, जागा है इन्फ़्राद4,

कहता है थोडी पूँजी, सभी की कहीं भी हो।


बारूद पर ज़मीन , हथेली पे आग है,

है अम्न का तक़ाज़ा, कि हाँ हो, नहीं भी हो।'


'मुंकिर' भी चाहता है, सदाक़त5 पे हो फ़िदा,

इन्साफ़ो आगाही6 को लिए, तेरा दीं7 भी हो।

२-सातवाँ आसमान ३-साम्यवाद ४-व्यक्तिवाद ५-सच्चाई ६न्याय एवं विज्ञप्ति ७-धर्म