Thursday, May 14, 2015

Junbishen 635 ghazal 6

 ग़ज़ल

हैं मसअले ज़मीनी, हलहाए आसमानी,
नीचे से बेखबर है, ऊपर की लन तरानी।

फ़रमान सीधे सादे, पुर पेच तर्जुमानी,
उफ़! कूवाते समाअत* उफ़! हद्दे बे जुबानी।

ना जेबा तसल्लुत1 है, बेजा यकीं दहानी2,
ख़ुद बन गई है दुन्या, या कोई इसका बानी।

मैं सच को ढो रहा था, तुम कब्र खोदते थे,
आख़िर ज़मीं ने उगले, सच्चाइयों के मानी।

कर लूँ शिकार तेरा, या तू मुझे करेगा,
बन जा तू ईं जहानी3, या बन जा आँ जहानी4।

ईमान ऐ अस्ल शायद, तस्लीम का चुका है,
वह आग आग हस्ती, "मुंकिर" है पानी पानी।

* श्रवण-शक्ति १-लदान २-विशवास दिलाना ३-इस जहान के ४-उस जहान के

Tuesday, May 12, 2015

junbishen 635 Ghazal 5

 ग़ज़ल

तालीम नई जेहल1 मिटाने पे तुली है,
रूहानी वबा२ है, कि लुभाने पे तुली है।

बेदार शरीअत3 की ज़रूरत है ज़मीं को,
अफ्लाफ़4 की लोरी ये सुलाने पे तुली है।

जो तोड़ सकेगा, वो बनाएगा नया घर,
तरकीबे रफ़ू, उम्र बिताने पे तुली है।

किस शिद्दते जदीद की, दुन्या है उनके सर
बस ज़िन्दगी का जश्न, मनाने पे तुली है।

मैं इल्म की दौलत को, जुटाने पे तुला हूँ,
कीमत को मेरी भीड़, घटाने पे तुली है।

'मुंकिर' की तराजू पे, अनल हक5 की  धरा6 है,
"जुंबिश" है कि तस्बीह के दानों पे तुली है।

१-अंध विशवास २-आध्यात्मिक रोग ३-बेदार शरीअत=जगी हुई नियमावली ४-आकाश ५- मैं ख़ुदा हूँ 6- वह वजन जो तराजू का पासंग ठीक करता है

Monday, May 11, 2015

Junbishen 633 Ghazal 4

ग़ज़ल

पोथी समाए भेजे में, तब कुछ यकीं भी हो,
ऐ गूंगी कायनात! ज़रा नुक़ता चीं भी हो।

खोदा है इल्मे नव ने, अक़ीदत के फर्श को,
अब अगले मोर्चे पे, वह अर्शे बरीं2 भी हो।

साइंस दाँ हैं बानी, नए आसमान के,
पैग़म्बरों के पास ही, इन की ज़मी भी हो।

ऐ इश्तेराक़3 ठहर भी, जागा है इन्फ़्राद4,
कहता है थोडी पूँजी, सभी की कहीं भी हो।

बारूद पर ज़मीन , हथेली पे आग है,
है अम्न का तक़ाज़ा, कि हाँ हो, नहीं भी हो।'


'मुंकिर' भी चाहता है, सदाक़त5 पे हो फ़िदा,
इन्साफ़ो आगाही6 को लिए, तेरा दीं7 भी हो।

२-सातवाँ आसमान ३-साम्यवाद ४-व्यक्तिवाद ५-सच्चाई ६न्याय एवं विज्ञप्ति ७-धर्म

Friday, May 8, 2015

Junbishen 632 Ghazal 3

ग़ज़ल
सब रवाँ मिर्रीख़१ पर, और आप का यह दरसे-दीन२ ,
कफ़िरीनो-मुशरिकीनो-मुनकिरीनो-मोमनीन3।

रौशनी कुछ सर पे कर लो, ताकि परछाईं का क़द,
छोटा हो जाए, तुम्हें कुछ अपने क़द पर हो यक़ीन।

सीखते क्या हो, इबादत और शरीअत के उसूल,
है ख़ुदा तो चाहता होगा, क़तारे ग़ाफ़िलीन।

तलिबाने अफ़ग़नी, और कार सेवक हैं अडे,
वह बजाएं, अपनी ढपली, यह बजाएं अपनी बीन।

जाने कितने काम बाक़ी हैं, जहाँ में और भी,
थोडी सी फुर्सत उसे, दे दे ख़याल ए  नाज़नीन।

साहबे ईमाँ! तुम्हारे हक़ में है 'मुंकिर' की राह,
सैकडों सालों से, ग़ालिब हैं ये तुम पर फ़ास्क़ीन4 ।

१-मंगल ग्रह पर २-धर्म-शास्त्र दर्शन ३-शास्त्र-शीर्षक ४-झूठे

Wednesday, May 6, 2015

Junbishen 631 ghazal 2

ghazal


शोर-किब्रियाई1 है, और स्वर हरे ! हरे !!

बख्श दे इन्हें खुदा, ईशवर उन्हें तरे।

वह है सच जो तूर पर, माइले-कलाम है?2

या कि उस पहाड़ पर, जो कि है जटा धरे।

आसमाँ पर वह उड़ा, आप का यकीं अरे?

कैसा आदमी था वह, अपनी ज़ात से परे?


कब्र को खिला रहे हो, तुम सवाब की गिज़ा,

तुम को क्या ज़मीन, पर कोई भूक से मरे।

यह ख़ुदा का घर नहीं है, तेरे घर में है ख़ुदा,

क्यूँ भटक रहा है तू, काबा काशी बाँवरे।

है ख़बर कि चल पड़े, दोनों तेरी रह पर,

ये ख़बर भी आएगी, कि दोनों फिर से लड़ मरे।

१-ईश वंदना का शोर २-अर्थात मूसा जो तूर पर्वत पर जाकर ईश्वर से बातें करते थेs


Monday, May 4, 2015

Junbishen 631 ghazal (1)


ghazal

किताब सर से उतरा है, कहे देता हूँ,
हमारे सर में भी पारा है, कहे देता हूँ।


फ़क़त नहीं वह तुम्हारा है, कहे देता हूँ,
सभी का उस पे इजारा है, कहे देता हूँ।

सवाब पढ़ के पढा के मिले, तो लानत है,
सवाब जीना गवारा है, कहे देता हूँ।

हज़ार साला पुराना, है वतीरा हाफिज़,
यह सर का भारी ख़सारा1 है, कहे देता हूँ।

दिमाग माने, कोई धर्म या कोई मज़हब,
लहू में पुरखों की धारा है, कहे देता हूँ।

यही नकार2 तो 'मुंकिर'की जमा पूँजी है,
इसी ने उसको संवारा है, कहे देता हूँ।

Saturday, May 2, 2015

Deewan 55 Ghazal


मअज़रत

मेरे यारो ! न गर बुरा मानो ,
देर तक मेरे पास मत बैठो ,
मेरी दुल्हन उदास होती है ,
तनहा पाकर ही पास होती है 

मेरी दुल्हन है मेरी तन्हाई ,
लेके आती है ऐसी अंगड़ाई ,
कायनातों का राज़ देती है ,
शेर माँगूं बयाज़2 देती है 
१ क्षमा याचना २ कविता-पोथी