Saturday, March 24, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 9



9

तेरे मुबाहिसों का,ये लब्बो लुबाब है,
रुस्वाए हश्र* हैं सभी, तू कामयाब है.

आंखों पे है यक़ीन, न कानों पे एतबार,
सदियों से क़ौम आला$, ज़रा मह्व ए ख़्वाब है.  

दुन्या समर भी पाए, जो चूसो ज़मीं का ख़ून,
जज़्बा ज़मीं का है, तो यह हरकत सवाब है. 

अफ़सोस मैं किसी की, समाअत3 न बन सका,
चारो तरफ़ ही मेरे, सवालो जवाब है.

पुरसाने हाल बन के, मेरे दिल को मत दुखा,
मुझ में संभलने, उठने और चलने की ताब है.

दर परदा ए ख़ुलूस, कहीं सांप है छिपा,
'मुंकिर' है बूए ज़हर, यह कैसी शराब है.

रुस्वाए हश्र *=प्रलय के पापी $=इशारा मुसलमान ३-श्रवण शक्ति

،تیرے مباحثوں کا یہ لب و لُباب ہے 
رُسواے حشر ہیں سبھی، تو کامیاب ہے٠ 

آنکھوں پہ ہے یقین، نہ کانوں پہ اعتبار 
صدیوں سے قومِ آلہ، ذرا محوِ خواب ہے٠ 

،دنیا ثمر بھی پاۓ، جو چوسو زمین کا خون 
جزبہ شجر کا ہے، تو یہ حرکت ثواب ہے٠ 

،افسوس میں کسی کا سماعت نہ بن سکا 
چارو طرف ہی میرے، سوال و جواب ہے٠ 

،پُرسا ن حال بن کے میرے دل کو مت دُکھا 
مجھ میں سنبھلنے،اٹھنے، سنورنے کی تاب٠ 

،در پردہ خُلوص کہیں سانپ چھپا ہے 
منکر ہے بوۓ زہر، یہ کیسی شراب ہے٠ 

Friday, March 23, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 8



8

अगर ख़ुद को समझ पाओ, तो ख़ुद अपने ख़ुदा हो तुम,
कहाँ किन किन के बतलाए हुओं में, मुब्तिला हो तुम.

है अपने आप में ही खींचा-तानी, तुम लड़ोगे क्या ?
इकट्ठा कर लो ख़ुद को, मुन्तशिर हो, जा बजा1 हो तुम.

मरे माज़ी2 का अपने, ऐ ढिंढोरा पीटने वालो!
बहुत शर्मिन्दा है ये हाल, जिस के सानेहा3 हो तुम.

तुम अपने ज़हर के सौग़ात को, वापस ही ले जाओ,
कहाँ इतने बड़े हो? तोह्फ़ा दो, मुझ को, गदा4 हो तुम.

फ़लक  पर आक़बत 5 की, खेतियों को जोतने वालो,
ज़मीं कहती है इस पर एक, दाग़े बद नुमा हो तुम.

चलो वीराने में 'मुंकिर' कि फ़ुर्सत हो ख़ुदाओं से,
बहुत मुमकिन है मिल जाए ख़ुदाई भी, बजा हो तुम.

१-बिखरे हुए २-अतीत ३-विडम्बना ४-भिखरी ५-परलोक


، اگر خود کو سمجھ پاؤ، تو خود اپنے خدا ہو تم
کہاں کن کن کے بتلاۓ ہوؤں میں، مبتلا ہو تو٠ 

، ہے اپنے آپ میں ہی کھینچا تانی، تم لڑوگے کیا 
اکٹّھا کر لو خود کو، منتشر ہو جا بجا ہو تو. 

، مَرے ماضی کا اپنے، ائے ڈھنڈھو را پیٹنے والو
بہت شرمندہ ہے یہ حال، جس کا سانحہ ہو تو٠ 

، تم اپنے زہر کے سوغات کو واپس ہی لے جاؤ  
کہاں اتنے بڑے ہو، تحفه دو، مجھ کو، گدا ہو تو٠ 

، فلک پر عاقبت کی کھیتیوں کو جوتنے والو 
زمیں کہتی ہے اس پہ ایک داغِ بدنما ہو تو٠ 

، چلو ویرانے میں منکر کہ فرصت ہو خداؤں سے 
بہت ممکن ہے مل جاۓ خدائی ہی، بجا ہو تو٠

Thursday, March 22, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 7



7

हैं मसअले ज़मीनी, हलहाए आसमानी,
नीचे से बेख़बर है, ऊपर की लन तरानी.

फ़रमान सीधे सादे, पुर पेच तर्जुमानी,
उफ़! क़ूवते समाअत* उफ़! हद्दे बे ज़ुबानी.

ना जेबा तसल्लुत1 है, बेजा यक़ीं दहानी2,
ख़ुद बन गई है दुन्या, या कोई इसका बानी.

मैं सच को ढो रहा था, तुम क़ब्र खोदते थे,
आख़िर ज़मीं ने उगले, सच्चाइयों के मअनी.

कर लूँ शिकार तेरा, या तू मुझे करेगा,
बन जा तू ईं जहानी3, या बन जा आँ जहानी4.

ईमान ए अस्ल शायद, तस्लीम का चुका है,
वह आग आग हस्ती, "मुंकिर" है पानी पानी.

* श्रवण-शक्ति १-लदान २-विशवास दिलाना ३-इस जहान के ४-उस जहान के

،ہیں مسئلے زمینی، حل ہاۓ آسمانی 
نیچے سے بے خبر ہے، اوپر کی لَن ترانی٠ 

،فرمان سیدھے سادے، پر پیچ ترجُمانی 
اُف قووت سماعت، اُف حدِ بے زبانی٠ 

،نا زیبہ تسلّط ہے، بے جہ یقیں دہانی 
خود بن گئی ہے دُنیا، یا کوئی اِسکا بانی٠ 

،میں سچ کو ڈھو رہا تھا، تم قبر کھودتے تھے 
آخر زمیں نے اُگلے، سچائیوں کے معنی٠ 

کر لووں شکار تیرا، یا تو مجھے کریگا؟ 
بن جا تو ایں جہانی، یا بن جا آں جہانی ٠ 

،ایمانِ اصل شاید تسلیم کر چکا ہے 
وہ آگ آگ ہستی منکر ہے پانی پانی٠ 

Wednesday, March 21, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 6




6 

तअलीम नई जेह्ल1 मिटाने पे तुली है,
रूहानी वबा है, कि लुभाने पे तुली है.

बेदार शरीअत3 की ज़रूरत है ज़मीं को,
अफ़लाक4 की लोरी ये सुलाने पे तुली है.

जो तोड़ सकेगा, वो बनाएगा नया घर,
तरकीबे रफ़ू, उम्र बिताने पे तुली है.

वह कौन है लोगों की जमाअत कि ज़मीं पर ,
बस ज़िन्दगी का जश्न, मनाने पे तुली है.

मैं इल्म की दौलत को, जुटाने पे तुला हूँ,
क़ीमत को मेरी भीड़, घटाने पे तुली है.

'मुंकिर' की तराज़ू पे, अनल हक़5 वज़न है,
"जुंबिश"है कि तस्बीह के दाने पे तुली है.

१-अंध विशवास २-आध्यात्मिक रोग ३-बेदार शरीअत=जगी हुई नियमावली ४-आकाश ५- मैं ख़ुदा हूँ 


،تعلیم نئی جہل مٹانے پہ تُلی ہے
روحانی وبا ہے کہ لُبھانے پہ تُلی ہے٠ 

،جو توڑ سکےگا وہ بناۓ گا نیا گھر
ترکیبِ رفو عمر بتانے پہ تُلی ہے. 

،بیدار شریعت کی ضرورت ہے زمیں کو
 کی یہ لوری سُلانے پہ تُلی ہے٠ افلاک

،وہ کون ہے لوگوں جماعت کہ زمیں پر 
بس زندگی کا جشن منانے پہ تُلی ہے٠ 

،میں علم کی دولت کو جُٹانے پہ تُلا ھوں 
قیمت کو میری بھیڑ گھٹانے پہ تُلی ہے٠ 

،منکر کے ترازو پہ انلحق کا وزن ہے
جنبش ہے کہ تصبیح کے دانے پہ تُلی ہے٠

Tuesday, March 20, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 5



5

सुममुम बुक्मुम उमयुन कह के, फ़हेम के देते हो ताने,
दिल में मरज़ बढ़ा के मौला, चले हो हम को समझाने.

लम यालिद वलम यूलद, तुम हम जैसे मख़लूक़ नहीं,
धमकाने, फुसलाने की, ये चाल कहाँ से हो जाने?

कभी अमन से भरी निदाएँ, कभी जेहादों के ग़मज़े,
आपस में ख़ुद टकराते हैं, तुम्हरे ये ताने बाने.

कितना मेक अप करते हो तुम, बे सर पैर की बातों को,
मुतरज्जिम, तफ़सीर निगारो! "बड़ बड़" में भर के मअने.

आज नमाज़ें, रोज़े, हज, ख़ैरात नहीं, बर हक़ ऐ हक़!
मेहनत, ग़ैरत, इज़्ज़त, का युग आया है रब दीवाने.

बड़े मसाइल हैं रोज़ी के, इल्म बहुत ही सीखने हैं,
कहाँ है फ़ुरसत सुनने की अब, फ़लक ओ हशर के अफ़साने.

कैसे इनकी, उनकी समझें, अपनी समझ से बाहर है,
इनके उनके सच में "मुंकिर" अलग अलग से हैं मअने.

नोट-पहले तीन शेरों में शायर सीधा अल्लाह से मुखातिब है , चौथे में उसके एजेंटों से 
और आखिरी तीन शेरों में आप सब से. अर्थ गूढ़ हैं, काश कि कोई सच्चा इस्लामी विद्वान् आप को समझा सके.

سُمّم ،بُکمُم ، اُمیُن کہکے، فَہم کے دیتے ہو تعانے، 
دل میں مرَض بڑھا کے مولہ ، چلے ہو ہم کو سمجھانے ٠ 

لَم یَلِد ولَم یولَد ، تم ہم جیسی مخلوق نہیں، 
دھمکانے ، پُھسلنے کی یہ چال ، کہاں سے ہو جانے ٠ 

کبھی امن سے بھری ندایں ، کبھی جہادوں کے غمزے، 
آپس میں ٹکراتے ہیں ، تمہرے یہ تانے بانے ٠ 

کتنا میکپ کرتے ہو تم، بے سر پیر کی باتوں کو، 
متَرجّم ، تفسیر نگارو ، بڑ بڑ میں بھر کے معنے ٠ 

آج نمازیں، روزے، حج، خیرات نہیں بر حق، اے حق! 
محنت، غیرت، عزت کا یُگ آیا ہے، رب دیوانے ٠ 

بڑے مسائل ہیں روزی کے ،علم بہت سے باقی ہیں، 
کہاں ہے فرصت سننے کی ، اب فلق و حشر کے افسانے ٠ 

کیسے اِنکی اُنکی سمجھیں ، اپنی سمجھ سے باہر ہے، 
اِنکے اُنکے سچ میں منکر ، الگ الگ سے ہیں معنے ٠ 

Monday, March 19, 2018

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 4




4

पोथी समाए भेजे में, तब कुछ यक़ीं भी हो,
ऐ गूंगी कायनात ! ज़रा नुक़ता चीं भी हो.

खोदा है इल्मे नव ने, अक़ीदत के फ़र्श को,
अब अगले मोर्चे पे, वह अर्श ए बरीं2 भी हो.

साइंस दाँ हैं बानी, नए आसमान के,
पैग़म्बरों के पास ही, इन की ज़मीं भी हो.

ऐ इश्तेराक़3 ठहर भी, जागा है इन्फ़्राद4,
कहता है थोडी पूँजी, सभी की कहीं भी हो.

बारूद पर ज़मीन , हथेली पे आग है,
है अम्न का तक़ाज़ा, कि हाँ हो, नहीं भी हो.

'मुंकिर' भी चाहता है, सदाक़त5 पे हो फ़िदा,
इन्साफ़ व् आगाही6 को लिए, तेरा दीं7 भी हो.

२-सातवाँ आसमान ३-साम्यवाद ४-व्यक्तिवाद ५-सच्चाई ६न्याय एवं विज्ञप्ति ७-धर्म

،پوتھی سماۓ بھیجے میں، تب کچھ یقی بھی ہو 
ائے گونگی کائنات ! ذرا نقطہ چیں بھی ہو٠ 

،کھودا ہے علم نو نے، عقیدت کی قبر کو 
اب اگلے مورچہ پہ، یہ عرشِ بریں بھی ہو٠ 

،سائنس داں ہیں بانی، نئے آسمان کے 
پیغمبروں کے ساتھ ہی، انکی زمیں بھی ہو٠ 

،ائے اشتراق ٹھہر بھی ، جاگا ہے انفراد 
کہتا ہے تھوڑی پونجی، سبھی کی کہیں بھی ہو٠ 

،بارود پر زمیں ہے ، ہتھیلی پہ آگ ہے 
ہے امن کا تقاضہ کہ، ہاں بھی ، نہیں بھی ہو٠ 

،منکر بھی چاہتا ہے، صداقت پہ ہو فدا 
انصاف و آگہی کو لئے، تیرا دین بھی ہو٠ 

जुंबिशें - - -ग़ज़ल 3




3

सब रवाँ मिर्रीख़ पर, और आप का यह दर्स ए दीन,
काफ़िरीन व् मुशरिकीन व् मुनकिरीन व् मोमनीन3.

रौशनी कुछ सर पे कर लो, ताकि परछाईं का क़द,
छोटा हो जाए, तुम्हें कुछ अपने क़द पर हो यक़ीन.

सीखते क्या हो, इबादत और शरीअत के उसूल,
है ख़ुदा तो चाहता होगा, क़तार ए ग़ाफ़िलीन.

तालिबाने अफ़ग़नी, और कार सेवक हैं अडे़,
वह बजाएं, अपनी ढपली, यह बजाएं अपनी बीन.

जाने कितने काम बाक़ी हैं, जहाँ में और भी,
थोड़ी सी फ़ुर्सत उसे, दे दे ख़याल ए  नाज़नीन.

साहबे ईमाँ! तुम्हारे हक़ में है 'मुंकिर' की राह,
सैकड़ों सालों से, ग़ालिब हैं, ये तुम पर फ़ासिक़ीन4

१-मंगल ग्रह पर २-धर्म-शास्त्र दर्शन ३-शास्त्र-शीर्षक ४-झूठे


،سب رواں مِرّیخ پر، اور آپ کا یہ درسِ دین، 
کافرین و مُشرکین و منکرین و مومنین٠ 

،روشنی کچھ سر پہ کر لو، تاکہ پرچھائیں کا قد 
چھوٹا ہو جاۓ، تمہیں کچھ اپنے قد پر ہو یقین٠ 

،سیکھتے کیا ہوعبادت اورشریعت کے اُصول 
.ہے خدا تو جاہتا ہوگا قطارِ غافلین 

,طالبانِ افغنی اور کار سیوک ہیں اڑے 
.یہ بجائیں اپنی ڈفلی، وہ بجائیں اپنی بین 

،جانے کتنے کام باقی ہیں، جہاں میں اور بھی 
.تھوڑی سی فرصت اسے دےدے ، خیالِ نازنین 

،صاحبِ ایماں تمہارے حق میں ہے منکر کی راہ 
سیکڑوں سالوں سے غالب ہیں یہ تم فاسقین٠