Thursday, July 4, 2019

जुंबिशें मुस्कुराहटें


मुस्कुराहटें
मुहाविरों के बोल 

कुछ पाना, कुछ खोते रहना ,
तुम बस, रोते धोते रहना .

फूल की सेजें खोते रहना , 
राह में कांटे बोते रहना .

जो बोले दरवाज़ा खोले ,
जागे हो तो सोते रहना .

नौ मन तेल पे राधा नाचे ,
तेली बैल को जोते रहना .

आँख के अंधे नाम नयन सुख ,
सूरदास सब टोते रहना .

धोबी के कुत्ते मत बनना ,
घर के घाट के होते रहना .

भैंस है उसकी जिसकी लाठी ,
पाप की गठरी ढोते रहना .

नाच न आवे आँगन टेढ़ा , 
पीर की तीर चुभोते रहना .

भाग की रोटी जुरवा खाए ,
मुंकिर रूप को रोते रहना .

محاوروں کے فائدے 

جو کچھ پانا کھوتے رہنا ، بس تم روتے دھوتے رہنا 
جو بولے دروازہ کھولے ، جاگے ہو تو سوتے رہنا ٠ 
نو من تیل پہ رادھا ناچے ، تیلی بیل کو جوتے رہنا ٠ 
آنکھ کے اندھے نام نین سکھ ، سور دا س سب ٹوٹے رہنا ٠ 
دھوبی کے کتے مت بنا ، گھر کے گھا ٹ کے ہوتے رہنا ٠ 
بھینس ہے اسکی جسکی لاٹھی ، پا پ کی گٹھری ڈ ھوتے رہنا ٠ 
ناچ نہ آوے آنگن ٹیڑھا ، تعان کے بان چبھوتے رہنا ٠ 
آگے نکلوگے سب کے تم ، را ہ میں کانٹے بوتے رہنا ٠ 
بھاگیہ کے ہیرے جروا پہنے ، 'منکر' روپ کو روتے رہنا ٠ 

Wednesday, July 3, 2019

जुंबिशें क़तआत

क़तआत

प्रेत आत्माएं

जेब में कुछ ले के आए हो कि बस दर्शन किया,
मैं हूँ मर्यादा पुरूष, है मूल्य मेरा रूपया,
तुम ने ही जन्मा है हम को, नाम ज्ञानेश्वर दिया,
जी रहा हूँ ऐश से ऐ बेवकूफ़ो! शुक्रया.

پریت آتما ئیں 
جیب میں کُچھ لے کے آے ہو ، کہ بس درشن کیا 
میں ہوں مریادہ پُرش ، ہے مولیہ میرا روپیہ 
تُم نے ہی جنما ہے مُجھ کو ، نام گیانیشور دیا 
جی رہا ہوں عیش سے ، ائے بے وقوفو ! شکریہ ٠
**

प्रशंशनीय 

प्रदर्शनी प्रकृति की, नहीं पूजनीय है,
ये आपदा, विपदा भी, नहीं निंदनीय है,
भगवान् या शैतान नहीं होती है क़ुदरत,
जो कुछ मिला है उससे, वह प्रशंशनीय.
***
जल परी 

शाम आई भर नहीं, ऊबने लगता है दिल,
जाने क्यों गुम सी ख़बर, ढूँढने लगता है दिल,
याद आती है उसे तब, खूबसूरत जल परी,
जाके पैमाने में फिर, डूबने लगता है दिल.

جل پری 

شام آئ بھر نہیں کہ اوبنے لگتا ہے دل 
جانے کیوں گم سی خبر کو ڈھونڈھنے لگتا ہے دل 
یاد آتی ہے اسے تب خوب صورت جل پری
جا کے پیمانے میں پھر ڈوبنے لگتا ہے دل٠  

Tuesday, July 2, 2019

जुंबिशें रुबाइयात



रुबाइयात


बतलाई नई राह, पे चलना है तुम्हें,
सांचा है क़दामत का, न ढलना है तुम्हें,
ये दुन्या बहुत आगे निकल जाएगी,
इबहाम के आलम से निकलना है तुम्हें.
अब्हाम=वहम 

بتلائی نئی راہ پہ چلنا ہے تمہیں
سانچے میں قدا مت کے نہ ڈھلنا ہے تمہیں،
یہ دنیا بہت آگے نکل جاۓگی 
ابہام کے عالم سے نکلنا ہے تمہیں

**
ज़ालिम के लिए है तेरी रस्सी ढीली,
मज़लूम की चड्ढी रहे पीली  गीली,
औतार ओ पयम्बर को, दिखाए जलवा,
और हमको दिखाए, फ़क़त छत्री नीली. 

ظالم کے لئے ہے تری رسسی ڈھیلی 
مظلوم کی چڈھی رہےگیلی  پیلی 
اوتار پیمبر کو دکھاۓ جلوہ 
اورہمکو دکھاۓ فقط چھتری نیلی ٠ 

***
है रीश रवाँ, शक्ल पे गेसू है रवाँ ,
हँसते हैं परी ज़ाद सभी, तुम पे मियाँ, 
मसरूफ़ ए इबादत हो, मशक्क़त बईद,
करनी नहीं शादी तुम्हें? कैसे हो जवाँ.
बईद=दूर 

ہے ریش رواں شکل پہ ، گیسو ہیں رواں 
ہنستے ہیں پری زاد سبھی تم پہ میاں 
مصروف عبادت ہو ، مشقّت سے بعید
کرنی نہیں شادی تھیں ؟ کیسے ہو جواں ٠  

Monday, July 1, 2019

जुंबिशें नज़्म


     नज़्म 
शक बहक 

यक़ीं बहुत कर चुके हो यारो,
इक मरहला1 है, गुमाँ2 को समझो.
यक़ीं है अक्सर तुम्हारी ग़फ़लत,
ख़िरद3 के आबे-रवां को समझो .

अक़ीदतें और आस्थाएँ,
यक़ीं की धुंधली सी रह गुज़र4 हैं.
ख़रीदती हैं यह सादा लौही5,
यक़ीं की नाक़िस दुकाँ को समझो .

१-पड़ाव २-अविश्वाश का उचित मार्ग ३-अक्ल ४-सरल स्वभाव ५-हानि करक

شک  بحق

یقیں بہت کر چکے ہو یارو  
ہے مرحلہ اک گماں کو سمجھو ٠
یقیں ہے اکثر تمہاری غفلت
خرد کے آبِ رواں کو سمجھو ٠
عقیدتیں اور آستھیں 
یقیں کی دھندھلی سی رہ گزر ہیں 
خریدتی ہیں یہ سادہ لوحی 
یقیں کی ناقص دکاں کو سمجھو ٠   

Sunday, June 30, 2019

जुंबिशें ग़ज़ल


  ग़ज़ल 

महरूमियाँ सताएँ न, नींदों की रात हो,
दिन बन के बार गुज़रे न, ऐसी नजात हो.

हाथों की इन लकीरों पे, मत मारिए छड़ी,
उस्ताद मोहतरम, ज़रा शेफ्क़त का हाथ हो.

यह कशमकश सी क्यूं है, बग़ावत के साथ साथ,
पूरी तरह से देव से छूटो, तो बात हो.

कुछ तर्क गर करें तो सुकून व् क़रार है,
ख़ुद नापिए कि आप की, कैसी बिसात हो.

उंगली से छू रहे हैं, तसव्वर की माह व् रू,
मूसा की गुफ़्तुगु में, ख़ुदाया सबात4 हो.

इक गोली मौत की मिले 'मुंकिर' हलाल की,
गर रिज़्क1 का ज़रीया2 मदद हो, ज़कात3 हो.

१-भरण-पोषण २-साधन ३-दान 4 तत्व 

محرومیاں ستائیں نہ، نیندوں کی رات ہو 
دن بار بن کے گزرے نہ ایسی نجات ہو٠ 

ہاتھوں کی ان لکیروں پہ، مت مارئے چھڑی، 
استادِ محترم زرہ شفقت کا ہاتھ ہو٠ 

یہ کشمکش سی کیوں ہے، بغاوت کے ساتھ ساتھ؟ 
پوری طرح سے دیو سے چھوٹو تو بات ہو٠ 

کچھ ترک گر کریں، تو سکون و قرار ہے 
خود ناپئے کہ آپ کی کیسی بساط ہو٠ 

اُنگلی سے چھو رہے ہیں، تصوّر کی وہ پری 
موسیٰ کی گُفتگو میں خدایا ثبات ہو. 

اک گولی موت کی کما منکر حلال کی 
گر رزق کا زریعہ مدد ہو، زکات ہو٠ 

Friday, June 28, 2019

जुंबिशें दोहे


दोहे 

तन सिंचित मोती जड़ित , मन मोहन मुस्कान ,
है सृजित शोभा गणित , अल्ला तेरी शान .

تن سنچت ، موتی جڑت ، من موہن مسکان  
ہے سرجت شوبھا گڑت ، اللہ تیری شان ٠ 
**
उपदेशों से न बनी , लाए ईश आदेश ,
शक्ति को भगती मिले , बने जो अध्यादेश .

اپدیشوں سے نا بنی ،لایں ایش آدیش 
شکتی کو بھکتی میل ، بنے جو ادھیا دیش ٠
***
दावत हक की लाएं हैं , खिला रहे हैं भूख ,
इनके उनके फ़िक्र में, खुद भी गए हैं सूख .

دعوت حق کی لاۓ ہیں ، کھلا رہے ہیں بھوک 
انکی انکی فکر میں خود بھی گئے ہیں سوکھ 
****
खोले अपना डाक घर , बैठा उपर खुदाए ,
ख़त ले आया डाकिया , मार मार पढवाए .

کھولے اپنا ڈاک گھر، بیٹھا اوپر خداۓ 
خط لے آیا ڈاکیہ ، مار مار پڑھواے ٠
*****
आ देखे शमशान को या फिर कब्रिस्तान ,
जीवन की सच्चाई चुन , ऐ भोले नादान .

آ دیکھیں شمشان کو یا پھر قبرستان 
جیون کی سچچائی چن ، ائے بھولے نادان 

Thursday, June 27, 2019

मुस्कुराहटें


मुस्कुराहटें 
टक्कर 

था तबअ1 आज़ाद दहकाँ2, शेख़ ए बातिल3 का था वाज़4,
मैं उसे सौ ऊँट दूंगा, जो पढ़े सौ दिन नमाज़.
पा के लालच ऊँट का, दहकाँ वह राज़ी हो गया,
गोया अगले रोज़ से, पाजी नमाज़ी हो गया.

सौ दिनों के वाद आए शेख़ जब उसके यहाँ,
बोले बेटा पास मेरे ऊँट और घोडे कहाँ,
तुझको कर देना नमाज़ी, बस मुझे दरकार था,
राह में मस्जिद के बस, तू ही खटकता ख़ार था.
शेख़ की वादा ख़िलाफ़ी पर था उसका ये जवाब,
बे वज़ू5 के मैंने भी, टक्कर लगाए हैं जनाब.

1 स्वतंत्र स्वभाव 2 किसान 3 झूठा मोलवी 4 संबोधन 5 शरीर शुद्ध करना 

ٹکّر 
تھا طبع آزاد دہقان ، شیخ باطل کا تھا واعظ 
"میں اسے سو اونٹ دونگا ، جو پڑھے سو دن نماز"  
کر کے لالچ اونٹوں کا، وہ شخص راضی ہو گیا
گویہ اگلے دن سے، وہ پاجی نمازی ہو گیا ٠

  سو دنوں کے بعد آئے، شیخ جب اسکے یہاں 
بولے بیٹا پاس میرے، اونٹ اور گھوڑے کہاں ٠ 
تجھ کو کر دینا نمازی، بس مجھے درکار تھا 
راہ میں مسجد کے اک، تو ہی کھٹکتا خار تھا ٠ 
شیخ کی وعدہ خلافی پر، یہ اسکا تھا جواب  
بے وضو کے میں نے بھی ، ٹکّر لگاۓ ہیں جناب ٠