Wednesday, November 30, 2011

ग़ज़ल - - - खिरद का मशविरा है, ये की अब अबस निबाह है



खिरद का मशविरा है, ये की अब अबस निबाह है,
दलीले दिल ये कह रही है, उस में उसकी चाह है.
 
मुकाबले में है जुबान कि क़दिरे कलाम है,
सलाम आइना करे है, कि सब जहाँ सियाह है.
 
ज़मीर की रज़ा है गर, किसी अमल के वास्ते,
बहेस मुबाहसे जनाब, उस पे ख्वाह मख्वाह है.
 
लहू से सींच कर तुम्हारी खेतियाँ अलग हूँ मैं,
किसी तरह का मशविरह, न अब कोई सलाह है.
 
नदी में तुम रवाँ दवां, कभी थे मछलियों के साथ,
बला के दावेदार हो, समन्दरों की थाह है.
 
तलाश में वजूद के ये, ज़िन्दगी तड़प गई,
फुजूल का ये कौल है कि चाह है तो रह है.
*****

*खिरद=विवेक * अबस व्यर्थ *क़दिरे कलाम =भाषाधिकार

Friday, November 25, 2011

ग़ज़ल - - - ये तसन्नो में डूबा हुवा प्यार है


 
 
ये तसन्नो में डूबा हुवा प्यार है,
क्या कोई चीज़ फिर मुफ़्त दरकार है.
 
 
फैली रूहानियत की वबा क़ौम में,
जिस्म मफ़्लूज है, रूह बीमार है.
 
 
नींद मोहलत है इक, जागने के लिए,
जाग कर सोए तो नींद आज़ार है.
 
 
बुद्धि हाथों पे सरसों उगाती रही,
बुद्धू कहते रहे ये चमत्कार है.
 
 
मुज़्तरिब हर तरफ़ सीधी जमहूर है,
मुन्तखिब की हुई किसकी सरकार है.
 
 
बाँटता फिर रहा है वो पैगामे मौत,
भीड़ साकित है, जैसे तलबगार है.
 
 
एक झटके में जोगी कहीं जा के मर,
क़िस्त में मौत तेरी ये बेकार है.
 
 
हों न "मुंकिर" इबारत ये उलटी सभी,
ले के आ आइना, वोह मदद गार है.
*****

*आज़ार=रोग *मुज़्तरिब=बेचैन *मुन्तखिब=चुनी हुई.

Sunday, November 20, 2011

हिंदी ग़ज़ल - - - ला इल्मी का पाठ पढाएँ अन पढ़ मुल्ला योगी


 
ला इल्मी का पाठ पढाएँ, अन पढ़ मुल्ला योगी,
दुःख दर्दों की दवा बताएँ खुद में बैठे रोगी.
 
 
तन्त्र मन्त्र की दुन्या झूठी, बकता भविश्य अयोगी,
अपने आप में चिंतन मंथन सब को है उपयोगी.
 
 
आँखें खोलें, निंद्रा तोडें, नेता के सहयोगी,
राम राज के सपन दिखाएँ सत्ता के यह भोगी.
 
 
बस ट्रकों में भर भर के ये भेड़ बकरियां आईं,
ज़िदाबाद का शोर मचाती नेता के सहयोगी.
 
 
पूतों फलती, दूध नहाती रनिवास में रानी,
अँधा रजा मुकुट संभाले, मारे मौज नियोगी.
 
 
"मुकिर' को दो देश निकला, चाहे सूली फांसी,
दामे, दरमे,क़दमे, सुखने, चर्चा उसकी होगी.
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दामे,दरमे,क़दमे,सुखने=हर अवसर पर

Friday, November 4, 2011

ग़ज़ल - - - जब से हुवा हूँ बे गरज़, शिकवा गिला किया नहीं


जब से हुवा हूँ बे गरज़, शिकवा गिला किया नहीं,
कोई यहाँ बुरा नहीं, कोई यहाँ भला नहीं.
 
 
अपने वजूद से मिला तो मिल गई नई सेहर,
माज़ी को दफ़्न कर दिया, यादों का सिलसिला नहीं.
 
 
पुख्ता निज़ाम के लिए, है ये ज़मीं तवाफ़ में,
जीना भी इक उसूल है दिल का मुआमला नहीं.
 
 
बख्शा करें ज़मीन को, मानी मेरे नए अमल,
मेरे लिए रिवाजों का, कोई काफ़िला नहीं.
 
 
ज़ेहनों के सब रचे मिले, सच ने कहाँ रचा इन्हें,
ढूँढा किए खुदा को हम, कोई हमें मिला नहीं.
 
 
थोडा सा और चढ़ के आ, हस्ती का यह उरूज है,
कोई भी मंजिले न हों, कोई मरहला नहीं.
 
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Friday, October 28, 2011

ग़ज़ल - - -कभी कभी तो मुझे तू निराश करता है


कभी कभी तो मुझे तू निराश करता है,
मेरे वजूद में खुद को तलाश करता है.
 
मेरे वजूद का खुद अपना एक परिचय है,
सुधारता नहीं तू इस को लाश करता है.
 
किसी इलाके के थोड़े विकास के खातिर,
बड़ी ज़मीन का तू सर्वनाश करता है.
 
मैं होश में हूँ हजारों कटार के आगे,
तुहारे हाथ का कंकड़ निराश करता है.
 
निसार जाँ से तेरी इस लिए अदावत है,
तेरे खुदाओं का वोह पर्दा फाश करता है.
 
नशा हो शक्ति का या हो शराब का 'मुंकिर" ,
नशे की शान है वोह सर्व नाश करता है.
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Saturday, October 22, 2011

ग़ज़ल - - - गफलतों की इजाज़त नहीं है


 
गफलतों की इजाज़त नहीं है?

ये तो सच्ची इबादत नहीं है.
 
 
कडुई सच्चाइयाँ हैं सुनाऊं?
मीठे झूटों की आदत नहीं है.
 
 
चित तुम्हारी है पट भी तुम्हारी,
भाग्य लिक्खे में गैरत नहीं है.
 
 
छोड़ कर बाल बच्चों को बैठे,
सन्त जी ये शराफ़त नहीं है.
 
 
दुःख न पहुँचाओ तुम हर किसी को,
सुख जो देने की वोसअत नहीं है.
 
 
रोग अपना ज़ियाबैतिशी है,
अब कोई शै भी नेमत नहीं है.
 
 
हों वो पत्थर के या फिर हवा के,
इन बुतूं में हकीक़त नहीं है.
 
 
ये हैं "मुंकिर" में फूटी निदाएँ,
आसमानों की हुज्जत नहीं है.
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Monday, October 17, 2011

ग़ज़ल - - - तरस न खाओ मुझे प्यार कि जरूरत है


तरस न खाओ मुझे प्यार कि जरूरत है,
मुशीर कार नहीं यार कि ज़रुरत है.
 
तुहारे माथे पे उभरे हैं सींग के आसार,
तुम्हें तो फ़तह नहीं हार की ज़रुरत है.
 
कलम कि निब ने कुरेदा है ला शऊर तेरा,
जवाब में कहाँ तलवार की ज़रुरत है.
 
अदावतों को भुलाना भी कोई मुश्क़िल है,
दुआ, सलाम, नमस्कार की ज़रुरत है.
 
शुमार शेरों का होता है, न कि भेड़ों का,
कसीर कौमों बहुत धार की ज़रुरत है.
 
तुम्हारे सीनों में आबाद इन किताबों को,
बस एक "मुंकिर" ओ इंकार कि ज़रुरत है.
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