Monday, July 25, 2011

एहसासे कम्तरो!



नज़्म 
ताज़ियाने 


एहसासे कम्तरो२ तुम, ज़ेहनी गदागरो3तुम,
पैरों में रह के देखा, अब सर में भी रहो तुम।


इनकी सुनो न उनकी, ऐ मेरे दोस्तों तुम,
अपनी खिरद4 की निकली, आवाज़ को सुनो तुम।


दुनिया की गोद में तुम, जन्में थे, बे-ख़बर थे,
ज़ेहनी बलूग़तों5 में, इक और जन्म लो तुम।


अंधे हो गर सदाक़त, कानो से देख डालो,
बहरे हो गर हक़ीक़त, आखों से अब सुनो तुम।


ख़ुद को संवारना है, धरती संवारनी है,
दुन्या संवारने तक, इक दम नहीं रुको तुम।


मैं ख़ाक लेके अपनी, पहुँचा हूँ पर्वतों तक,
ज़िद में अगर अड़े हो, पाताल में रहो तुम।


२-हीनाभासी3-तुच्छाभास ४-बुद्धि ५-बौधिक

Sunday, July 24, 2011

हिन्दी ग़ज़ल


 
तुम जाने किस युग के साथी, साथ मेरे क्यूं आए हो,
सर का भेद नहीं समझे, दाढ़ी-चोटी चिपकाए हो।
 
चमत्कार चतुराई है उसकी, तुम जैसा इंसान है वह,
करके महिमा मंडित उसको, तुम काहे बौराए हो।
 
माथा टेकू मस्तक वालो, यह भी कोई शैली है,
धोती ऊपर टोपी नीचे, इतना शीश नवाए हो।
 
मुझ तक अल्लह यार है मेरा, मेरे संग संग रहता है,
तुम तक अल्लह एक पहेली, बूझे और बुझाए हो।
 
चाहत की नगरी वालो, कुछ थोड़ा सा बदलाव करो,
तुम उसके दिल में बस जाओ, दिल में जिसे बसाए हो।
 
यह चिंतन, यह शोधन मेरे, मेरे ही उदगार नहीं,
अपने मन में इनके जैसा, तुम भी कहीं छुपाए हो।
 
चाँद, सितारे, सूरज, पर्बत, ज़ैतूनो-इन्जीरों१ की,
मौला! 'मुंकिर; समझ न पाया, इनकी क़समें खाए हो।
१-कुरान में अल्लाह इन चीज़ों की क़समें खा खा कर अपनी बातों का यकीन दिलाता है.
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Wednesday, July 20, 2011

उन्नति शरणम् गच्छामि



नज़्म 

उन्नति शरणम् गच्छामि
 
गौतम था बे नयाज़-अलम1, जब बड़ा हुवा,
महलों की ऐश गाह में, इक ख़ुद कुशी किया।

पैदा हुवा दोबारा, हक़ीक़त की कोख से,
तब इस जहाँ के क़र्ब2 से वह आशना हुवा।

देखा ज़ईफ़3 को तो, हुवा ख़ुद नहीफ़4 वह,
बीमारियों को देख के, बीमार हो गया।

मुर्दे को देख कर तो, वह मायूस यूँ हुवा,
महलों की ऐश गाह से, संन्यास ले लिया।

बीवी की चाहतों से, रुख अपना मोड़ कर,
मासूम नव निहाल को, भी तनहा छोड़ कर,

महलों के क़ैद ख़ानों से, पाता हुवा नजात,
जंगल में जन्म पाया था, जंगल को चल दिया.

असली ख़ुदा तलाश, वह करता रहा वहां,
कोई ख़ुदा मिला न उसे, यह हुवा ज़रूर

वह इन्क़्शाफ़5 सब से बड़े, सच का कर गया,
"दिल में है अगर अम्न, तो समझो खुदा मिला"।

सौ फ़ीसदी था सच, जो यहाँ तक गुज़र गया,
अफ़सोस का मुक़ाम है, जो इसके बाद है,

शहज़ादे के मुहिम की, शुरुआत यूँ हुई,
तन पोशी, घर, मुआश, बतर्ज़े-गदा6 हुई।

दर असल थी मुहिम, हो खुदाओं का सद्दे-बाब 7,
मुहिम-ए-अज़ीम8 थी, कि जो राहें भटक गई,

राहों में इस अज़ीम के जनता निकल पड़ी,
उसने महेल को छोड़ा था और इसने झोपडी।

शीराज़ा9 बाल बच्चों के, घर का बिखर गया,
आया शरण में इसके जो, वह भिक्षु बन गया।

मानव समाज की धुरी, जो डगमगा गई।
मेहनत कशों पे और क़ज़ा10, दूनी हो गई।

काहिल अमल फ़रार, ये हिन्दोस्तां हुवा,
जद्दो-जेहद का देवता, चरणों में जा बसा,

तामीर11 क़ौम के रुके, सदियाँ गुज़र गईं,
'मुंकिर' ख़ुमार बुत का, ये छाया है आज तक,


माज़ी गुज़र गया है,बुरा हाल है बसर।
आबादियों को खाना, न पानी है मयस्सर ,

ज़ेरे सतर गरीबी12, जिए जा रहे हैं हम,
बानी महात्मा की,  पिए जा रहे हैं हम.


१-दुःख से अज्ञान 2 -पीडा ३-बृध ४-कमज़ोर ५-उजागर करना ६-भिखारी की तरह जीवन यापन ७-समाप्त होना ८-महान ९-प्रबंधन १०-मौत ११-रचना १२-गरीबी रेखा

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Tuesday, July 19, 2011

कुदरत का मशविरा


नज़्म 

कुदरत का मशविरा


अध्-जले ऐ पेड़! तू है, उम्र-रफ़्ता0 का शिकार,
कर्बे-गरमा१ झेलता, तनहा खडा है धूप में,
इब्ने-आदम२ को है बेचैनी, कि इन हालात में,
ढूँदता फिरता है पगला, मंदिरों-मस्जिद की छाँव।


जानता है तू कि बस ग़ालिब है, क़ुदरत का निज़ाम3,
ज़िन्दगी धरती पे जब, होती है बे बर्गो-समर4,
तब ज़मीं पर बार, बन जाता है हर पैदा शुदा,
है ज़मीं बर हक़, कि ढोने हैं उसे अगले जनम,
तेरे, मेरे, इनके, उनके, गोया हर मख्लूक़5 के।

ऐ शजर!६ कर तू , जुबां पैदा, बता नादान को,
बस तेरे जैसे मुक़ाबिल, ये भी हों मैदान में,
मत पनाहें ढूँढें अपनी, रूह की बाज़ार में,

नातवानी-ए-ज़ईफी7 का, न हल ढूँढें 'जुनैद',

काट लें बस हौसले से, यह सज़ाए उम्र क़ैद।
 

0-जरा-वस्था १-गर्मी की पीड़ा 3-आदम की औलाद ३-व्यवस्था ४-पत्ते एवं फल रहित ५ प्राणी वर्ग ६-पेड़ ७-बुढ़ाप काल

Monday, July 18, 2011

छीछा लेदर

छीछा लेदर


ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी,
भए न्याय के सब अधिकारी।

इन सब को अपराधी जान्यो,
सभै की मौन समाधि जान्यो।

निर्बल जीव को पापी संजयो,
ताड़क को परतापी समझयो।

इनके मूडे सींग उग आई,
इनके मार से कौन बचाई?

गंवरा भए शहर के बासी,
न्याय धीश हैं चमरा पासी।

पशुअन तक सनरक्षन पाइन,
सवरण जान्यो जनम गंवाइन।

नारी माँ बेटी बन बनयाई,
तुलसी बाबा राम दुहाई।

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Saturday, July 16, 2011

ग़ज़ल - - - अपने घरों में मंदिर ओ मस्जिद बनाइए



अपने घरों में मंदिर ओ मस्जिद बनाइए,
अपने सरों पे धर्म और मज़हब सजाइए.
 
उस सब्ज़ आसमान के नीचे न जाइए,
इस भगुवा कायनात से खुद को बचाइए.
 
सड़कों पे हो नमाज़ न फुट पथ पर भजन,
जो रह गुज़र अवाम है, उस पर न छाइए.
 
बचिए ज़ियारतों से, दर्शन की दौड़ से,
थोडा वक़्त बैठ के खुद में बिताइए.
 
परिक्रमा और तवाफ़ के हासिल पे गौर हो,
मत ज़िन्दगी को नक़ली सफ़र में गंवाइए.
 
बच्चों का इम्तेहान है, बीमार घर पे हैं,
मीलाद ओ जागरण के ये भोपू हटाइए.
 
अरबों की सर ज़मीन है जंगों से बद नुमा,
"मुंकिर" वतन की वादियों में घूम आइए.
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Friday, July 15, 2011

मशविरे


नज़्म 

मशविरे 
छोड़ो पुरानी राहें, सभी हैं गली हुई,
राहें बहुत सी आज भी, हैं बे चली हुई।

महदूद1 मोहमिलात२ में, क्यूं हो फंसे हुए,
ढूँढो जज़ीरे आज भी हैं, बे बसे हुए।

ऐ नौ जवानो अपना, नया आसमां रचो,
है उम्र अज़्मो-जोश३ की, संतोष से बचो।

कोहना रिवायतों4 की, ये मीनार तोड़ दो,
धरती पे अपनी थोडी सी, पहचान छोड़ दो।

धो डालो इस नसीब को, अर्क़े जबीं५ से तुम,
अपने हुक़ूक़६ लेके ही मानो ज़मीं से तुम।

फ़रमान हों ख़ुदा के, कि इन्सान के नियम,
इन सब से थोड़ा आगे, बढ़ाना है अब क़दम।
 
१ -सीमित २ -अर्थ -हीन ३- उत्साह ४ -पुराणी मान यातें ५ -माथे का पसीना ६ -अधिकार .