Friday, December 7, 2018

जुंबिशें - - - क़तआत 43-45



43
फ़िक्र ए आख़रत 

है लाश को परवाह, मिले कोई ठिकाना ?
गड़ना है कि जलना है कि गंगा में बहाना ?
ऐ लाश जानदार!तू छोड़ इसकी फ़िक्र,
बदबू जो उठेगी तो, उठाएगा ज़माना.  

فکرِ آخرت  

ہے لاش کو پرواہ ، لگے کوئی ٹھکانہ 
گڑنا ہے کہ جلنا ہے ، کہ گنگا میں بہانا 
ائے لاش ! بجاں چھوڑ دے مٹّی کے فکر کو 
بدبو جو اٹھےگی ، تو اُٹھاۓ گا زمانہ ٠ 

44
इमकानी हदें 

गर काम भला हो तो, कुदरत की मदद है,
हाँ याद रखें, जेहद के आलम में जो क़द है,
सुस्ता लें ज़रा देर, अगर थक जो गए हों,
नाकाम नतीजों में ही, इमकान की हद है.    
امکانی حدیں

گر کام بھلا ہوگا ، تو قدرت کی مدد ہے 
ہاں ! یاد رکھیں ، جہد کے عالم میں جو قد ہے 
سُستا لیں ذرا دیر ، اگر تھک جو گئے ہوں 
ناکام نتیجوں میں ہی ، امکان کی حد ہے ٠ 

45
मुज़ब्ज़ब 

इक़बाल बग़ावत लिए लगते हैं ग़ज़ल में,
डरते हैं, सदाक़त को छिपाए हैं, हमल में,
बातिन में हैं कुछ और, निभाए हैं ख़ुदा को,
जैसे थे मुसलमाँ नए, बुत दाबे बग़ल में .

مذبذب

اقبال بغاوت لئے ، لگتے ہیں غزل میں 
ڈرتے ہیں ، صداقت کو چھاپے ہیں حمل میں 
باطن میں ہیں کچھ اور ، نبھاۓ ہیں خدا کو 
جیسے تھے مسلماں نیے ، بُت دا بے بغل میں ٠ 

Thursday, December 6, 2018

जुंबिशें - - - क़तआत 40-42



40
ढलान 

हस्ती है अब नशेब मे, सर है ढलान पर,
कोई नहीं कि, मेरे लिए खेले जान पर,
ख़ुद साए ने भी मेरे, यूँ तक़रार कर दिया,
सर पे है तेरे धूप, मेरा क़द है आन पर.
नशेब=नीचे ,

ڈھلان
ہستی ہے اب نشیب میں ، سر ہے ڈھلان پر 
کوئی نہیں جو میرے لئے ، کھیلے جان پر 
خود ساۓ نے بھی میرے ، یوں تکرار کر دیا 
سررج ہے میرے سر پہ ، مرا قد ہے ان پر ٠ 

41
इबरत का नज़ारा 

शमशान में जलती हुई, लाशों का नज़ारा,
या कब्र में उतरी हुई, मय्यत का इशारा,
देते हैं ये जीने का सबक़, अह्ल ए हवस को,
समझो तो समझ पाओ, कि कितना हो तुम्हारा  
  
عبرت کا نظارہ

شمشان میں جلتی ہوئی ، لاشوں کا نظارہ 

یا قبر میں اتری ہوئی ، میّت کا اِشارہ 
دیتے ہیں یہ جینے کا سبق ، اہلِ ہوس کو 
سمجھو تو سمجھ پاؤ کہ ، ہو کتنا تمہارا٠

42
काफ़ 
यह काफ़ सवालों का, उठाए है पिटारा,
कब?कौन?कहाँ?कैसे?कितने? हैं गवारा,
आ जाए सवालों में अगर क्यों?या मगर क्यों?
चढ़ जाता है सुन कर इसे ठहरा हुवा पारा.     

کاف

یہ کاف سوالوں کا اٹھاۓ ہے پٹارہ 
کب، کون، کہاں، کیسے، کتنے، ہیں گوارہ 
آ جاۓ سوالوں میں اگر کیون یا مگر کیوں ؟
چڑھ جاتا ہے سُن کر اسے ، ٹھہرا ہوا پارہ٠ 

Wednesday, December 5, 2018

जुंबिशें - - - क़तआत 37-39



37
प्रेत आत्माएं

जेब में कुछ ले के आए हो कि बस दर्शन किया,
मैं हूँ मर्यादा पुरूष, है मूल्य मेरा रूपया,
तुम ने ही जन्मा है हम को, नाम ज्ञानेश्वर दिया,
जी रहा हूँ ऐश से ऐ बेवकूफ़ो! शुक्रया.

پریت آتما ئیں 

جیب میں کُچھ لے کے آے ہو ، کہ بس درشن کیا 
میں ہوں مریادہ پُرش ، ہے مولیہ میرا روپیہ 
تُم نے ہی جنما ہے مُجھ کو ، نام گیانیشور دیا 
جی رہا ہوں عیش سے ، ائے بے وقوفو ! شکریہ ٠

38
प्रशंशनीय 

प्रदर्शनी प्रकृति की, नहीं पूजनीय है,
ये आपदा, विपदा भी, नहीं निंदनीय है,
भगवान् या शैतान नहीं होती है क़ुदरत,
जो कुछ मिला है उससे, वह प्रशंशनीय.

39 
जल परी 

शाम आई भर नहीं, ऊबने लगता है दिल,
जाने क्यों गुम सी ख़बर, ढूँढने लगता है दिल,
याद आती है उसे तब, खूबसूरत जल परी,
जाके पैमाने में फिर, डूबने लगता है दिल.

جل پری 

شام آئ بھر نہیں کہ اوبنے لگتا ہے دل 
جانے کیوں گم سی خبر کو ڈھونڈھنے لگتا ہے دل 
یاد آتی ہے اسے تب خوب صورت جل پری
جا کے پیمانے میں پھر ڈوبنے لگتا ہے دل٠  

Tuesday, December 4, 2018

जुंबिशें - - - क़तआत 34-36



34
कसौटी 

ईमान को पाया है या ईमान लिया है?
मनवाया गया है कि इसे मान लिया है.
फटका है? पछोरा है? इसे छान लिया है?
लोगों के गढ़े देव को पहचान लिया है?

ایمان کی کسوٹی

ایمان کو پایا ہے ، یا ایمان لیا ہے
منوایا گیا ہے ، کہ اسے ماں لیا ہے 
پھٹکا ہے ؟ پچوڑا ہے ؟ اسے چھان لیا ہے؟
کس طرح گڑھے دیو کو پہچان لیا ہے ؟ ؟

35
पसीने  फूल 

हल पेट की गुत्थी थी, दहकाँ की बदौलत,
तन सर की मुहाफ़िज़ है, ये मज़दूर की मेहनत, 
दीवारों में लिपटी हुई आरिफ़ की दुआएँ,
है ताक़ पे अटकी हुई, आबिद की इबादत.
मुहाफ़िज़=संरक्षक , आरिफ़=आत्म ज्ञानी ,आबिद=उपासक 

پسینے کے پھول

عابد کی عبادت تھی کسی طاق میں اٹکی ،
عارف کی دعا یں رہی ، دیوار میں چپکی ،
دہقاں کی مشققت نے غذا پیٹ کو دی ہے،
مزدور کی محنت نے تن و سر کی خبر لی ٠ 

36
दुआए ख़ैर 

ये ज़ातयाती फ़ितने, माहौलयाती सदमें,
ये दुश्मनी के नरगे़, ये नफ़रतों के रख़ने,
ऐ क़ूवत ए इरादी, इन से बचा के ले चल,
जब तक मेरी मुहिम में आफ़ाक़ियत न झलके.
ज़ातयाती=व्यक्ति गत ,क़ूवत ए इरादी=दृढ निश्चय  आफ़ाक़ियत=बुलंदी 

دعاءُ خیر 

یہ زاتیاتی سدمیں، ماحول یاتی فتنے 
یہ دُشمنی کے نرغے، یہ نفرتوں کے رخنے 
ائے قووتِ ارادی، ان سے بچا کے لے چل 
جب تک مری مُہم میں، آفاقیت نہ جھلکے٠   



Monday, December 3, 2018

जुंबिशें - - - क़तआत 31-33



31
ठूंठ 

बातिल की बाग़ में हूँ किसी ठूंठ की तरह,
हर सांस पी रहा हूँ कड़े घूँट की तरह,
लादे हुए हूँ पीठ पर, सच्चाइयों का बोझ,
वीरान दश्त में हूँ , थके  ऊँट की तरह.
बातिल=मिथ्य ,दश्त=जंगल 

ٹھونٹھ

باطل کی باغ میں ہوں ، کسی ٹھونٹھ کی طرح 
ہر سانس پی رہا ہوں ، کڑے گھونٹ کی طرح 
لادے ہوئے ہوں پیٹھ پر ، سچائیوں کا بوجھ 
ویران میں آ گیا ہوں ، کسی اونٹ کی طرح ٠

32
ओ सूरज 

लाखों बरस से किसके लिए जूझता है तू ,
गर्दिश के बंधनों से कभी ऊबता है तू ?,
ढो ढो के थक गया हूँ, ज़माने का बोझ मैं,
 सूरज मुझे बता, कि कहाँ डूबता है तू .

او سورج 

لاکھوں برس سے، کسکے لئے جوجھتا ہے تو 
گردش کے بندھنو سے، کبھی اوبتا ہے تو؟ 
ڈھو ڈھو کے تھک گیا ہوں زمانے کا بوجھ میں 
سورج مجھے بتا، کہ کہاں ڈوبتا ہے تو ؟

33
शर

कुछ लोग छोड़ते हैं मरने के बाद ज़र,
कुछ लोग छोड़ते हैं दीवार ओ दर का घर,
दीनो धरम के बानी फ़क़त छोड़ते हैं दिक़,
इंसानियत के हक में दीन ओ धरम का शर. 
शर=झगड़ा

وراثتیں 

کُچھ لوگ چھوڑتے ہیں مرنے کے بعد زر 
کچھ لوگ چھوڑتے ہیں دیوار و در کا گھر 
کیسی وراثتیں ہیں ان پیر و پیامبر کی 
انسانیت کے حق میں دین و دھرم کا شر٠ 

Sunday, December 2, 2018

जुंबिशें - - - क़तआत 28-30



28
इन्फ़िरादियत 

जब शरअ इज्तेहाद पे हो जाएगी क़ज़ा,
जब फिर से फ़र्द पूजेगा अपना ही इक ख़ुदा,
जब छोड़ देगी फ़र्द को यह इज्तेमाइयत,
इंसान जा के पाएगा तब अपना मर्तबा.  
इन्फ़िरादियत=अनुपमता इज्तेहाद=सुधार,
फ़र्द=व्यक्ति,इज्तेमाइयत=समूह ,मर्तबा=महिमा  

انفرادیت 

جب شرع اجتہاد پہ ہو جایگی قضا 
جب پھر سے فرد پوجیگا اپنا ہی اک خدا 
جب چھوڑ دیگی فرد کو یہ اجتماعیت 
انسان جا کے پاےگا تب  اپنا مرتبہ٠  

29
अजीब बन्दा 

सर झुकाए हुए ही चढ़ता है,
कुछ इबारत ज़मीं की पढ़ता है,
उस से भिड़ना बड़ा ही मुश्किल है,
सारे इलज़ाम ख़ुद पे मढ़ता है. 

عجیب بندہ 

سر جھکاے ہوئے ہی چلتا ہے 
کچھ عبارت زمیں کی پڑھتا ہے 
اس سے بھڑنا بڑا ہی مشکل ہے 
سارے الزام خود پہ مڑھتا ہے٠ 

30
डिजाइन 

मायूस हुवा मुंकिर तब उनको हँसी आई,
मह्जूज़ हुवा मुंकिर तब उनको हँसी आई,
टाइम का डिज़ाइन है पल भर के तवक़्क़ुफ़ में,
मारूफ़ हुवा मुंकिर तब उनको हँसी आई.
मह्जूज़=ख़ुश,तवक़्क़ुफ़=क्षणिक,मारूफ़=पहचान 

ڈیزائن
مایوس ہوا منکر تب انکو ہنسی آئ 
محظوظ ہوا منکر تب انکو ہنسی آئ 
ٹائم کا ڈیزائن ہے پل بھر کے توقف میں 
معروف ہوا منکر تب انکو ہنسی آئ٠ 

Saturday, December 1, 2018

जुंबिशें - - - क़तआत 22-24



22
जहाज़ का पंछी

 नाहक़ था मैं ही, हक़ पे तुम्हीं थे, जहाँ थे तुम,
मैं उड़ के थक गया तो ज़मीं पर निशाँ थे तुम,
मैं आ गया हूँ  भूले हुए घर को लौट कर,
मानिंद  माँ के  पूछ लो, अब तक कहाँ थे तुम.

جہاز کا پنچھی

نا حق تھا میں ہی ، حق پہ تمہیں تھے ، جہاں تھے تم 

میں اڑ کے تھک گیا ، تو زمیں پر نشاں تھے تم 

میں آ گیا ہوں بچھڑے ہوئے ، گھر میں لوٹ کر 

مانند ماں کے پوچھو ، کہ اب تک کہاں تھے تم ٠23

कुत्तों का ग़लबा 

बेचने दो उसे इंसानी लहू का मअज़ून,
पुश्त पर उसके है, मौजूदा सदी का क़ानून,
मुझको फ़िलहाल तो कुत्तों से बचाओ यारो,
फिर कभी लिखखूँगा, हड्डी की ख़ता पर मज़मून.
मअज़ून=दवाई , मज़मून=विषय 

کُتوں کا غلبہ

بیچنے دو اُسے انسانی لہو کا معجون 
پشت پر اُس کے ہے ، موجودہ صدی کا قانون 
مُجھ کو فی ا لحال تو ، کُتوں سے بچاؤ یارو! 
پھر کبھی لکّھونگا ، ہڈ ی کی خطا پر مضمون ٠ 

24
ताजिर

 हर वक़्त फ़िक्र ए दौलत, बस खाता और बही है
रहती है ये कुएँ में, ताजिर की ज़िंदगी है
दुन्या की सारी क़दरें, गुम हो गईं हैं इनमें
दौलत ही दुःख है इनका, दौलत ही हर ख़ुशी है.
ताजिर=व्योसाई,क़दरें=मूल्य 

تاجر
ہر وقت فکرِ دولت ، کھاتا ہے اور بہی ہے 
رہتی ہے اک کویں میں ، تاجر کی زندگی ہے 
دنیا کی ساری قدریں ، گم ہو گئی ہیں ان میں 
دولت ہی دکھ ہے انکا ، دولت ہی ہر خوشی ہے ٠