Saturday, February 15, 2014

Junbishen 146



ग़ज़ल 
सुब्ह उफ़ुक़ है शाम शिफ़क़ है,
देख ले उसको, एक झलक है.

बात में तेरी सच की औसत,
दाल में जैसे, यार नमक है।

आए कहाँ से हो तुम ज़ाहिद?
आंखें फटी हैं, चेहरा फ़क है।

उसकी राम कहानी जैसी,
बे पर की ये ,सैर ए फ़लक़ है।

माल ग़नीमत ज़ाहिद खाए,
उसकी जन्नत एक नरक है।

काविश काविश, हासिल हासिल,
दो पाटों में जन बहक़ है।

धर्मों का पंडाल है झूमा,
भक्ति की दुन्या, मादक है।

हिंद है पाकिस्तान नहीं है,
बोल बहादर जो भी हक़ है।

कुफ़्र ओ ईमान, टेढी गलियां,
सच्चाई की, सीध सड़क है।

फ़ितरी बातें, एन सहीह हैं,
माफ़ौक़ुल फ़ितरत पर शक है।

कितनी उबाऊ हक़ की बातें,
"मुंकिर" उफ़! ये किस की झक है.

Wednesday, February 12, 2014

Junbishen 145


मुस्कुराहटें 

टक्कर 

था तबअ आज़ाद दहकाँ ,शेख़ ए बातिल का था वाज़ ,
"मैं उसे सौ ऊँट दूंगा , जो पढ़े सौ दिन नमाज़ ."
पा के लालच ऊँट का, दहकाँ वह राज़ी हो गया ,
गोया अगले रोज़ से, पाजी नमाज़ी हो गया .

सौ दिनों के वाद आए शेख जब उसके यहाँ ,
बोले  बेटा  पास मेरे ऊँट और घोडे कहाँ ,
तुझको कर देना नमाज़ी, बस मुझे दरकार था ,
राह में मस्जिद के बस, तू ही खटकता ख़ार था .
शेख़ की वादा खिलाफ़ी पर था उसका ये जवाब ,
बे वज़ू के मैंने भी, टक्कर लगाए हैं जनाब .
***

Monday, February 10, 2014

Junbishen 144

रूबाइयाँ 
अल्लाह उन्हें रख्खे, उनकी क्या बात,
हर वक़्त रहा करते हैं सब से मुहतात,
खाते हैं छील छाल कर रसगुल्ले, 
पीते है उबाल कर मिला आबे-हयात.


फ़िरऔन मिटे, ज़ार ओ सिकंदर टूटे,
अँगरेज़ हटे नाज़ि ओ हिटलर टूटे,
इक आलमी गुंडा है उभर कर आया,
अल्लाह करे उसका भी ख़जर टूटे.


हलकी सी तजल्ली से हुआ परबत राख,
इंसानी बमों से हुई है बस्ती ख़ाक,
इन्सान ओ खुदा दोनों ही यकसाँ ठहरे,
शैतान गनीमत है रखे धरती पाक.

Saturday, February 8, 2014

Junbishen 143


नज़्म 

अकेलवा

वह पेड़ देखो तनहा है, पौदों के दर्मियां,
खेतों का और जीवों का, जैसे हो पासबाँ ।

देता है राहगीरों को, मंजिल के रस्ते,
बादल को खीच लाता, खेतों के वास्ते।

चिडयों का घर दुवार है और ऐश गाह है,
गर्मी में मवेशी के लिए, इक पनाह है।

महकाता है फज़ाओं को, जब फूलता है यह,
फलता है, तो फलों को लिए, झूलता है यह।

जब तक जिएगा, सब के लिए आम देगा यह,
मरने के बाद भी, हमें आराम देगा यह।

इन्सां तो बस ज़मीं पे है, लेने के वास्ते,
यह पेड़ बस कि होते हैं, देने के वास्ते।

Thursday, February 6, 2014

junbishen 142


नज़्म 

पतझड़ के पात

हूँ मुअल्लक़1 इन्तेहा-ओ-ख़त्म शुद2 के दरमियाँ।
ऐ जवानी! अलविदा!! अब आएगी दिल पर खिज़ाँ3

ज़ेहन अब बहके गा जैसे पहले बहके थे क़दम,
कूए-जाना4 का मुसाफिर जायगा अब आश्रम।

यह वहां पाजाएगा टूटा हुवा कोई गुरू,
ज़ख्म खुर्दा5 मंडली होगी, यह होगा फिर शुरू।

धर्मो-मज़हब की किताबें फिर से यह दोहराएगा,
नव जवानो को ब्रम्ह्चर और फिकः6 समझाएगा।

फिर यह चाहेगा कोई पहचान बन जाए मेरी,
दाढ़ी,चोटी,और जटा ही शान बन जाए मेरी।

फिर ये अपना बुत तराशेगा गुरू बन जाएगा,
ये समझता है ब़का7 में आबरू बन जाएगा।

१-बीचअटका हुवा २-इतिऔर समाप्ति ३-प्रेमिका की गली ५-घायल ६-धर्म-शास्त्र ७-शेष .

Tuesday, February 4, 2014

junbishen 1412



ग़ज़ल 
ये तसन्नो में डूबा हुवा, प्यार है,
क्या कोई चीज़ फिर, मुफ़्त दरकार है.

फैली रूहानियत की, वबा क़ौम में,
जिस्म मफ़्लूज है, रूह बीमार है.

नींद मोहलत है इक, जागने के लिए,
जाग कर सोए तो नींद, आज़ार है.

बुद्धि हाथों पे सरसों, उगाती रही,
बुद्धू कहते रहे, ये चमत्कार है.

मुज़्तरिब हर तरफ़, सीधी जमहूर है,
मुन्तखिब की हुई, किसकी सरकार है.

बाँटता फिर रहा है, वो पैग़ामे मौत,
भीड़ थमती है, जैसे तलबगार है.

एक झटके में जोगी, कहीं जा मर,
क़िस्त में मौत तेरी, ये बेकार है.


हों न'मुंकिर' इबारत ये उलटी सभी,
ले के आ आइना वोह मदद गार है.
*****
*आज़ार=रोग *मुज़्तरिब=बेचैन *मुन्तखिब=चुनी हुई.

Sunday, February 2, 2014

Junbishen 140


ग़ज़ल 
तुम तो आदी हो सर झुकने के,
बात सुनने के, लात खाने के।

क्या नक़ाइस हैं, पास आने के,
फ़ायदे क्या हैं, दिल दुखाने के?

क़समें खाते हो, बावले बन कर,
तुम तो झूटे हो इक ज़माने के।

लब के चिलमन से, मोतियाँ झांकें,
ये सलीक़ा है, घर दिखाने के।

ले के पैग़ाम ए सुल्ह आए हो,
क्या लवाज़िम थे, तोप ख़ाने के।

मैं ने पूछी थी खैरियत यूं ही,
आ गए दर पे, काट खाने के।

जिन के हाथों बहार बोई गईं,
हैं वह मोहताज दाने दाने के।
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